॥ दिल की गिरह खोल दो ॥
॥ भूल जाता हूँ ॥
16 दिसम्बर, 2015

मैं खुले आम अहसान करता हूँ पर जताना भूल जाता हूँ।
मैं एक बंद किताब हूँ जो सूखे फूल दिखाना भूल जाता हूँ ॥
जब मंजिल आवाज देती है तो सब छोड़ जाना पड़ता है।
मैं सामान तो छोड़ जाता हूँ पर उँगली छुड़ाना भूल जाता हूँ ॥
घण्टों बैठ कर सोचता हूँ देरी की क्या जवाब उन्हें देंगे हम
उनसे नजरें जब मिलती हैं तो मैं पूरा बहाना भूल जाता हूँ॥
जिंदगी जब पीसती है तो इश्क को वक्त नहीं देती मेरी जाँ
बस तेरी हँसी याद रहती है मैं खुद मुस्काना भूल जाता हूँ ॥
रोज़ कोसता हूँ जिंदगी को जी भर मैं नाकामयाबीयों के लिए
फिर घर में माँ को देखता हूँ तो सारा जमाना भूल जाता हूँ॥
सुना है कला किसी भी कौम की पहली पहचान होती है
रास्ते के ठेलों से अक्सर मोल भाव कराना भूल जाता हूँ ॥
बढ़ती आबादी मुझे भी दूजे का निवाला छीनना सिखा बैठी
पर गरीबी का खाली कटोरा देख मैं पैसा बचाना भूल जाता हूँ॥
नशा जिंदगी को चुस्की लेकर घूँट घूँट कर पीने में है बस
मैं रोज नशे में रहता हूँ, हाँ मगर पैमाना भूल जाता हूँ॥
मंदिर जाता ही हूँ मैं रोज़ बस तुझे खरी खोटी सुनाने को।
पर तेरी मुरली दिखती है तो मैं अपना बेगाना भूल जाता हूँ ॥
क्या दुश्मनी थी जो ये जिंदगी ये तूने अता करी मेरे मौला
मैं यहाँ जिंदा तो रहता हूँ पर खुद ही को ये जताना भूल जाता हूँ॥
मेरे खुदा मैं थक चुका, तू खुद आ और खुद का वजूद दिखा
या फिर मैं भी तुझ को समझ कर बस इक फ़साना भूल जाता हूँ॥
मैं खुले आम अहसान करता हूँ पर जताना भूल जाता हूँ।
मैं एक बंद किताब हूँ जो सूखे फूल दिखाना भूल जाता हूँ ॥
