॥ दिल की गिरह खोल दो ॥


॥ दर्द ॥

10 फरवरी, 2016



॥ दर्द॥


कोई काँटा चुपचाप सीने में गड़ता सा है

जैसे लहू धीरे धीरे दिल से टपकता सा है॥


पहले भी यहाँ कोई कम दर्द थे नहीं

अब ये कौन सा नया दर्द फिर उभरता सा है।


कुछ हालात बयाँ किए नहीं जा सकते

बस याद बनकर कोई ज़हन से गुजरता सा है ॥


सब को एकसाथ रखना मेरी जान ले गया

अब सर किसी मकड़जाल में फँसता सा है॥


मैं इधर भी जाना चाहता हूँ और उधर भी

सारा जिस्म जैसे दो हिस्सों में कटता सा है ॥


मुझे ये जमाना खुल के चीखने भी नहीं देता

मेरे मुँह में फिर अपने शब्द भरता सा है ॥


मेरे माथे तुम कोई दोष मड़ ना देना

ये जोगी रोज माथा भस्म से रगड़ता सा है ॥


मैं हर किसी को अलग रंग में नजर आता हूँ

तू क्यूँ मुझे अपने रंग में परखता सा है ॥


मैं तुझ में मिल तुझ सा बन गया

वो झूठ तेरा ही था जो बीच में अटकता सा है॥


जाम कुछ और नशीला बना ऐ साकी

होश-ओ-हवास से अब मन कुछ डरता सा है॥


मेरे मौला मुझसे भी मिलने आ कभी

तेरे बिन ये जिस्म गुमनाम भटकता सा है ॥


कोई काँटा चुपचाप सीने में गड़ता सा है

जैसे लहू धीरे धीरे दिल से टपकता सा है॥