॥ वैदिक जीवन ॥


॥ तृतीय मार्ग ॥

ज्ञान की परिक्षा का तीसरा मार्ग। बिना जिसके ज्ञान को प्रमाणित करना कठिन है॥


पक्ष-प्रतिपक्ष-सिद्ध्यर्थं तृतीयं मार्गमुत्सृजेत्। पक्ष और प्रतिपक्ष की सिद्धि के लिए तीसरे मार्ग का आश्रय लेना चाहिए। त्रिपक्षीयं विना ज्ञानं न नीतिः सफला भवेत्॥ त्रिपक्षीय ज्ञान के बिना कोई भी नीति सफल नहीं होती है॥ — (शुक्रनीति)




॥ तृतीय मार्ग ॥



समाज में इतनी नकारात्मकता, निराशा, संशय, आशंकाएं फैली है। कभी आपने सोचो हैं ऐसा क्यूँ है ? आप आज हर ओर केवल मैं-मैं-मैं की पुकार देखते हो, हर एक स्वयं को ही उचित बताने में लगा हुआ है। समाज मार्जार न्याय से मर्कट न्याय की और जाता है। और आप इस उहापोह में हो की कौन सा मार्ग उचित है। ये अध्याय आपकी सहायता करेगा तृतीय मार्ग ढूँढ़नें में॥

भारतीय दर्शनों में से सबसे प्राचीन दर्शन है सांख्य दर्शन। महात्मा बुद्ध ने घर छोड़ जाने के बाद आलार कलाम से साँख्य दर्शन सीखा था और इसी दर्शन की चर्चा भागवत गीता में भी है। यह दर्शन कपिल मुनि द्वारा प्रतिपादित है और ये किसी ईश्वर को नहीं मानता लेकिन ये प्रकृति को मानता है और यह दर्शन मानता है कि श्रष्टि 3 गुणों से बनी है - सत्, रज, तम॥


द्विभाजित सोच (प्रकृति और पुरुष)


शास्त्र मानते हैं कि सतोगुण अच्छा और तमोगुण बुरा है और रजोगुण इनका मेलजोल है। परंतु मेरा मत यहाँ थोड़ा सा भिन्न है। मेरा मानना है कि हमारे पूर्वज पहले से ही द्विभाजित सोच (dichotomous thinking) को मानते थे। वे मानते थे कि संसार में दो ही प्रकार की शक्तियाँ हैं - एक सकारात्मक और दूसरी नकारात्मक। सकारात्मक शक्तियाँ हमें आगे बढ़ाती हैं, हमें सशक्त बनाती हैं, हमें जीवन में सफल बनाती हैं। नकारात्मक शक्तियाँ हमें पीछे धकेलती हैं, हमें कमजोर बनाती हैं, हमें जीवन में असफल बनाती हैं। परंतु हमें इन दोनो में एक संतुलन बनाकर चलना चाहिए क्योकि हर वक्त केवल सदाचार से बात नहीं बनती और हर वक्त दुराचार तो मूलतः बर्बादी ही आती है। इस द्विभाजित सोच के लिए उनके पास एक शब्द पहले ही था प्रकृति और पुरुष। जैसे पुरुष कठोर होता है और प्रकृति सौम्य होती है। ये सारा संसार इन दोनों द्वैत के बीच का संतुलन है। इस से हमारी भाषा में भी कई शब्द या कहें की कई अवधारणाएँ, अथवा कई संकल्पनाएँ उत्पन्न हुईं जैसे - स्त्री-पुरुष, दिन-रात, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित, सत्य-असत्य, ज्ञान-अज्ञान आदि। ऐसे में उन्हे अच्छा, बुरा और राजसी इन तीन गुणों की कोई आवश्यकता नहीं थी। उस पर भी ये गुण उन्होने प्रकृति के बताए और प्रकृति परोक्ष-अपरोक्ष जगत का मूल है। कृति (संसार) का कारण है प्रकृति उसके अच्छे-बुरे होने से कोई अंतर नहीं पड़ता। सांख्य कहता है कि त्रिगुणी सृष्टि जीव को नचाती है और उनके व्यवहार पर प्रभाव डालती है। इन गुणों को मनुष्य के संदर्भ में बाद के मुनियों नें मनुष्यों के व्यवहार को वर्गीकृत करने के लिए जोड़ा होगा॥


द्विभाजित सोच की हानि


यह द्विभाजित सोच केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रही, अपितु आधुनिक समाजशास्त्र और राजनीति की जड़ों में भी घर कर गई है, जिसका परिणाम हम वर्ग-संघर्ष के रूप में देखते हैं। इस द्विभाजित (Dichotomous) सोच को आधार बना कर लोग संसार में दुष्प्रचार का आधार बना लेते हैं॥


  1. साम्यवाद - पूँजिवाद: जैसे कार्ल मार्क्स ने पूंजीपतियों का श्रमिकों के विपरीत खड़ा कर दिया और एक वर्ग संघर्ष की बात की। जबकि आज समाज मेें इन दोनो के बीच एक मध्यम वर्ग आता है जो श्रमिकों की अभिलाषा है और पुंजीपति मध्यम वर्ग की इससे आज तक कभी भी कार्ल मार्क्स की क्रांति कभी पूर्णतः फलित नहीं हुई॥

  1. फेमिनिज्म: जैसे कि फेमिनिज्म ने पुरुषों को महिलाओं के विपरीत खड़ा कर दिया और एक लैंगिक संघर्ष की बात की। परंतु नर-नारी एक दुसरे के पूरक हैं दोनों में कुछ दोष हैं परंतु दोनों में कुछ गुण भी है। ये समस्त संसार इन दोनों के बीच के सामंज्सय से बना है। दोनो को एक दुसरे के विरुद्ध भड़काना सर्वथा अनुचित है॥

  1. राइट विंग - लेफ्ट विंग: जैसे कि राइट विंग ने लेफ्ट विंग को अपने विपरीत खड़ा कर दिया और एक राजनीतिक संघर्ष की बात की। परंतु कभी-कभी प्राचीन ज्ञान देश के लिए सर्वोत्तम होता है और कभी-कभी आधुनिक ज्ञान देश के लिए सर्वोत्तम होता है। हमें व्यक्ति-काल-वस्तु-स्थान के अनुसार निर्णय लेना चाहिए न कि केवल अपने पक्ष के अनुसार। उदाहरणार्थ जवाहरलाल नेहरू जी आधुनिक सोच को बढ़ावा देते थे और मानते थे कि भारत को रुढिवादी सोच से बाहर आना चाहिए परंतु सुभाष चंद्र बोस जी प्राचीन सोच को बढ़ावा देते थे और मानते थे कि भारत को पहले अपने अंदर किसी समस्या का हल ढूँढना चाहिए। दोनों ही महान नेता थे और दोनों ही देश के लिए सर्वोत्तम चाहते थे॥

  1. जातिवाद: जैसे भारत में 7 लाख से अधिक जातियाँ हैं और हर जाति ने अपनी जाति को श्रेष्ठ मानते हुए बाकी अपने से एक नीचले स्तर की जात ढूँढ ही लेती है। परंतु हर जाति में कुछ गुण होते हैं और कुछ दोष होते हैं। हर जाति का अपना एक महत्व होता है और हर जाति का अपना एक योगदान होता है। हमें सभी जातियों का सम्मान करना चाहिए और किसी भी जाति को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसे द्विभाजित सोच का ही उदाहरण माना जा सकता है कि 7 लाख जातियों में केवल ब्राह्मण को दोषी बनाकर ब्राह्मण विरुद्ध शूद्र का खेल चलता है। परंतु ये देश गाँधी, बोस, नेहरू, जगजीवन राम, बिरसा मुंडा सबका है जो समाज की हर धारा से आकर अंग्रेजों से लड़ने में अपना योगदान दिया है॥

जहाँ कहीं भी आपको द्विभाजित सोच दिखे समझो कोई आपको भड़का रहा है या आपको सोचने के लिए पर्याप्त विकल्प नहीं दिए जा रहे हैं॥


त्रिभाजित सोच (अस्ति, नास्ति, अवक्तव्यम्)


मेरा मत है कि त्रिगुण एक दाओवादी (taosim) जैसा यिन-यैंग का गोला नहीं अपितु एक त्रिकोण है जिसमें तीनों गुण आपस में सामंजस्यपूर्ण रूप से जुड़े हुए हैं। ये तीनों गुण एक दूसरे के पूरक हैं और एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। जैसे कि एक त्रिकोण में तीनों कोण एक दूसरे के पूरक होते हैं, वैसे ही ये तीनों गुण भी एक दूसरे के पूरक हैं। इन्हे केवल अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके विपरीत हमें इन्हे द्विभाजित (Dichotomous) सोच के रूप में ना देखकर एक त्रिभाजित (Trichotomous) सोच के रूप में देखना चाहिए। दर्शन में इसे मध्यम मार्ग कहा जाता हैं, ये स्यादवाद और अनेकांतवाद की तरह है जो कि हाँ-ना की अपेक्षा अस्ति, नास्ति, अवक्तव्यम् की सोच को प्रोत्साहित करता है। इसके चलते संस्कृत में एकवचन, द्विवचन और बहुवचन की अवधारणा है और पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग की अवधारणा है। इसके चलते हमारे यहाँ तीनों देवताओं - ब्रह्मा, विष्णु और महेश - का अस्तित्व है जो कि सृष्टि, पालन और संहार के लिए उत्तरदायी हैं। और तीन देवियों - सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती - का अस्तित्व है जो कि ज्ञान, धन और शक्ति के लिए उत्तरदायी हैं॥


नीती शास्त्र के अनुसार संसार में 3 ही वस्तुएँ प्राप्तव्य के योग्य है वो हैं - श्री, शक्ति और सरस्वती। जिसके पास श्री है वो वैश्य है, जिसके पास शक्ति है वो क्षत्रिय है और जिसके पास सरस्वती है वो ब्राह्मण है। यहाँ भी वहीं त्रिभाजित सोच का ही उदाहरण है। इसलिए केवल इन्हे ही द्विज् कहते हैं और बाकि सब को शुद्र (जन्मना जाएते शुद्र)॥


हमें संसार कि हर स्थिति में 3 विकल्प तो न्यूनतम् ढूँढने ही चाहिए। और अगर आप सापेक्षता (relativity) की बात करें तो हर स्थिति में 3 ही विकल्प होते हैं - एक सकारात्मक, एक नकारात्मक और एक तटस्थ। इसलिए हमें हमेशा इन तीनों विकल्पों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए। जहाँ आप को न्यूनतम् 3 विकल्प ना दिखें वहाँ आप फँस चुके हो जैसे शेर ने जब चुहे को पकड़ लिया तो वहाँ कोई विकल्प नहीं रह जाता॥


तृतीय मार्ग की उत्पत्ति


हमसे पहले भी मुनियों ने दार्षनिकों नें 2 से ऊपर उठने के विकल्प ढूँढे हैं॥


  1. अस्ति-नास्ति: द्विभाजित सोच का मूल उदाहरण जहाँ केवल दो ही विकल्प हैं हाँ और नाँ॥

  1. त्रिपुटी: ये वेदान्त और सांख्य दर्शन से उत्पत्ति पाता एक विकल्प है। उपनिषदों और सांख्य में 'तीन' की संख्या को पूर्णता का प्रतीक माना गया है। किसी भी अनुभव को पूर्ण होने के लिए तीन अंगों की आवश्यकता होती है, जिसे 'त्रिपुटी' कहते हैं उदाहरणार्थ:
    • ज्ञाता - ज्ञान - ज्ञेय: जानने वाला, जानने की प्रक्रिया और जानी जाने वाली वस्तु।
    • द्रष्टा - दर्शन - दृश्य: देखने वाला, दृष्टि और जो देखा जा रहा है।
    • भोक्ता - भोग - भोज्य: भोगने वाला, अनुभव और अनुभव की वस्तु॥

  1. चतुष्कोटि: ये बोद्ध दर्शन का सिद्धांत है। यहाँ 4 विकल्प हैं हाँ, ना, हाँ और नहीं और ना हाँ ना नहीं॥
    • अस्ति (Is): हाँ, वह है॥
    • नास्ति (Is not): नहीं, वह नहीं है॥
    • तदुभयम् (Both): वह है भी और नहीं भी (सापेक्ष सत्य)॥
    • नोभयम् (Neither): वह न है और न ही नहीं है (अनिर्वचनीय या शून्य)॥

  1. सप्तभंगी नय: जैन मुनियों ने कहा कि सत्य इतना अनंत है कि उसे चार में भी नहीं बाँधा जा सकता, इसलिए उन्होंने सात विकल्प दिए। यहाँ 'शायद' के लिए 'स्यात्' शब्द का प्रयोग होता है:
    • स्यात् अस्ति: शायद है॥
    • स्यात् नास्ति: शायद नहीं है॥
    • स्यात् अस्ति च नास्ति च: शायद है भी और नहीं भी॥
    • स्यात् अवक्तव्यम्: शायद कहा नहीं जा सकता (अनिर्णीत)॥
    • स्यात् अस्ति च अवक्तव्यम् च: शायद है और कहा नहीं जा सकता॥
    • स्यात् नास्ति च अवक्तव्यम् च: शायद नहीं है और कहा नहीं जा सकता॥
    • स्यात् अस्ति च नास्ति च अवक्तव्यम् च: शायद है, नहीं है और कहा भी नहीं जा सकता॥

परंतु त्रिपक्षिय विवेक यथार्थवादी है और दैनिक जीवन के लिए मात्र त्रिपक्षिय विवेक ही प्रयाप्त है। और वह सरल होने के साथ साथ निर्णायक भी है और भ्रामकता से भी बचाता है॥


लौकिक न्याय


समाज में कुछ लौकिक न्याय हैं जो कि त्रिपक्षिय विवेक के सार्थक उदाहरण देते हैं॥


  1. देहली-दीपक न्याय: 'देहली' का अर्थ है दहलीज या चौखट। जब देहली पर दीपक रखा जाता है, तो वह घर के अंदर के कमरे और बाहर के आंगन, दोनों को एक साथ प्रकाशित करता है। राजनीति में 'राइट विंग' और 'लेफ्ट विंग' के बीच जो 'राष्ट्रहित' का विचार है, वह देहली-दीपक है। फैमिनिज्म में परिवार वह देहली है। ऐसे ही आप जहाँ खड़े हों वहाँ से कोई देहली ढूँढने का प्रयास अवश्य करें॥
  2. तृण-अरणि-मणि न्याय: अग्नि उत्पन्न करने के तीन अलग-अलग स्रोत हो सकते हैं
    • (क) तृण (घास): चकमक पत्थर और घास के घर्षण से॥
    • (ख) अरणि (लकड़ी): दो लकड़ियों को आपस में रगड़कर॥
    • (ग) मणि (सूर्यकांत मणि): सूर्य की किरणों को केंद्रित करके॥ यह न्याय 'कारण-कार्य' सिद्धांत (Law of Causality) को समझाता है। यह बताता है कि एक ही परिणाम (अग्नि) को प्राप्त करने के लिए तीन बिल्कुल अलग-अलग स्वतंत्र मार्ग हो सकते हैं। हमें कभी भी एक ही मार्ग पे निष्कर्श नहीं निकालना चाहिए॥
  3. शृंगाटक न्याय:'शृंगाटक' का शाब्दिक अर्थ है 'सिंघाड़ा' (Water Chestnut)। यदि आपने सिंघाड़े का फल देखा हो, तो वह प्राकृतिक रूप से त्रिकोणीय (Triangular) होता है और उसके तीन कोने (शृंग या सींग) होते हैं। और उसके तीनों कोने अनिवार्य होते हैं आप किसी भी परिस्थिति में क्यूँ ना हों आपको तीसरा कोना मिलेगा ही मिलेगा। जैसे कि शेर जंगल में मिल जाए तो साधारण मनुष्य के पास मात्र 2 विकल्प होते हैं भागना या लड़ना परंतु अगर कभी ध्यान से देखें तो तिसरा विकल्प चुपचार खड़े रहना भी होता है। कभी-कभार ये विकल्प भागने या लड़ने से अधिक सार्थक सिद्ध होता है॥

इन लौकिक न्याय को अपने जीवन में प्रयोग करने का प्रयास करें॥


उपसंहार


किसी भी परिस्थित को अगर आप सापेक्षता की दृष्टि से देखोगे तो आप को वहाँ तीन विक्लप तो मिल ही जाएंगे। एक आगे कि और वाला एक पीछे की और वाला और एक समान तटस्थ रहने वाला। काल के 3 रूप होते हैं भूत, भविश्य, वर्तमान, सिक्के के 3 पक्ष होते हैं - चिट, पट और अंटा। युद्ध में भी 3 ही विकल्प होते हैं - जीत, हार और ड्रॉ॥


॥ सारांश: त्रिपक्षीय विवेक बनाम द्विभाजित सोच ॥


॥ तुलना का आधार ॥द्विभाजित सोच (Dichotomous)त्रिभाजित सोच (Trichotomous)
विकल्पों की संख्याकेवल दो (हाँ या ना / काला या सफेद)न्यूनतम तीन (अस्ति, नास्ति, अवक्तव्यम्)
दृष्टिकोणद्वैत और संघर्ष पर आधारितसमन्वय और संतुलन पर आधारित
दार्शनिक आधारप्रकृति और पुरुष (द्वैत)सत्-रज-तम (त्रिगुण), स्यादवाद, त्रिपुटी
सामाजिक उदाहरणपूँजीवाद vs साम्यवाद, स्त्री vs पुरुषमध्यम वर्ग, पूरक संबंध, राष्ट्रहित
निर्णय प्रक्रिया'लड़ो या भागो' की स्थितितटस्थता और तीसरे मार्ग की खोज
परिणामध्रुवीकरण और अधूरा सत्यसर्व-समाहित और यथार्थवादी सत्य

मूल सत्य के भी 3 रूप होते हैं वो जो प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष और उत्तम पुरुष तीनों के दृष्टिकोण को समाहित कर सके। सर्व समाहित सत्य संसार का सबसे सर्वश्रेष्ठ सत्य होता है। इसलिए हमें हमेशा त्रिभाजित (Trichotomous) सोच को अपनाना चाहिए और द्विभाजित (Dichotomous) सोच से बचना चाहिए। अगली बार जब आप किसी परिस्थिति में फँसें तो ध्यान दे क्या आपके पास कोई तीसरा विकल्प है??