॥ दिल की गिरह खोल दो ॥
॥ मैं नदी हूँ ॥
मई 2013, फेसबुक जैसे वेबपेजस पर इतनी लड़ाई लगी हुई थी हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई के बीच। कुछ देर के लिये मैं भी इसमें बहक गया था । फिर मैंने गीता पढ़ी और जाना ये सब बकवास है। जीवात्मा से नफ़रत करने वाले को भगवान आखिर कैसे मिलेगा। आखिरकार मैने इसे भी व्यक्त करने की सोची।

मैं नदी हूँ, मेरा नाम जानकर क्या करोगे ?
मुझे भी बाँट दोगे कहकर की ये मेरा है
और मेरा है तो तुम्हारे से अच्छा है
पर मै तो सिर्फ एक नदी हूँ
बस केवल एक मीठे जल की धार
मैं बस एक नदी हूँ ॥
मेरा नाम थेम्स हो, या नील हो, या गंगा हो
इसके आधार पे मेरा स्वरूप नहीं बदलता
मेरा पानी नहीं बदलता
मेरा कुछ नहीं बदलता
बदलती है तुम्हारी सोच
मैं मानव नहीं जो नामानुसार
आचार और विचार बदल दूँ
सभ्यता और संसार बदल दूँ
इंसान और भगवान बदल दूँ
धर्म और इमान बदल दूँ
मै नदी हूँ और वो पानी है
उसके बिना मैं कुछ भी नहीं
भगवान हर रूप में एक है
पर ये धर्म क्या होता है ?
बस एक माली जो ये बताता है की पौधे कैसे उगते हैं
मगर धान और गेहूँ एक तरह नहीं उगता
तो हरेक इंसान का धर्म भी अलग होने दो
मैने तो जंगली फूलों को बिन मौसम उगते देखा है
पर फिर तुम पढ़े लिखों के आगे मैं क्या कहूँ
मैं तो एक नदी हूँ, सिर्फ एक गूँगी, पीडि़त नदी हूँ।
मैने अपने तट पर सभ्यतायें बसती हुई देखी है
तुम्हारे पूर्वजों ने कभी मेरी गोद में खेला है।
मुझे माँ कहा मेरी लहरों को झेला है
मेरी लहरों में कभी राग ढूँढें गये है
खेती, दवा, सभी आराम ढूँढे गये है
मगर मशीनी शोर-संगीत और क्लब का आनंद मैं शायद ना दे पाँऊ
पर हाँ गर मन करे तो मेरे पास शाँति पाने आ जाना
मै तो वही नदी हूँ और मैं आज भी वहीं हूँ
जिन्होंने भाषा रची वो पागल थे
वो पूजा करते थे मुझे, हाँ सचमुच पागल थे
मैने तुम्हे पानी दिया, धरती ने खाना, सूरज ने रोशनी
पर तुमने हमें क्या दिया ? क्या दे सकते हो ? कुछ नहीं
तो कोई अगर मुझे माँ कहकर दो फूल चढ़ा दे तो वो पागल थे
अकलमंद तो तुम हो जो अपने लालच में
नदी, वन, पशु- पक्षी, पूरी प्रकृति को बरबाद कर रहे हो
उन मूक आदिवासियों के दिल में भी सही गलत की रेखा थी
मगर तुम पढ़े-लिखे ये सब क्यूँ करते हो
आखिर कैसा ज्ञान पा लिया तुमने ?
पर मैं तो बस एक नदी हूँ, एक मूक, निशब्द नदी हूँ.... ।
मैने नई कहानियाँ , नए सभ्यता के नए सबूत बनते देखे हैं
मैने कलाकार, मजदूर अछूत बनते देखे हैं
तुम्हारे वंश का पता जो है बताती
बस वही, इतनी सी होती है जाती
अब इसमें अछूत कहाँ से आ गए
जन्म पर नहीं कर्म आधारित है वर्ण व्यवस्था
वरना विदुर मंत्री ना होते, विश्वमित्र साधू ना होते
ना वाल्मिकी लिखते रामायण, और एतरेय ना लिखते वेद।
पर तुम लोग तो ग्यानी हो जिसे ज्-ञान नहीं पता
मै तो बस एक अज्ञानी , अनपढ़ नदी हूँ.... ।
मेरे ही बच्चे, शेर, बकरी, ईंसान,
आपस मे एक दूसरे को बरबाद करने में लगे हैं
चबाने-खाने में लगे हैं, सताने में लगे हैं
मुझे छोड़ो मत मुझे फिर अपनाओ
इसे ढकोसला समझ मत ठुकराओ
ये साकार सभ्यता की नदी, और इसमे निराकार पानी बहकर बहता है
तुम इसमें साकार रूप से मछली बनकर तैरो या
निराकार रूप से पानी में पानी बन समा जाओ
पर इसकी पुकार सुन इसे फिर बचाओ
मैं नदी हूँ और केवल तुम्हारे ही भोग मात्र के लिए नहीं हूँ
पशू, पक्षी, कीट, सब नें मेरा पानी बाँटा है
मगर नाम केवल तुमने
काम केवल तुमने
पहचान केवल तुमने
मै नदी हूँ और तुम्हारे पीडि़त विचारों से घिरी हूँ
मै तो बिखरी सभ्यता, मरे सपनों की नदी हूँ
मैने रूककर तुम्हे पुकारा मुझे क्षमा करना
मेरा काम सिर्फ बहना है तुम्हे झंझोरना नहीं
मैं तो बस पालनकर्ता नदी हूँ
सिर्फ एक भूली-बिसरी पूरानी नदी हूँ
बस एक पूरानी नदी हूँ.... !!
