॥ वैदिक जीवन ॥
॥ पुरुषार्थ (काम)॥
पुरुषार्थ की दृष्टि से काम का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥
काममय एवायं पुरुष इति। यह पुरुष (जीव) वास्तव में काममय है — इच्छाओं से ही निर्मित। स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति। जैसी उसकी इच्छा होती है, वैसा ही उसका संकल्प बनता है। यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते। जैसा संकल्प होता है, वैसा ही कर्म करता है। यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते॥ और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है। — (बृहदारण्यक उपनिषद् ४.४.५)

काम (सौंदर्य, इच्छा, रसानंद)
अकामतः क्रिया काचित् दृश्यते नेह कर्हिचित्। इस संसार में बिना किसी कामना (इच्छा) के कभी कोई क्रिया दिखाई नहीं देती। यद्यद्धि कुरुते किञ्चित् तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥ मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह सब उसकी कामनाओं की ही चेष्टा (प्रयास) का परिणाम है। — (मनुस्मृति, २.४)
काम का अर्थ केवल शारीरिक वासना नहीं, अपितु इच्छा, प्रेम, सौंदर्य, भावनाएँ, रचनात्मकता, कला, संगीत, साहित्य, और जीवन के सभी आनंददायक अनुभव हैं। यदि अनुभव ना हो पाए तो उनकी इच्छा मात्र भी काम है। परंतु काम ही संसार में सारे कर्मों का मूल है। कामसूत्र में "कामो नाम मनसो वाञ्छा" — काम मन की वह वांछा है जो सौंदर्य और आनंद की ओर आकर्षित करती है। संसार की सारी तीव्र इच्छाएँ काम हैं। और इच्छाओं के बिना जीवन में कोई कर्म होगा ही नहीं॥
इन्द्रियाणां मनःसन्निकर्षेण स्वविषयेषु अनुकूलप्रवृत्तिः कामः॥ इन्द्रियों का मन के साथ जुड़ाव होने पर अपने-अपने विषयों में जो सुखद या अनुकूल प्रवृत्ति होती है, वही 'काम' है। — कामसूत्र (१.२.११)
काम का संतुलित और धर्मसम्मत पालन जीवन को आनंदमय, रचनात्मक और संतुलित बनाता है। काम का दमन मानसिक विकृति, तनाव और सामाजिक विघटन को जन्म देता है, जबकि उसका अतिरेक पतन का कारण बनता है। सामान्यतः समाज में 'काम' (Desires) को अध्यात्म का शत्रु मानकर उसे दबाने या उससे भागने की शिक्षा दी जाती है। लेकिन यदि हम गहरे भारतीय दर्शन और उपनिषदों की ओर मुड़ें, तो पाते हैं कि काम कोई पाप नहीं, अपितु जीवन की वह प्राथमिक ऊर्जा है जिसे यदि दिशा मिल जाए, तो वह 'समाधि' का मार्ग प्रशस्त करती है।
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्। सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहले 'काम' (सृजन की इच्छा) उत्पन्न हुआ, जो मन का प्रथम बीज था। सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा॥ बुद्धिमान ऋषियों ने अपने अंतःकरण में खोज करते हुए अपनी मेधा से 'सत' (अस्तित्व) के संबंध को 'असत' (अस्तित्वहीनता) में ढूँढ निकाला। — (ऋग्वेद, १०.१२९.४)
ये सारा संसार अस्तित्व में आया क्योंकि ब्रह्म को इच्छा हुई की संसार उत्पन्न हो जाए। सृष्टि का मूल भी काम है। उपरोक्त श्लोक इस बात की पुष्टि करता है। और साथ ही स्वयं भगवान श्री कृष्ण स्वयं को उस 'काम' के रूप में स्वीकार करते हैं जो धर्म के विरुद्ध नहीं है। यह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि काम ऊर्जा अपने आप में अशुद्ध नहीं है॥
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् | बलवानों में वह बल मैं हूँ, जो काम (आसक्ति) और राग (मोह) से रहित है। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ || हे भरतश्रेष्ठ! प्राणियों में धर्म के अनुकूल (मर्यादा के भीतर) जो काम (इच्छा) है, वह मैं हूँ। — (श्रीमद्भगवद्गीता, ७.११)
बिना रस के, बिना आनंद के संसार का कोई मोल नहीं। कोई भी संसार में जन्म क्यों लेगा यदि यहाँ रस ना हो, आनंद ना हो। जब बारम्बार इसी धरा पर जन्म लेना है तो इसी धरा को और सुंदर बनाओ। यहाँ रसानंद लो और इसे ही स्वर्ग बना लो। यदि यहाँ से जाना है प्रभू की भक्ति का रस चखो और मोक्ष प्राप्त कर लो। ये नव रस ही सारे संसार के काम का मूल है। इसलिए तो वेदों में गंधर्ववेद को भी पढ़ाया जाता है। संगीतकला, छंदकला, नृत्यकला, चित्रकला, पाककला ऐसी 64 कलाएँ भारत में धर्म को समझने के लिए पढ़ाई जाती थी। क्यों हर एक कला एक योग है और वह योग आपको ब्रह्म से मिला सकता है। वैसे 'सृजन' (Creation) भी काम का ही एक रूप है। जैसे संगीत से नादयोग, छंदकला से मंत्रयोग, नृत्य से नटयोग, व्यायाम से हठयोग, शब्दयोग, कुण्डलिनी योग इत्यादि सब प्रभू का सार भी हैं और सब रस को भी समझते हैं। उपनिषद सिखाते हैं कि आनंद का स्रोत 'रस' है और परमात्मा स्वयं 'रसो वै सः' (वह रस स्वरूप है) है। जीवन के रसों से भागना नहीं, अपितु उन्हें जानते हुए उनसे ऊपर उठना ही पुरुषार्थ है॥
रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वा आनन्दी भवति। वह (परमात्मा) ही रस स्वरूप है। उस रस को प्राप्त करके ही यह जीवात्मा आनन्दित होता है। को ह्येवान्यत् कः प्राण्यात्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। यदि इस हृदयाकाश में यह आनन्द न होता, तो भला कौन चेष्टा करता और कौन जीवित रहता? — (तैत्तिरीय उपनिषद्, २.७.१)
संभोग
ये चिद्धि पूर्वे ऋतसाप आसन् साकं देवेभिरवदन्नृतानि।
वे प्राचीन ऋषि, जो ऋत (सत्य) के साधक थे, देवों के साथ मिलकर सत्य-वचन करते थे। ते चिदवासुर्नह्यन्तमापुः समू नु पत्नीर्वृषभिर्जगम्युः॥
उन्होंने ब्रह्मचर्य-व्रत का अतिक्रमण किए बिना ही गृहस्थ-धर्म का पालन किया, वे अपनी पत्नियों के पास गए और संतानोत्पत्ति की। — (ऋग्वेद १.१७९.२)
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि तीन प्रकार के ऋण है ऋषि ऋण, पितृ ऋण और देव ऋण। पितृ ऋण को चुकाने के कई सोपान हैं। उनमें से एक संभोग भी है। पितृ अपने पाप-पुण्य भोगने के पश्चात एक लोक में रुकते हैं जिसे 'पुत लोक' कहा जाता है। शास्त्रों में 'पुत' (या पुं) नाम का एक विशेष नर्क बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति संतानहीन होते हैं, उन्हें इस कष्टकारी लोक में जाना पड़ता है। यहाँ आत्माएँ अपने अगले जन्म के लिए उचित शरीर और समय (प्रारब्ध) की प्रतीक्षा करती हैं। वंश में बच्चों का जन्म होना पितरों के लिए एक नया अवसर माना जाता है। मान्यता है कि पितर ही सामान्यतः अपने ही कुल में पोते-पोतियों के रूप में पुनर्जन्म लेते हैं ताकि वे अपने अधूरे कर्मों को पूरा कर सकें। इसलिए बच्चों को पुत्र और पुत्री कहते हैं, की उन्होंने पुत लोक को तार दिया। वहाँ एक अंधकूप होता है जहाँ पर उनके गिरने की निरंतर संभावना बनी रहती है और वो सदैव प्रतीक्षाग्रस्त होते हैं॥
ये बताता है कि संसार को सुचारू रूप से चलने के लिए आपको विवाह करना पड़ेगा और बच्चे पैदा करने पड़ेंगें। ऐसी कुछ कथाएँ शास्त्रों में हैं। उनमें से दो मैं बताता हूँ। महर्षि अगस्त्य घोर तपस्वी थे और उन्होंने विवाह न करने का निश्चय किया था। एक बार भ्रमण करते हुए उन्होंने एक विशाल कुआँ देखा, जिसमें उनके पूर्वज (पितर) पैर ऊपर और सिर नीचे करके लटके हुए थे। उनकी दशा अत्यंत दयनीय थी। अगस्त्य जी ने जब उनसे इसका कारण पूछा, तो उन्होंने कहा: "हे पुत्र! हम तुम्हारे पूर्वज हैं। तुम्हारे विवाह न करने और संतान उत्पन्न न करने के कारण हमारा 'संतान-तन्तु' (वंश की निरंतरता) टूट गया है। जो व्यक्ति संतानहीन होता है, उसे 'पुत्' नामक नरक में जाना पड़ता है। हम इसी कारण यहाँ लटके हुए हैं। यदि तुम विवाह करके पुत्र उत्पन्न करोगे, तभी हमें मुक्ति मिलेगी और हम दिव्य लोकों को जा सकेंगे।" इसलिए उन्होंने लोपमुद्रा से विवाह करा॥
विवाह के बाद भी अगस्त्य मुनि केवल तपस्या और साधना में लगे रहते थे। तब लोपामुद्रा उन्हें 'काम' और दांपत्य जीवन के महत्व को समझाते हुए कहती हैं: "मैं कई वर्षों से दिन-रात तुम्हारी सेवा कर रही हूँ। अब बुढ़ापा मेरे शरीर की सुंदरता को कम कर रहा है। जो प्राचीन काल के महान ऋषि थे, जो सत्य के मार्ग पर चलते थे और देवताओं के साथ संवाद करते थे, उन्होंने भी अपनी पत्नियों के साथ सहवास किया और संतान उत्पन्न की। तपस्या और दांपत्य जीवन (काम) दोनों का संतुलन आवश्यक है।" इसके बाद अगस्त्य मुनि स्वीकार करते हैं कि केवल तपस्या ही जीवन का सत्य नहीं है, अपितु पत्नी के साथ प्रेम और सृजन भी उतना ही पवित्र है॥
और ऐसी कथाएँ आपको महर्षि जरत्कारु, प्रजापति रुचि, महर्षि मंदपाल इत्यादि महानुभावों की भी मिलेंगीं। तो हमने कामशास्त्र लिखा, खजुराहो के मंदिर बनाए, अजंता ऐलोरा की गुफाएँ बनाई, 4 पुरुषार्थों में काम को रखा। आदि शंकराचार्य जीवन में केवल एक शास्त्रार्थ हारते हैं, विदुषी उभय भारती से, और उसका विषय होता है कामशास्त्र, चुँकि शंकराचार्य एक सन्यासी थे उन्हे इसका कोई ज्ञान नहीं था। फिर वह 6 महीने एक राजा के साथ रहते हैं जिसकी 100 रानियाँ थी और कामशास्त्र सीख कर आते हैं और उभय भारती को फिर हराते हैं। हमारे में कामदेव और रति की भी पूजा की जाती है। तो मेरा तात्पर्य है कि हमने संभोग को कभी भी हेय नहीं माना अपितु संसार का चक्र चलाने के लिए आवश्यक कारक माना। जब श्री कृष्ण स्वयं कह रहे हैं कि मैं काम हूँ। तो काम को हेय मानना एक भूल है। संभोग यहाँ केवल प्रजनन का साधन नहीं, अपितु दो आत्माओं के बीच 'ऋत' (सत्य/नियम) का निर्वहन भी है। परंतु मूल अंतर है काम वासना और काम योग जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।
समाधि
भोगेन भोगं त्यजति योगी योगेन चापरम्। योगी भोग को भोगकर ही उससे ऊपर उठता है, और योग से शेष वासनाएँ शांत होती हैं। भोगयोगयुतो देवि मुक्तिमार्गं स गच्छति॥ हे देवि! भोग और योग—दोनों के संतुलन से ही साधक मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। — (कुलार्णव तंत्र, २.५६)
गोरखनाथ और उनके शिष्य की एक कथा नाथ पंथ की परंपराओं में बहुत प्रचलित है। यह विशेष रूप से 'अनुभव' के माध्यम से 'वैराग्य' की प्राप्ति को दर्शाती है। भारतीय दर्शन में इसे 'भुक्ति से मुक्ति' का मार्ग कहा जाता है, जहाँ दमन (Suppression) के स्थान पर तृप्ति (Saturation) के माध्यम से मन को शांत किया जाता है। गुरु गोरखनाथ के पास एक शिष्य आया जो साधना तो करना चाहता था, परंतु उसकी तामसिक वृत्तियाँ बहुत प्रबल थीं। उसने गुरु से निवेदन किया— "हे नाथ! मैं योग मार्ग पर चलना चाहता हूँ, किंतु मेरा मन मांस खाने की प्रबल इच्छा से ग्रस्त है। मैं चाहकर भी इस स्वाद को छोड़ नहीं पा रहा हूँ।"
गुरु गोरखनाथ जानते थे कि यदि शिष्य को बलात रोका गया, तो उसका मन सदैव उसी विचार में अटका रहेगा। उन्होंने शिष्य की आंखों में झाँका और अपनी योगशक्ति से उसे एक वनराज (शेर) बना दिया। गुरु ने कहा — "जाओ, अब तुम स्वतंत्र हो। जी भरकर अपनी इस भूख को शांत करो।" वह शिष्य शेर के रूप में १२ वर्षों तक घने जंगलों में रहा। उसने अनगिनत शिकार किए, निरंतर मांस का भक्षण किया और अपनी उस वासना को चरम सीमा तक जी लिया।
१२ वर्ष बाद गुरु गोरखनाथ उसी वन से गुजरे। उन्होंने उस शेर को पुकारा। शेर गुरु के चरणों में आकर गिर पड़ा। उसकी आँखों में अब वह हिंसक चमक नहीं, अपितु एक गहरी ऊब और शांति थी। उसने कहा— "प्रभु! मैं वितृप्त हो गया हूँ (पूर्णतः तृप्त और थक गया हूँ)। अब मांस के प्रति न तो आकर्षण बचा है, न ही उसकी गंध सुख देती है। मैंने देख लिया कि जिस रस के पीछे मैं भाग रहा था, वह केवल नश्वर है। अब मुझे इस पशु देह और वासना से मुक्ति दें।" गोरखनाथ ने अपनी शक्ति से उसे पुनः मनुष्य रूप में बदल दिया। अब वह शिष्य पूरी तरह शुद्ध हो चुका था क्योंकि उसकी वासना अब "दबी हुई" नहीं थी, अपितु "अनुभव होकर समाप्त" हो चुकी थी। जहाँ गोरखनाथ का शिष्य भोग से थक कर लौटा, वहीं अगस्त्य ने भोग को योग बना लिया।
यही बात अष्टावक्र गीता में स्वयं ऋषि अष्टावक्र भी करते हैं।
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्। जहाँ यह सम्पूर्ण विश्व रज्जु पर सर्प की भाँति कल्पित प्रतीत होता है, तदानन्दपदं ज्ञात्वा जीवन्मुक्तः सुखी भव॥ उस आनन्दस्वरूप पद को जानकर मनुष्य जीवन्मुक्त होकर सुखी हो जाता है। — (अष्टावक्र गीता २.७)
इसी बात को ओशो भी लिखते हैं कि व्यक्ति संभोग से समाधि तक पहुँच सकता है। और शास्त्र भी इसकी पुष्टि करते हैं। हाँ परंतु अब हमें काम वासना और काम योग का अंतर भी स्पष्ट करना होगा॥
कर्म के रूप
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। इसलिए आसक्ति रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म का आचरण करो। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥ क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करने वाला पुरुष परम पद को प्राप्त होता है। — (भगवद्गीता ३.१९)
जीवन की यात्रा में 'काम' और 'कर्म' दो ऐसे स्तंभ हैं जो हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं। सामान्यतः हम 'काम' को केवल वासना या इच्छा तक सीमित मान लेते हैं, परंतु भारतीय दर्शन में यह पुरुषार्थ का एक महत्वपूर्ण अंग है। यदि इसे धर्म और संयम के साथ जोड़ा जाए तो यही योग भी है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म की सूक्ष्म गति को समझाया है। हमें अपने कार्यों को केवल शारीरिक गतिविधि नहीं, अपितु एक साधना के रूप में देखना चाहिए। कर्म 3 प्रकार के होते हैं जिन्हे कर्म की त्रिवेणी भी कहा जाता है। ये हैं:
- सकर्म - फल की इच्छा के साथ किया गया शुभ कार्य।
- विकर्म - गलत मार्ग पर ले जाने वाले निषिद्ध कर्म।
- अकर्म - कर्म करते हुए भी फल के प्रति अनासक्त रहना (यही वास्तव में कर्मयोग है)।
उपनिषद भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि संसार में इस भाव से भोग करना चाहिए की ये मेरा नहीं है और ये किसी का ऋण है जिसे चुकाना पड़ेगा। काम को संयमित रखने का अर्थ दमन नहीं, अपितु उसका उदात्तीकरण (Sublimation) है। जब हम प्रत्येक वस्तु में ईश्वर का वास देखते हैं, तो हमारी दृष्टि बदल जाती है।
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। इस जगत में जो कुछ भी गतिशील है—सब ईश्वर से आवृत है। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ त्यागभाव से उसका उपभोग करो, किसी और के धन पर लोभ मत करो। — (ईशोपनिषद् १)
जब हम किसी कार्य से बहुत अधिक चिपक जाते हैं, तो वह 'काम-वासना' बन जाता है, लेकिन जब हम उसे कर्तव्य मानकर करते हैं, तो वह 'काम-योग' बन जाता है। काम वासना और काम योग के बीच की रेखा बहुत पतली है—वह रेखा है 'आसक्ति'। विषयों का निरंतर चिंतन क्रोध और अशांति लाता है, जबकि कर्तव्य भाव से किया गया कर्म शांति और मुक्ति प्रदान करता है। पुरुषार्थ का अर्थ यही है कि हम संसार में रहें, उपभोग भी करें, परंतु 'त्याग' और 'अनासक्ति' के बोध के साथ। गीता भी इसकी पुष्टि करती है कि कामयोग और काम वासना में क्या अंतर है॥
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्। योगयुक्त पुरुष कर्मफल का त्याग करके नैष्ठिकी शांति (मोक्ष) को प्राप्त होता है। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥ परंतु जो योगयुक्त नहीं है, वह कामना (वासना) के कारण फल में आसक्त होकर बँध जाता है। — (श्रीमद्भगवद्गीता ५.१२)
सत-असत (वास्तविक स्थाई ज्ञान)
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। असत वस्तु की कोई सत्ता नहीं है, और सत का कभी अभाव नहीं होता। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥ तत्त्वदर्शियों ने इन दोनों के ही वास्तविक स्वरूप का अंत (निष्कर्ष) देख लिया है। — (श्रीमद्भगवद्गीता २.१६)
अब मैं यहाँ सूत्र देता हूँ जो आपको अपनी कामना ( काम ऊर्जा ) को उचित मार्ग पर लगाने का मार्ग बताएगी। वैसे काम को साधने का मूल होता है अपनी इच्छाओं पर संयम रखना उसके लिए अपने मन पर संयम रखना चाहिए। कठोपनिषद् में भी कहा गया है शरीर एक रथ के समान है। आत्मा रथी है, बुद्धि सारथी और मन लगाम है। यह इंद्रिय रूपी घोड़ों को, जो निरंतर इधर-उधर भागते रहते हैं, उन्हे नियंत्रित करती है। इन्हे नियंत्रित करने के लिए मन को वश में करो। परंतु मैंने जो धर्म के प्रकरण में मनसा, वाचा, कर्मणा का सूत्र दिया था। वह ऋत, सत और धर्म से मन को भी वश में करने के लिए सक्षम है। यहाँ तो मैं चाहता हूँ कि काम का दमन ना हो अपितु काम को उचित दिशा दी जाए। काम का दमन तो सन्यास आश्रम वाले व्यक्तियों के लिए है। मैं तो पूरी पुस्तक ही ग्रहस्थों के लिए लिख रहा हूँ। जब सारा संसार ही काम से चलता है, हर कर्म के पीछे कोई आसक्ति है तो फिर काम कौन सा उचित है और कौन सा अनुचित है। ये ही हम समझ पाएँ तो जीवन में हर कार्य में अग्रिम होंगे॥
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। आत्मा को रथ का स्वामी (रथी) जानो और इस शरीर को केवल एक रथ समझो। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ बुद्धि को सारथी (रथ चलाने वाला) जानो और मन को लगाम (लगाम/प्रग्रह) समझो। इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। इंद्रियों को रथ के घोड़े कहा गया है और विषय (रूप, रस, गंध आदि) वे मार्ग हैं जिन पर वे दौड़ते हैं। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥ शरीर, इंद्रिय और मन से युक्त उस आत्मा को ही मनीषी (विद्वान) 'भोक्ता' कहते हैं। — (कठोपनिषद् १.३.३ - १.३.४)
पहले ये कथा समझते हैं। प्राचीन काल में एक अत्यंत तेजस्वी ऋषि घोर तपस्या में लीन थे। उनकी साधना इतनी दीर्घ और स्थिर थी कि समय के प्रवाह के साथ उनके शरीर पर दीमकों ने अपना घर बना लिया और वे पूर्णतः एक वल्मीक (बाँबी) के भीतर समा गए। युग बीत गए, किंतु ऋषि का ध्यान भंग न हुआ॥
एक समय उस वन में अपनी सहेलियों के साथ एक परम सुंदरी राजकुमारी का आगमन हुआ। कौतूहलवश राजकुमारी ने उस बाँबी में चमकते हुए दो बिंदुओं को देखा और उन्हें कोई रत्न समझकर एक तिनके से कुरेद दिया। वह ऋषि की आँखें थीं। ऋषि की समाधि भंग हुई और वे क्रोध के स्थान पर राजकुमारी के लावण्य को देखकर विचलित हो गए। युगों की तपस्या के पश्चात भी मन में सुप्त वासना जाग उठी और उन्होंने राजकुमारी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। राजकुमारी विदुषी और विवेकशील थी। उसने ऋषि के पतन को भांप लिया और विनम्रतापूर्वक कहा, "हे ऋषिवर! मैं आपकी अर्धांगिनी अवश्य बनूँगी, किंतु आप एक माह पश्चात राजमहल पधारें।"
एक मास की अवधि बीतने पर ऋषि काम-मोहित होकर राजमहल पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अत्यंत वृद्ध, अशक्त और कुरूप स्त्री को देखा। ऋषि ने चकित होकर उससे राजकुमारी का पता पूछा। वह स्त्री बोली, "मैं ही वह राजकुमारी हूँ। यदि आप अभी भी मुझसे विवाह करना चाहते हैं, तो पहले इस कक्ष में मेरे साथ चलें।"
वह उन्हें एक एकांत कक्ष में ले गई जहाँ से तीव्र दुर्गंध आ रही थी। वहाँ अनेक पात्रों में राजकुमारी के शरीर का मल, मूत्र, थूक, रक्त, पित्त और अन्य विजातीय तत्व रखे हुए थे। राजकुमारी ने गंभीर स्वर में कहा: "हे महात्मन! जिस सौंदर्य पर आप मोहित होकर अपनी युगों की तपस्या को विस्मृत कर बैठे, वह इन्हीं अपवित्र वस्तुओं का एक सम्मिश्रण मात्र था। मैंने एक माह तक औषधि लेकर इन तत्वों को अपने शरीर से बाहर निकाला है। अब आप स्वयं ही विचार करें कि इस अस्थि-माँस के पुतले में ऐसा क्या था जो आपको अपनी साधना से श्रेष्ठ प्रतीत हुआ?"
ऋषि को तत्काल बोध हो गया। यह 'अशुचिता' केवल देह की नहीं, अपितु 'असत' के प्रति हमारे 'अज्ञान' की है। उनके ज्ञान-चक्षु खुल गए और मोह का आवरण छिन्न-भिन्न हो गया। उन्होंने उस विदुषी कन्या को नमन किया, जो अब साक्षात ज्ञान स्वरूपा देवी सरस्वती के रूप में उनके समक्ष प्रकाशित हो रही थीं। राजकुमारी का उद्देश्य शरीर से घृणा करना नहीं, अपितु शरीर की नश्वरता को समझाकर ऋषि को उस 'सत' की ओर ले जाना था जो इस देह का आधार है॥
यह कथा काम के परे जाने का मार्ग बताती है। काम के ऊपर भी एक सत है, किसी के लिए वह ब्रह्म है किसी के लिए प्रकृति, किसी के लिए जीव, किसी के लिए आत्मा, किसी के लिए सत्य और किसी के लिए ईश्वर, किसी के लिए कुछ और। आपके लिए ये श्री, शक्ति या सरस्वती कुछ भी हो सकती है। आपको अपने काम को उचित दिशा देकर सत में लगाना होगा। काम ऊर्जा वास्तव में एक तटस्थ शक्ति है, जैसे अग्नि—जो भोजन भी पका सकती है और घर भी जला सकती है। जब हमारी यह ऊर्जा 'असत' (नश्वर वस्तुओं या देह) पर केंद्रित होती है, तो वह 'आसक्ति' बन जाती है, जो अंततः केवल रिक्तता और दुःख देती है क्योंकि वह आधार स्वयं अस्थिर है। परंतु, जब इसी ऊर्जा का प्रवाह 'सत' (शाश्वत सत्य, सृजन या लोक-कल्याण) की ओर मोड़ दिया जाता है, तो वही कामना 'साधना' का रूप ले लेती है। सरल शब्दों में, जब तक इच्छा 'पाने' (To possess) के लिए है, वह असत है, जब वही इच्छा 'होने' (To be) या 'सृजन करने' के लिए जागृत होती है, तो वह सत की ओर पहला कदम है॥
- सत - वह जो उचित है, शाश्वत है, जो वास्तविक है॥
- असत - वह जो अनुचित है, नश्वर है, जो काल्पनिक है॥
शास्त्रों में एक उपाय है जिससे व्यक्ति स्वयं को समझ सकता है। शांति से ध्यान लगाकर अपने मन के विचारों को पहचानों। उन्हे रोको मत केवल चलने दो। जैसे कोई T.V चल रहा हो। ये दृश्य-दृष्टा का विवेक है हम इसे आगे फिर देखेंगे। शास्त्र कहता है: “दृश्या धीवृत्तयः साक्षी दृगेव न तु दृश्यते” — मन की वृत्तियाँ दृश्य हैं, आत्मा केवल साक्षी है। फिर उन इच्छाओं को चिन्हित करो, उनका मूल पहचानने का प्रयास करो, उन्हे वर्गिकित करो। देखो वह किस कारण उपजी, उसका मूल क्या था -
- इन्द्रियजन्य इच्छाएँ — रिरसा (स्वाद‑इच्छा), विवक्षा (कहने‑की‑इच्छा), शुश्रूषा (सुनने‑की‑इच्छा), दिदृक्षा (देखने‑की‑इच्छा), जिघ्रक्षा (सूँघने‑की‑इच्छा)
- देहजन्य आवश्यकताएँ — चिकित्सा (उपचार-इच्छा), क्षुधा (भूख), तृष्णा (प्यास/लोभ), लालसा (तीव्र‑इच्छा), लिप्सा (भोग‑इच्छा), अभिलाषा (मनोकामना), पिपासा (प्यास‑भाव), जिजीविषा (जीवन‑इच्छा)
- क्रियात्मक प्रवृत्तियाँ — युयुत्सा (युद्ध‑इच्छा), जिघांसा (हिंसा‑इच्छा), विजिगीषा (विजय‑इच्छा), सिसृक्षा (सृजन‑इच्छा)
- सांसारिक इच्छाएँ — वित्तेषणा (धन‑इच्छा), पुत्रेषणा (सन्तान‑इच्छा), लोकेषणा (लोक‑इच्छा)
- आध्यात्मिक आकांक्षाएँ — धर्मैषणा (धर्म-इच्छा), ब्रह्मैषणा (ब्रह्म-इच्छा), मुमुक्षा (मोक्ष‑इच्छा), तितिक्षा (सहन करने की इच्छा), प्सुपृक्षा (प्रश्न‑इच्छा), जिज्ञासा (ज्ञान‑इच्छा), मीमांसा (विचार‑अन्वेषण), उत्पिपठिषा (पढ़ने‑की‑इच्छा)
- नकारात्मक इच्छाएँ — जुगुप्सा (घृणा‑इच्छा), दिधुक्षा (भस्म-इच्छा), जिहीर्षा (हरण-इच्छा), दिप्सा (दम्भ भरने की इच्छा), विवित्सा (तोड़ना/भेदना-इच्छा)
फिर इन इच्छाओं का वर्गिकरण करके ये देखें की ये हैं क्या। इन वर्गों से आपको स्वयं को जानने का अवसर प्राप्त होगा। पुनः पुरुषार्थ पर वापस लौटते हैं। यह एक नीति कि पुस्तक है तो हम यहाँ केवल यथार्थ कर्म के विकल्पों पर ही बात करेंगे। पहले अपनी इच्छाएँ और विकल्पों को परखें और समझे कि वह किस प्रकार कि इच्छा है। ये तीन भेद को विस्तार से समझे इनके अंतर्गत ही आपका निर्णय सरल होगा॥ -
1. नित्य - अनित्य (Permanence - स्थायित्व) -
नित्यवस्त्वेकं ब्रह्म तद्व्यतिरिक्तं सर्वमनित्यम्। नित्य वस्तु केवल ब्रह्म है, उसके अतिरिक्त सब कुछ अनित्य है।
अयमेव नित्यानित्यवस्तुविवेकः॥ यही नित्यानित्य वस्तु का विवेक है।
— तत्त्वबोध (आदि शंकराचार्य)
सभी विकल्पों में से उसे चुनों जो नित्य है जो स्थाई है। पूर्ण स्थाई ना सही परंतु दूसरे विकल्पों से अधिक स्थाई भी पर्याप्त है। जैसे सुंदरता से कौशल को वरियता देनी चाहिए और कौशल से ज्ञान को। जैसे पदवी अनित्य है परंतु कौशल और संबंध नित्य है, वे पदवी ना रहने के उपरांत भी रहेंगे। जैसे धन अनित्य है परंतु उसे अर्जित कर पाने का कौशल नित्य है। प्रोग्रामिंग लैंगवेजिस अनित्य है परंतु 'लॉजिक' (तर्क), 'एल्गोरिदम' के आधारभूत सिद्धांत का ज्ञान 'नित्य' है। जैसे विश्लेषण के सॉफ्टवेयर अनित्य है परंतु 'सांख्यिकी' का ज्ञान नित्य है, ये हर जॉब में आपका सहयोग देगा। इसी प्रकार आप हर कार्य को नित्यानित्य में बाँट सकते हैं॥
2. भूमा - वामा (Magnitude - विस्तार) -
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा। जहाँ कोई अन्य को नहीं देखता, अन्य को नहीं सुनता, अन्य को नहीं जानता—वह भूमा (अनन्त) है।
अथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम्॥ और जहाँ कोई अन्य को देखता है, अन्य को सुनता है, अन्य को जानता है—वह अल्प (सीमित) है।
— छान्दोग्य उपनिषद् (अध्याय ७, खण्ड २४, मन्त्र १)
हमारी इच्छाएँ दो प्रकार की होती हैं — कुछ हमें विस्तार और आत्मिक विकास की ओर ले जाती हैं (भूमा), और कुछ केवल प्रियता और आकर्षण की ओर खींचती हैं (वामा)। कुछ वस्तुएँ बहुत ही छोटी होती हैं आप उन्हे शीघ्रता से सीख सकते हैं। कुछ वस्तुओं को समझने में पूरी आयू कम पड़ती है। जैसे सैल्समैन बनना सरल है, परंतु बी॰डी॰एम॰ बनना दीर्घसाध्य है — इसमें वर्षों का अनुभव और गहन रणनीतिक सोच चाहिए। बालगीत लिखना प्रिय और सहज है, परंतु राग‑रागिनी का ज्ञान गहन दीर्घसाध्य है — इसमें निरंतर अभ्यास और समय लगता है। एक छोटी कविता लिखना सरल है, परंतु काव्यशास्त्र और छन्दों का गहन अध्ययन करना दीर्घसाध्य है। एक सॉफ्टवेयर चलाना सरल है परंतु उसे बनाना जटिल और दीर्घसाध्य है। ये कार्य के अनुसार भी बदल सकता है। जैसे राग-रागिनी में एक छंदबद्ध गीत लिखना अधिक दीर्घसाध्य है इसके स्थान पर साधारण गीत लिखना आपको ख्याति दिला सकता है बहुत ही शीघ्रता से परंतु वह वामा है भूमा नहीं।
ऐसी ही कुछ गीत अमर हो जाते हैं, कुछ काव्य अमर हो जाते हैं, कुछ नृत्य, कुछ परिधान, कुछ वेष-भूषाएँ, कुछ पकवान, कुछ कलाकृतियाँ अमर हो जाती हैं। हर मार्ग पर एक कुमार्ग (शॉर्टकट - अल्पकालिक प्रलोभन) होता है और एक कठिनाई वाला पूर्ण मार्ग। हमेशा पूर्ण मार्ग को चुने जीवन में रसानंद लेने का भी एक उचित मार्ग है। इस प्रकार भूमा-वामा का भेद हर काम (इच्छा) में समझ आना चाहिए॥
3. श्रेय - प्रेय (Road - मार्ग) -
अन्यच्छ्रेयो अन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः। श्रेय (परम कल्याण) और प्रेय (सांसारिक सुख) दोनों अलग-अलग हैं। ये दोनों भिन्न प्रयोजनों वाले होकर मनुष्य को अपनी ओर खींचते हैं।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते॥ इन दोनों में से जो श्रेय मार्ग को चुनता है, उसका कल्याण होता है, किन्तु जो केवल प्रिय (प्रेय) को चुनता है, वह जीवन के वास्तविक लक्ष्य से चूक जाता है॥
— कठोपनिषद् (1.2.1)
संसार में कोई भी कार्य हो उसके न्यूनतम दो उद्देश्य होते हैं — एक तो वह कार्य जो हमें वास्तविक कल्याण (श्रेय) की ओर ले जाता है, और दूसरा वह जो केवल सांसारिक सुख (प्रेय) प्रदान करता है। आपको किसी भी प्रकार की कार्य सिद्धि करनी हो। आईएएस बनना हो, व्यवसाय करना हो, कलाकार, खिलाड़ी या कुछ और भी तो भी आप हर कार्य में एक क्षण बैठ कर ये सोचें की क्या आप जो कार्य कर रहे हैं वह श्रेय है या प्रेय। आप उसे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह आपको अपने उद्देश्य की ओर ले जाएगा या आप इंद्रिय सुख के लिए मात्र कर रहे हैं। उदाहरण के लिए यदि आप प्रातःकाल उठकर व्यायाम, ध्यान, स्वाध्याय करते हैं तो वह श्रेय है यदि आप फोन चलाने लगते हैं या टीवी देखने लगते हैं तो वह प्रेय है। प्रेय की भी अपनी जगह है, परंतु हम अधिक प्रेय वस्तुओं में लिप्त नहीं हो सकते हैं यदि हम कोई उद्देश्यपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं॥
एक ही वस्तु कहीं श्रेय तो कहीं प्रेय हो सकती है। मदिरा का भोग प्रेय है परंतु उससे दवा बनाना श्रेय है। संगीत अधिकतर प्रेय है परंतु प्रभू समर्पित छंदोबद्ध रागाधारित कृति (भजन) गाना श्रेय है। इस प्रकार कार्य और उद्देश्य ये निर्धारित करेगा की क्या श्रेय है और क्या प्रेय। काम केवल शारीरिक या बौद्धिक नहीं है, यह भावनात्मक भी है। सहानुभूति, करुणा और प्रेम भी काम के परिष्कृत रूप हैं। 'प्रेय' मार्ग पर प्रेम 'स्वार्थ' होता है, जबकि 'श्रेय' मार्ग पर वही प्रेम 'सेवा' बन जाता है॥
- श्रेय (परम कल्याण) - वह कार्य जो हमें वास्तविक कल्याण, स्थायित्व, और आत्म-संतुष्टि की ओर ले जाता है। यह दीर्घकालिक और स्थायी सुख प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, शिक्षा, स्वास्थ्य, नैतिक व्यवसाय, और समाज सेवा श्रेय के कार्य हैं।
- प्रेय (सांसारिक सुख) - वह कार्य जो केवल तात्कालिक और इंद्रिय सुख प्रदान करता है, लेकिन वास्तविक कल्याण की ओर नहीं ले जाता। यह अस्थायी और कभी-कभी हानिकारक भी हो सकता है।
इस लिए सदा ये प्रश्न पूछते रहें कि क्या ये सत है या असत। इसके लिए उसे 3 स्तर पर देखें
- नित्य - अनित्य (Permanence - स्थायित्व) - सदा शाश्वत मार्ग को चुनों
- भूमा - वामा (Magnitude - विस्तार) - सदा दीर्घसाध्य मार्ग को चुनों
- श्रेय - प्रेय (Road - मार्ग) - सदा कल्याणकारी मार्ग को चुनों
| सूत्र | असत (त्याज्य ) | सत (ग्राह्य) |
|---|---|---|
| नित्य-अनित्य | पद, वेतन, सोशल मीडिया लाइक्स | तर्क, मानवीय मूल्य, लोक कल्याण |
| भूमा-वामा | शॉर्टकट कोर्स, सतही जानकारी | गहन शोध, शास्त्रीय ज्ञान, दीर्घकालिक लक्ष्य |
| श्रेय-प्रेय | आलस्य, मनोरंजन (Scrolling), दीर्घसूत्रता | अनुशासन, स्वाध्याय, स्वास्थ्य |
ये हर सांसारिक वस्तु पे काम करेगा। और ये सूत्र आपको मोह में पड़ने से भी बचाएगा और आपकी काम ऊर्जा को उचित दिशा देकर आपको सफलता के सोपान पर भी चढ़ा देगा। इसलिए, जब भी मन विचलित हो, स्वयं से पूछें कि क्या मैं किसी ऐसी चीज़ के पीछे भाग रहा हूँ जो कल नहीं रहेगी? सत को चुनना ही बुद्धिमानी है, क्योंकि जो टिकता नहीं, वह सुख भी स्थायी नहीं दे सकता। आज आपके पास जो कुछ भी है—आपका पद, आपका ज्ञान या आपकी संपत्ति—उसमें से वह क्या है जो आपके चले जाने के बाद भी 'सत' रूप में जीवित रहेगा?" जैसे एक जटिल एल्गोरिदम का निर्माण केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं, अपितु तार्किक सौंदर्य (Logical Beauty) का सृजन है—यही बौद्धिक 'काम' है। उसी प्रकार आप भी अपने काम को दिशा दो॥
॥ उपसंहार: पुरुषार्थ (काम) ॥
स यो ह वै तत्परं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति
जो उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है।
आप्तकामो ह्यस्मिन्नेवात्मनि सर्वकामः
वह आत्मा में ही सभी कामनाओं को पूर्ण मानकर, कामनारहित और संतुष्ट (आप्तकाम) हो जाता है।
— मुण्डकोपनिषद् (३.२.९)
- संभोग से समाधि (Evolution of Desire) -
- काम ऊर्जा अशुद्ध नहीं है, यह सृष्टि का मूल बीज है। ऋग्वेद और गीता के प्रमाणों से सिद्ध है कि धर्मसम्मत काम स्वयं ईश्वर का रूप है।
- सृष्टि का सृजन असत रूपी काम से हुआ और जन्म मरण का बंधन भी काम की देन है।
- जीवन व्यक्ति को रसानंद लेने के लिए मिलता है। रस प्रभू का रूप हैं।
- 'संभोग' केवल प्रजनन नहीं, अपितु पितृ-ऋण से मुक्ति और 'ऋत' (सत्य/नियम) का निर्वहन है।
- वासना का दमन (Suppression) मानसिक विकृति लाता है, जबकि उसका अनुभव और उदात्तीकरण (Sublimation) 'भुक्ति से मुक्ति' या समाधि का मार्ग प्रशस्त करता है (जैसे गोरखनाथ के शिष्य की कथा)।
- कर्म की त्रिवेणी (Three Facets of Action) -
- सकर्म - फल की इच्छा के साथ किए गए शुभ कार्य।
- विकर्म - पतन की ओर ले जाने वाले निषिद्ध कर्म।
- अकर्म - कर्मयोग की पराकाष्ठा, जहाँ कर्म करते हुए भी फल के प्रति अनासक्ति रहती है। यही 'काम-वासना' को 'काम-योग' में बदलता है।
- इच्छाओं का सूक्ष्म वर्गीकरण (Categorization of Desires) -
- साधक को अपनी इच्छाओं को पहचानना चाहिए: जैसे दिदृक्षा, शुश्रूषा, क्षुधा, जिजीविषा, सिसृक्षा, मुमुक्षा, जिज्ञासा इत्यादि।
- नकारात्मक इच्छाओं (जैसे जुगुप्सा, जिघांसा) को पहचानकर उनका त्याग आवश्यक है।
- विवेक के तीन व्यावहारिक सूत्र (The Triple Filter of Discernment) -
- नित्य - अनित्य (Permanence) - क्षणभंगुर (पद, वेतन) के स्थान पर शाश्वत (तर्क, कौशल, मानवीय मूल्य) का चयन करना।
- भूमा - वामा (Magnitude) - अल्पकालिक प्रलोभनों (वामा) के बजाय विस्तार और गहन विशेषज्ञता (भूमा) वाले कठिन मार्ग को चुनना।
- श्रेय - प्रेय (The Road) - केवल प्रिय लगने वाले (प्रेय) कार्यों के स्थान पर वास्तविक आत्म-कल्याण (श्रेय) करने वाले कार्यों को प्राथमिकता देना।
- दृश्य-दृष्टा विवेक -
- मन की वृत्तियाँ 'दृश्य' हैं और आप 'साक्षी' (Observer) हैं। इस तटस्थता से ही काम ऊर्जा को सही दिशा दी जा सकती है।
| सूत्र (Principle) | करने योग्य कार्य (Actionable Insight) | मूल मंत्र (Key Takeaway) |
|---|---|---|
| १. ऊर्जा का रूपांतरण | 'पाने' (To Possess) वाली कामनाओं के स्थान पर 'सृजन' (To Create) की कामना श्रेष्ठ हैं। | "संग्रह 'असत' है, सृजन 'सत' है।" |
| २. नित्यानित्य विवेक | चुनाव करते समय उसे प्राथमिकता दें जो स्थाई है। | "जो टिकता नहीं, वह सुख भी स्थाई नहीं देता।" |
| ३. भूमा का चुनाव | शॉर्टकट (वामा) के लालच से बचें। किसी भी विषय की गहन विशेषज्ञता (Deep Mastery) का कठिन मार्ग चुनें। | "भूमा (विस्तार) ही सुख है, अल्प में सुख नहीं।" |
| ४. श्रेय बनाम प्रेय | हर निर्णय पर पूछें: यह केवल मनोरंजन (प्रेय) है या मेरा कल्याण (श्रेय) करेगा? | "सुखद मार्ग फिसलन भरा है, कल्याणकारी मार्ग ठोस है।" |
| ५. अकर्म का अभ्यास | कार्य को 'फल' की लालसा से चिपक कर नहीं, अपितु एक साधना या कर्तव्य मानकर पूर्ण निष्ठा से करें। | "कर्म से मत भागो, कर्म के फल की 'आसक्ति' से भागो।" |
| ६. रसानंद आवश्यक है | नश्वरता (असत) को पहचानें. आधार (आत्मा/सत्य) से जुड़ें। | "रस (तत्व) शाश्वत है।" |
| ७. गृहस्थ धर्म | काम का दमन न करें, उसे मर्यादा (धर्म) के भीतर रहकर पितृ-ऋण उतारने और सृजन का साधन बनाएं। | "दमन विकृति है, नियमन (संयम) प्रगति है।" |
आज आपके पास मौजूद 5 चीज़ों की सूची बनाएँ और देखें कि उनमें से कौन सी 'सत' है और कौन सी 'असत'? अपने कौशलों की भी सूची बनाकर देखें कि उनमें से कौन सा सत है और सा असत। इससे आपको अपने जीवन में तत्कालिक प्रभाव देखने को मिलेंगे। आप जो भी कर्म कर रहे हैं एक बार ये देखें कि क्या वह -
- आपको अपने कर्म में प्रेम हैं।
- आपको अपने कर्मफल पे आसक्ति है कि नहीं।
- आपका प्रतिफल (कृति) कितना नित्य है।
प्रभु आपको एक रसमय जीवन दें और आपकी समस्त कामनाएँ पूरीं करें। आशा करता हूँ की आप अपने काम को उचित दिशा देना सीख जाएँगे॥
