॥ दिल की गिरह खोल दो ॥
॥ हक ॥
1 जून, 2016

तेरी बातें मानना मेरा फर्ज है पर जि़द पुरी करना मेरा काम नहीं।
मैं तुझे बहुत प्यार तो करता हूँ मगर मैं तेरे हुक्म का गुलाम नहीं॥
जानता हूँ की रिश्ते बचाने के लिए भूलना-सहना ज़रूरी है मगर
मैं वनवास काटूँ और कुछ ना बोलूँ अब ऐसा भी मैं कोई राम नहीं॥
मुझे कमजोर मानने वाले मैं रोज दुनिया को बनाता बिगाड़ता हूँ
मैं आम आदमी जरूर हूँ पर तुझसे डरूँ इतना भी कोई आम नहीं॥
ये मत सोच पागल की सारी उमर तू मुझे दबा के रख सकता हैं
मैं हाथी हूँ हुज़ूर मुझे काबू करना तेरे जैसों के बस का काम नहीं॥
रफ्ता-रफ्ता मुझको इधर भी और उधर भी खीचंता है मेरा नसीब
एक चौड़ी सी चिता के सिवा अब दिल को कहीँ भी आराम नहीं॥
कतरा-कतरा जिंदगी को रोज डर डर कर पिया है हमने जनाब
इन ग़मों का पर इलाही मौत से बढ़कर यहाँ कोई अंजाम नहीं॥
तेरी बातें मानना मेरा फर्ज है पर जि़द पुरी करना मेरा काम नहीं।
मैं तुझे बहुत प्यार तो करता हूँ मगर मैं तेरे हुक्म का गुलाम नहीं॥
