॥ वैदिक जीवन ॥
॥ पुरुषार्थ (धर्म)॥
पुरुषार्थ की दृष्टि से धर्म की व्याख्या और धर्म परायण होने के लिए एक सूत्र॥
न धर्मोऽर्थमुत्सृजेत्तु न चार्थो धर्ममुत्सृजेत्। धर्म को अर्थ (धन) का त्याग नहीं करना चाहिए, और न ही अर्थ को धर्म का त्याग करना चाहिए। न च कामोऽर्थधर्मौ च त्रयमेतन्निषेवितम्॥ काम (इच्छाओं) को भी अर्थ और धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, इन तीनों का समान रूप से सेवन करना चाहिए॥ — महाभारत (शांतिपर्व, अध्याय १६७, श्लोक ८)

पुरुषार्थ
आधुनिक युग में व्यक्ति का जीवन को सरल बनाने के कुछ नियमों का जोड़ है वर्ण, आश्रम और पुरुषार्थ। आधुनिक युग में जहाँ हमारे पास सुख-सुविधाओं के असीमित साधन हैं, वहीं जीवन के मूल उद्देश्य को लेकर एक गहरा भटकाव भी है। हम धन कमाते हैं, सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हैं, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता है। ऐसा क्यों है? इसका उत्तर हमारी वैदिक जीवनशैली के एक अत्यंत मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक ढांचे में छिपा है, जिसे 'पुरुषार्थ' कहा जाता है॥
पुरुषार्थ 4 रूपों में विभाजित होता है, जिसे कहते हैं, धर्म, अर्थ, कर्म और मोक्ष। हम इन्हे एक बार सरल रूप में समझेंगे तत्पश्चात हम वापस पुरुषार्थ पर आएंगे समझने के लिए कि इसका मूल उपयोग कैसे करें। हम यहाँ से पुरुषार्थ समझाने के प्रयास का आरम्भ करते हैं। इस अध्याय में हम समझने का प्रयास करते हैं कि पुरुषार्थ कि दृष्टि से धर्म का अर्थ क्या है॥
परिभाषा और दार्शनिक अर्थ
धर्म का शाब्दिक अर्थ है "जो धारण किया जाए" — "धारयति इति धर्मः"। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान या पूजा-पाठ नहीं, अपितु सत्य, न्याय, दया, कर्तव्य, मर्यादा, और सामाजिक उत्तरदायित्व का समुच्चय है। वैशेषिक सूत्र (1.1.2) के अनुसार, "यतो अभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः" — जिससे लौकिक और पारलौकिक दोनों कल्याण हों, वही धर्म है। उपरोक्त्त श्लोक में एक पंक्ति है — "न धर्मोऽर्थमुत्सृजेत्", अर्थात धर्म के विरुद्ध जाकर अर्थ का अर्जन नहीं करना चाहिए। धर्म का मूल अर्थ इन संदर्भों में प्रयुक्त होता है - नैतिकता, ऋत, अनुशासन, न्याय इत्यादि। धर्म की सबसे अधिक प्रचलित और सर्वमान्य व्याख्या इस श्लोक में मिलती है॥
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धैर्य (धृति), क्षमा, मन पर नियंत्रण (दम), चोरी न करना (अस्तेय), शुद्धि (शौच) और इंद्रियों को वश में रखना (इन्द्रियनिग्रह)। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥ बुद्धि (धीः), ज्ञान (विद्या), सत्य और अक्रोध — ये धर्म के दस लक्षण हैं॥ — मनुस्मृति
धर्म व्यक्ति को नैतिकता, निष्ठा, सहानुभूति, और सामाजिक दायित्व के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। यह जीवन के सभी क्षेत्रों — व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, व्यावसायिक — में संतुलन और मर्यादा स्थापित करता है। धर्म के बिना अर्थ और काम अनुचित, असंतुलित और विध्वंसक हो सकते हैं॥
धर्म का अर्थ बहुआयामी है, ये न्याय भी है, ये कर्तव्य भी है, ये अनुशासन भी है, ये नियम भी है और ये संतुलन भी है। ये बहुआयामी होने के कारण इसका मात्र केवल कोई एक सूत्र ढूँढना जो ये बताए की क्या करने से धर्म की प्राप्ति हो लगभग असंभव है। चुंकि इस पुस्तक में हम व्यक्तिगत रूप से जीवन कैसे जीना चाहिए इस पर विचार कर रहे हैं तो हम धर्म को व्यक्तिगत मान कर चलते हैं॥
एक कथा धर्म के इस रूप को सरल रूप में समझा सकती है। एक बार एक ऋषि नदी किनारे बैठे थे। उन्होंने देखा कि एक बिच्छू पानी में डूब रहा है। ऋषि ने उसे बचाने के लिए अपने हाथ से उठाया, लेकिन बिच्छू ने उन्हें डंक मार दिया। दर्द के कारण ऋषि का हाथ हिला और बिच्छू फिर पानी में गिर गया। ऋषि ने उसे दोबारा उठाया, बिच्छू ने फिर डंक मारा। ऐसा कई बार हुआ। पास खड़े एक व्यक्ति ने पूछा, "महाराज, जब यह आपको बार-बार काट रहा है, तो आप इसे बचा क्यों रहे हैं?" ऋषि ने शांत भाव से कहा: "डंक मारना बिच्छू का धर्म (स्वभाव) है और बचाना मेरा धर्म। जब वह अपना बुरा धर्म नहीं छोड़ रहा, तो मैं अपना अच्छा धर्म क्यों छोड़ूँ?" इस कथा को धर्म की सबसे सरल व्याख्या कहा जा सकता है। यद्यपि धर्म की परिभाषा थोड़ी जटिल है, क्योंकि धर्म व्यक्ति, वस्तु, देश, काल, और स्थिति के अनुसार बदलता रहता है। केवल धर्म को समझने के लिए कई कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। परंतु कोई एक सूत्र यदि किसी को आत्मसात करना हो, जो सबसे सरल हो और गूढ़ भी तो वो निम्नलिखित होगा॥
धर्माजन का सूत्र
ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्य॑जायत। परमेश्वर के प्रदीप्त संकल्प (तप) से ऋत (सृष्टि के नियम) और सत्य (अस्तित्व) प्रकट हुए। ततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ समु॒द्रो अ॑र्ण॒वः॥ उसके बाद अंधकारमयी रात्रि उत्पन्न हुई और फिर जलमय अथाह समुद्र उत्पन्न हुआ॥ — ऋग्वेद (१0.१९०.१)
शास्त्रो में कथा आती है कि कर्म कब उत्पन्न होता है। एक बार एक राजा भेष बदल कर प्रजा के बीच घूम रहे थे। तो राजा ने अपने मंत्री से कहा की मुझे नहीं पता क्यूँ परंतु ये लकड़ी वाले को देख कर मुझे इसे मारने का मन कर रहा है। तो मंत्री ने कहा की मैं उससे बात करके आता हूँ। मंत्री ने उस लकड़ी वाले से प्रश्न किया तो पता चला की वह कहीं दूर देश से चंदन की लकड़ी बेचने के लिए यहाँ आया था और उसे कोई क्रेता नहीं मिल रहा था। तो बातों बातों में उसने मंत्री को कहा की राजा बहुत बूढ़ा हो चला है यदि उसकी मृत्यु हो जाए तो मैं अपना चंदन राजभवन को बेच दूँगा। उससे ना केवल मुझे लाभ होगा अपितु मेरा प्रचार भी हो जाएगा। मंत्री को यह बात समझ आ गई की क्यूँ राजा को उस लकड़ी वाले को मारने का मन कर रहा था। मंत्री को एक युक्ति सूझती है, वह राजा को कहता है महल में यज्ञ की सारी लकड़ी मैं लेकर आऊँगा। और व्यवसायी को कहता है कि राजा को दैनिक रूप से चन्दन की लकड़ी चाहिए, यज्ञ के लिए। अब व्यवसायी को लाभ होने लगता है और वो चाहता है कि राजा जीवित रहे और फलता फूलता रहे। अब जब राजा पुनः देखता है तो उसे अच्छा लगता है। और राजा कि जिघांसा भी समाप्त हो गई॥
प्रश्न फिर वही है की कर्म कब उत्पन्न होता है। तो शास्त्र कहते हैं मनसा, वाचा, कर्मणा अर्थात कर्म मन से उत्पन्न होकर वाणी में निवास पाता है, फिर वाणी से कर्म में परिणत होता है। यदि उस लकड़ी वाले नें मंत्री को यह बात कही तो उसे कहने से पहले वह उस बात पर सहस्त्रों बार विचार कर चुका होगा। उसकी अपचिकीर्षा (अपकार-इच्छा) ही राजा के प्रति जिघांसा (मारने-इच्छा) में परिणत हुई। और यही कर्म पर भी लागू होता है। की कोई कार्य करने से पहले व्यक्ति उसे स्हस्त्रों बार सोच-विचार कर, सहस्त्रों बार वाणी में कह चुका होता है। कर्म कभी भी अचानक उत्पन्न नहीं होता॥
तो अब फिर से प्रश्र उठता है की धर्म के मार्ग फिर कैसे पाया जाए। तो शास्त्र कहते हैं की मन को संतुलित करो। जब आपके मन में ऋत होगा और वाणी में सत तो कर्म में भी धर्म स्वयं ही आ जाएगा। धर्म क्या है? जो मन में है, वही वाणी में आए, और वही कर्म में उतरे॥
- ऋत (ब्रह्मांडीय व्यवस्था और मानसिक संतुलन) - ऋत वह 'प्राकृतिक नियम' या 'कॉस्मिक ऑर्डर' है जिससे पूरा ब्रह्मांड संचालित होता है।
कर्म की प्रक्रिया में ऋत का अर्थ है विचारों की शुद्धता और संतुलन। ऋत केवल बाहरी व्यवस्था नहीं, अपितु अंतर्मन का वह अनुशासन है जहाँ कोई
विकार (जैसे क्रोध, लोभ या ईर्ष्या) नहीं होता। जैसे व्यापारी के मन में लोभ आया, तो उसका व्यक्तिगत 'ऋत' भंग हो गया।
किसी भी वस्तु की अति नहीं होनी चाहिए, एक संतुलन बनाना मन में वह ही ऋत है। इसे प्राप्त करने का मार्ग
निरंतर आत्म-अवलोकन (Self-observation) है। जब हम अपने विचारों के प्रति सजग हो जाते हैं और नकारात्मकता को बीज रूप
में ही पहचान लेते हैं, तब मन संतुलित रहता है। नियमित स्वाध्याय और ध्यान से मन की चंचलता को ऋत के साथ जोड़ा जा सकता है।
अपने मन के विचारों को पहचानो और गिनते रहो। ये चित्त-वृत्ति निरोध का प्रथम सोपान है। ये विश्लेषण भी आवश्यक है इससे आप अपने
मन के प्रति सजग रहोगे और इससे पहले की आप किसी एक विचार की अति करो आप उसे रोक कर वापस संतुलन बना पाओगे।
ध्यान रहे आपको अपने मन के विचारों को रोकना नहीं है केवल उनकी अति नहीं होने देनी हैं।
ऐसे कुछ ऊपायों से आप मन में ऋत स्थापित कर पाओगे॥
अब आप उन विचारों में न्याय (तर्क, कल्याण, न्याय) जोड़ दो। तदोपरांत जो आएगा वो आपका अपना स्वाभाव होगा। आपको दमन नहीं करना स्वीकार करना है और उन विचारों को दिशा देनी हैं। बुरे से बुरा विचार भी कहीं कहीं पर श्रेष्ठ होता है। चलो हिंसा से इसे समझते हैं। मात्र अहिंसा ऋत नहीं होती। सनातन शास्त्रों में एक शब्द है क्रोध (वह क्रोध जो अनुचित है), एक है मन्युः (वह क्रोध जो उचित है)। किसी को मारना हो सकता है हत्या (निर्दोष को मारना) और वध (दोषी को मारना)। क्षमा केवल याचना के उपरांत दी जाती है। आप बिना किसी क्षमा याचना के यदि सहज ही क्षमा दे देते हैं तो आप कायर हैं। ऐसे ही रोष को दबाने के भी दो शब्द है - अमर्ष (अन्याय के विरुद्ध अंतर्मन में रोष) एवं अक्षमा (इर्ष्या जन्य अंतर्मन में रोष)। न्याय-अन्याय के विरुद्ध युद्ध के भी दो प्रकार हैं धर्मयुद्ध एवं कूटयुद्ध। प्रेम की भी सीमा है उसके पार वह मोह (अंध अुनराग) कहलाता है। आप यदि अपने विचारों से पुर्णतः सामंजस्य में हैं तो आप ऋत में हैं। भगवान परशुराम और ऋषि दुर्वासा बहुत ही क्रोधि स्वाभाव के थे। परंतु फिर भी सदा ऋत में थे। क्यूँकि वे अपने स्वाभाव को जानते थे। ऐसे ऋषियों को 'ऋतस्य गोपा' या 'ऋतस्थित' भी कहा जाता है। तो अपने स्वभाव को पहचानो उसे न्याय संगत बनाओ और उस स्वाभाव से प्रेम करो यही ऋत है। किसी भी भाव की अति ना करना ही ऋत है। ऋत ब्रह्मांडिय संतुलन है॥
- सत (वाणी की सत्यता) - जब मन का संतुलन (ऋत) वाणी में उतरता है, तो वह 'सत' या सत्य बन जाता है।
यहाँ सत्य का अर्थ केवल सच बोलना नहीं, अपितु विचार और वाणी में एकरूपता होना है॥
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् । सत्य बोलो, प्रिय बोलो, परंतु अप्रिय सत्य न बोलो। प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥ प्रिय झूठ भी मत कहो, यही सनातन धर्म है॥ — मनुस्मृति (4.138)
जो मन में ऋत के रूप में स्थित है, वही जब वाणी के माध्यम से बाहर आता है, तो वह सत है। यदि मन में कल्याण का भाव है, तो वाणी कभी अहितकारी नहीं होगी। इसे मौन और विवेकपूर्ण संभाषण से प्राप्त किया जा सकता है। बोलने से पहले यह विचार करना कि "क्या यह आवश्यक है, क्या यह सत्य है और क्या इससे किसी का कल्याण होगा?" वाणी को सत की ओर ले जाता है। व्यापारी ने जब अपनी इच्छा को वाणी दी, तो उसने अपने नकारात्मक विचार को कर्म की दिशा में पहला ठोस कदम दे दिया॥
- धर्म (ऋत और सत का स्वाभाविक परिणाम) - धर्म कोई क्रिया नहीं, अपितु जीवन जीने की वह अवस्था है जहाँ आपके कर्म ब्रह्मांडीय नियमों के अनुकूल होते हैं।
शास्त्र कहते हैं कि यदि आधार (ऋत) और माध्यम (सत) शुद्ध हैं, तो परिणाम (धर्म) स्वतः ही प्रकट होगा। परंतु इसके ऊपर भी कर्म में एक संयम बर्तना आवश्यक है,
आप ये ध्यान देना चाहिए की आपका कर्म स्वहित, परहित, लोकहित में हो। यथा संभव आपको इसे इन तीनों के लिए लाभकारी बनाना चाहिए। यदि केवल
एक के लिए भी लाभकारी हो और बाकी के लिए हानिकारक न हो, तो भी वह धर्म के अनुरूप होगा। परंतु यदि इसमें कभी आपको चुनना पड़े तो उसके लिए
एक सिद्धांत मैं आपको स्मरण कराना चाहूँगा॥
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। कुल (परिवार) के हित के लिए एक व्यक्ति का त्याग किया जा सकता है। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥ ग्राम के हित के लिए कुल का, जनपद के हित के लिए ग्राम का और आत्म-कल्याण (सत्य) के लिए पूरी पृथ्वी का त्याग किया जा सकता है॥ — विदुर नीति (महाभारत, उद्योग पर्व 37.17)
इस श्लोक में एक दर्शन है की आत्म कल्याण अथवा सत्य के लिए पूरी पृथ्वी को भी त्यागा जा सकता है यही धर्म है॥
धर्म की रक्षा के सूत्र
धर्म सारे संसार को धारण करने वाला आधार है और धर्म एक चक्र की भाँति घूमता रहता है। यदि आज आप धर्म की रक्षा करते हैं, तो वह कल आपकी रक्षा करेगा। यदि आज आप धर्म को त्याग देते हैं, तो कल धर्म आपको त्याग देगा। इसलिए धर्म केवल स्वयं तक सीमित रहने वाली वस्तु नहीं है, अपितु यह वह आधार है जिस पर संपूर्ण समाज टिका होता है। "धर्मो रक्षति रक्षितः" अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। जब समाज में धर्म (न्याय और मर्यादा) सुरक्षित होता है, तभी समाज सुखी और भयमुक्त होता है। शास्त्रों का उद्घोष है— "आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्" (आते हुए आततायी का बिना विचार किए वध कर देना चाहिए)॥
वित्तं देहं तथा बुद्धिं धर्मरक्षार्थमुत्सृजेत्। धर्म की रक्षा के लिए व्यक्ति को अपना धन, शरीर (बल) और बुद्धि समर्पित कर देनी चाहिए। धर्मेण रक्षितो लोकः सुखमेव प्रपद्यते ॥ क्योंकि धर्म द्वारा रक्षित यह संसार ही वास्तविक सुख और शांति को प्राप्त करता है॥ — नीतिशतक, हितोपदेश
धर्म की रक्षा के लिए हमें इन तीन स्तरों पर शस्त्र और शास्त्र का उपयोग करना होता है -
- बुद्धि (शास्त्र) - यह वैचारिक रक्षा है। जब अधर्म तर्क और कुतर्कों के माध्यम से समाज को भ्रमित करता है, तब बुद्धि और शास्त्र के माध्यम से सत्य की स्थापना करना धर्म-रक्षा है॥
- बल (शस्त्र) - यह भौतिक रक्षा है। जहाँ शांतिपूर्ण संवाद विफल हो जाए और असुरक्षा का वातावरण हो, वहाँ शारीरिक सामर्थ्य और शस्त्र के माध्यम से न्याय की रक्षा करना अनिवार्य हो जाता है॥
- धन (संसाधन) - यह संरचनात्मक रक्षा है। धर्म के कार्यों, शिक्षा, और न्यायपूर्ण व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए धन का सदुपयोग करना भी धर्म-रक्षा का ही एक रूप है॥
समाज की सुख-शांति किसी राजा या सरकार पर नहीं, अपितु इस बात पर निर्भर करती है कि उस समाज के व्यक्ति अपने संसाधनों (धन, बल, बुद्धि) का कितना अंश धर्म की रक्षा में लगाते हैं। "धर्मो रक्षति रक्षितः" का यही व्यावहारिक स्वरूप है॥
॥ उपसंहार: पुरुषार्थ (धर्म) ॥
- धर्म का वास्तविक स्वरूप - धर्म केवल पूजा-पाठ या अनुष्ठान नहीं, अपितु "धारयति इति धर्मः" के अनुसार वह तत्व है जो संपूर्ण सृष्टि और समाज को धारण करता है। यह नैतिकता, न्याय, कर्तव्य और अनुशासन का बहुआयामी समुच्चय है।
- पुरुषार्थों में संतुलन - जीवन की पूर्णता के लिए धर्म, अर्थ और काम का समान सेवन आवश्यक है। श्लोक "न धर्मोऽर्थमुत्सृजेत्" के अनुसार, धर्म के विरुद्ध जाकर धन अर्जन (अर्थ) करना और केवल इच्छाओं (काम) के पीछे भागना आत्मघाती है।
- धर्म प्राप्ति का मनोवैज्ञानिक सूत्र - कर्म कभी अचानक उत्पन्न नहीं होता, वह 'मनसा-वाचा-कर्मणा' के मार्ग से गुजरता है।
धर्म की स्थापना के लिए तीन चरणों पर कार्य करना अनिवार्य है:
- ऋत (मनसा) - विचारों की शुद्धता और मानसिक संतुलन। अपने नैसर्गिक स्वभाव को पहचानना और न्याय-अन्याय के बीच विवेकपूर्ण संतुलन बनाना।
- सत (वाचा) - विचारों और शब्दों की एकरूपता। वाणी ऐसी हो जो सत्य हो, प्रिय हो और जिसमें लोक-कल्याण का भाव हो।
- धर्म (कर्मणा) - जब ऋत और सत आचरण में उतरते हैं, तो वह 'धर्म' बनता है।
- कर्म की प्राथमिकता का सिद्धांत - धर्म के मार्ग पर चलते समय यदि हितों में टकराव हो, तो 'विदुर नीति' का अनुसरण करना चाहिए—कुल के लिए व्यक्ति का, ग्राम के लिए कुल का, और आत्म-कल्याण (सत्य) के लिए पूरी पृथ्वी का त्याग किया जा सकता है।
- लोकहित का त्रिकोण - श्रेष्ठ कर्म वही है जो स्वहित, परहित और लोकहित तीनों की कसौटी पर खरा उतरे। यदि इनमें से किसी एक का भी कल्याण हो और शेष को हानि न हो, तो वह धर्म है।
- धर्मो रक्षति रक्षितः (धर्म-रक्षा) - धर्म एक चक्र है, यदि आप इसकी रक्षा करेंगे, तो यह आपकी रक्षा करेगा। समाज की सुख-शांति
इस पर निर्भर है कि व्यक्ति अपने साधनों का उपयोग धर्म की रक्षा में कैसे करता है -
- बुद्धि (शास्त्र) - वैचारिक शुद्धता और सत्य की स्थापना।
- बल (शस्त्र) - अन्याय और आततायियों के विरुद्ध भौतिक रक्षा।
- धन (संसाधन) - न्यायपूर्ण व्यवस्था और लोक-कल्याण के लिए संसाधनों का नियोजन।
निष्कर्ष - धर्म वह धुरी है जो मनुष्य को पशुता के धरातल से उठाकर पुरुषार्थ के शिखर तक ले जाती है। यह स्वयं के विचारों और ब्रह्मांडीय व्यवस्था (Cosmic Order) के बीच का सामंजस्य है।
| स्तर (मनुष्य का साधन) | मार्गदर्शक सिद्धांत | क्रियात्मक स्वरूप (क्या करें?) | अंतिम लक्ष्य (साध्य) |
|---|---|---|---|
| मनसा (मन) | ऋत (कॉस्मिक ऑर्डर) | आत्म-अवलोकन और विचारों में संतुलन रखना। | मानसिक शुद्धता |
| वाचा (वाणी) | सत (सत्यता) | विचार और शब्दों में एकरूपता (प्रिय और हितकारी सत्य)। | विश्वसनीयता |
| कर्मणा (कर्म) | धर्म (मर्यादा) | कर्म को स्वहित, परहित और लोकहित में संयोजित करना। | सामाजिक कल्याण |
| धर्म-रक्षा (संकल्प) | "धर्मो रक्षति रक्षितः" | बुद्धि, बल और धन का उपयोग न्याय और सत्य की रक्षा में करना | सर्वांगीण सुख (शांति) |
सदा स्वयं से प्रश्न पूछो कि क्या तुम जो कर रहे हो वह -
- तुम्हारे नैसर्गिक स्वाभाव से क्या मेल खाता है।
- तुम्हे ऋत और सत से रोक तो नहीं रहा।
- समाज के काम आ रहा है।
यदि हाँ तो फिर आपका कर्म धर्म की कसौटी पे उचित है। तो ये मार्ग करने योग्य है॥
