॥ वैदिक जीवन ॥
॥ पुरुषार्थ (मोक्ष)॥
पुरुषार्थ की दृष्टि से मोक्ष का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र।
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । जब हृदय में स्थित सभी कामनाएं (इच्छाएं) पूरी तरह से छूट जाती हैं। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ तब मरणधर्मा (नश्वर) मनुष्य अमर हो जाता है और इसी लोक में ब्रह्म का अनुभव कर लेता है॥ — कठोपनिषद (अध्याय २, वल्ली ३, श्लोक १४)

मोक्ष (मुक्ति, आत्मज्ञान, स्वतंत्रता)
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । जो साधक आत्मा में ही सुख वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है और जो आत्मा में ही ज्ञान की ज्योति वाला है। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ वह ब्रह्मरूप बना हुआ योगी 'ब्रह्मनिर्वाण' (मोक्ष) को प्राप्त होता है॥ — श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ५, श्लोक २४)
मोक्ष का अर्थ है — मुक्ति, यहाँ इसका अर्थ है जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति, आत्मा का परमात्मा में लय, या सभी बंधनों, इच्छाओं और अज्ञान से मुक्ति। उपनिषदों में मोक्ष को "आत्मा और ब्रह्म का एकत्व" कहा गया है। भारत के 9 के 9 दर्शनों में मोक्ष के प्रकार भिन्न-भिन्न हैं। उनमें से भी सांख्य और मिमांसा जैसे निरइश्वरवादी दर्शन जीवित मोक्ष की अवधारणा को भी प्रतिपादित करते हैं। क्योंकि मोक्ष केवल मृत्यु के बाद की स्थिति नहीं, अपितु जीवन रहते हुए भी अहंकार, अज्ञान, वासनाओं और बंधनों से मुक्त होकर जीना है। यह आत्मज्ञान, आंतरिक शांति, और पूर्ण स्वतंत्रता की अवस्था है। मोक्ष के मार्ग — ज्ञानयोग, भक्ति योग, कर्मयोग, राजयोग का उपनिषद, गीता और योगसूत्रों में विस्तार से वर्णन मिलता हैं॥
नास्तिक दृष्टिकोण से मोक्ष की पारंपरिक व्याख्या (आत्मा-परमात्मा का मिलन, पुनर्जन्म से मुक्ति) स्वीकार्य न भी हो, तो भी "आंतरिक स्वतंत्रता", "मानसिक शांति", "सभी बंधनों से मुक्ति" जैसे मूल्य सार्वभौमिक हैं। मनोविज्ञान में भी "सेल्फ-एक्चुअलाइजेशन" (स्व-प्राप्ति), "इंटरनल फ्रीडम" (आंतरिक स्वतंत्रता) को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है। भारतीय दर्शन के अनुसार मोक्ष की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि अज्ञान ही समस्त दुखों और जन्म-मरण के चक्र का मूल कारण है॥
सभी 9 दर्शनों का सार यह है कि जब मनुष्य अपनी अज्ञानता का त्याग कर अपने वास्तविक स्वरूप (चाहे वह जैन का अनंत सुख हो, बौद्ध की परम शांति हो, या वेदांत का ब्रह्म-आनंद) को पहचान लेता है, तभी वह संसार के कष्टों से मुक्त होकर शाश्वत आनंद प्राप्त कर सकता है॥
- चार्वाक: देह का विनाश ही मोक्ष है, क्योंकि जीवन का स्वभाव ही कष्टकारी है और मृत्यु ही समस्त शारीरिक दुखों का एकमात्र अंत है॥
- जैन: आत्मा का कर्म-पुद्गलों से मुक्त होकर ऊर्ध्वगमन 'कैवल्य' है, जिससे जीव अपने मूल स्वरूप 'अनंत ज्ञान और शाश्वत सुख' को पुनः प्राप्त कर लेता है॥
- बौद्ध: तृष्णा का क्षय और अविद्या का नाश 'निर्वाण' है, क्योंकि संसार 'सर्वं दुःखम्' है और इच्छाओं का अंत ही शून्य जैसी परम शांति प्रदान करता है॥
- सांख्य: पुरुष (आत्मा) और प्रकृति का विवेक-ज्ञान ही मुक्ति है, जिससे आत्मा अज्ञानवश प्रकृति के दुखों को अपना समझना छोड़कर स्वयं के 'द्रष्टा' रूप में स्थित हो जाती है॥
- योग: चित्त की वृत्तियों का पूर्ण निरोध 'कैवल्य' है, जो अशुद्धियों को मिटाकर साधक को उसके वास्तविक चैतन्य स्वरूप और आनंद में प्रतिष्ठित करता है॥
- न्याय: दुखों की आत्यंतिक निवृत्ति ही मोक्ष है, क्योंकि मिथ्या ज्ञान ही जन्म-मरण का कारण है और तत्वज्ञान से ही इस अंतहीन चक्र की समाप्ति संभव है॥
- वैशेषिक: आत्मा का उसके विशेष गुणों (सुख-दुख आदि) से पूर्ण विच्छेद ही मोक्ष है, जो जीव को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर परम शांत अवस्था में ले जाता है॥
- मीमांसा: कर्म-बंधनों का क्षय और आत्म-स्वरूप की उपलब्धि ही मोक्ष है, जिससे जीव सांसारिक कर्म-फलों के चक्र से निकलकर शाश्वत कल्याण को प्राप्त होता है॥
- वेदांत: अज्ञान (माया) का निवारण और 'ब्रह्म' से ऐक्य ही मोक्ष है, क्योंकि जीव मूलतः सच्चिदानंद है और स्वयं को ब्रह्म जानना ही पूर्ण आनंद की पराकाष्ठा है॥
भारतीय दर्शनों का सामूहिक निचोड़ यह है कि संसार के चक्र से मुक्ति का एकमात्र द्वार तत्वज्ञान (Right Knowledge) है। सभी दर्शन (चार्वाक को छोड़कर) इस बात पर सहमत हैं कि मनुष्य का मूल स्वभाव 'अज्ञान' के आवरण से ढका हुआ है, जिसके कारण वह स्वयं को शरीर, मन या इच्छाओं के साथ जोड़कर दुखी होता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए व्यक्ति को विवेकपूर्ण अभ्यास के माध्यम से बाहरी आसक्तियों और तृष्णा का त्याग करना चाहिए, ताकि वह अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान सके। संक्षेप में, जब व्यक्ति आत्म-संयम और ज्ञान के प्रकाश से 'स्व' और 'पर' (प्रकृति/माया) के भेद को जान लेता है, तब वह कर्म-बंधनों से मुक्त होकर उस शाश्वत शांति और आनंद में स्थित हो जाता है जिसे ही मोक्ष कहा गया है॥
मोक्ष के प्रकार
स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति। वह जो उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है; उसके कुल में कोई ब्रह्म को न जानने वाला उत्पन्न नहीं होता। तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति॥ वह शोक को पार कर जाता है, पापों से मुक्त हो जाता है और हृदय की अज्ञान रूपी ग्रंथियों से छूटकर अमर हो जाता है॥ — मुण्डकोपनिषद् (तृतीय मुण्डक, द्वितीय खण्ड, श्लोक ९)
शिव पुराण के अनुसार, मोक्ष कोई अचानक घटने वाली घटना नहीं, बल्कि भक्त और महादेव के बीच की दूरी घटने की एक क्रमिक यात्रा है। जब साधक निष्काम भक्ति और ज्ञान के मार्ग पर चलता है, तो वह सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर दिव्यता की ओर बढ़ता है। यह यात्रा बाहरी सानिध्य से शुरू होकर आंतरिक मिलन पर समाप्त होती है, जिसे इन पाँच सोपानों में समझा जा सकता है॥
सनातन दर्शन के अनुसार, मुक्ति कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि साधना की परिपक्वता से प्राप्त होने वाली चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। जब जीव अज्ञान के पाश से मुक्त होने का संकल्प करता है, तो उसकी श्रद्धा और उपासना के अनुसार उसे इन पाँच श्रेणियों में से किसी एक की प्राप्ति होती है। यह यात्रा स्थूल लोक से सूक्ष्म ब्रह्म-तत्त्व तक की परिणति है॥
- सालोक्य (समान लोक की प्राप्ति): यह मुक्ति का प्रथम स्तर है, जहाँ साधक अपने इष्ट देव के दिव्य लोक में स्थान प्राप्त करता है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई सूर्य देव का अनन्य उपासक है, तो वह 'सूर्यलोक' को प्राप्त करता है; इसी प्रकार चंद्रलोक या अन्य दिव्य लोकों की प्राप्ति भी सालोक्य है। साधक जिस भी इष्ट (सूर्य, इंद्र, विष्णु या शिव) की अनन्य उपासना करता है, वह उन्हीं के दिव्य लोक को प्राप्त करता है। यहाँ जीव संसार के त्रितापों से मुक्त होकर अपने आराध्य के दिव्य वातावरण का आनंद भोगता है॥
- सामीप्य (निकटता की प्राप्ति): लोक की प्राप्ति के पश्चात जब भक्ति और घनीभूत होती है, तो साधक को 'सामीप्य' प्राप्त होता है। इसमें भक्त केवल लोक में ही नहीं रहता, बल्कि अपने आराध्य के अत्यंत निकट रहने का सौभाग्य पाता है। वह प्रभु के पार्षद या प्रिय पात्र के रूप में उनकी उपस्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव करता है, जो उसकी निरंतर सेवा और सामीप्य से तृप्त रहता है॥
- सारूप्य (समान रूप और पद की प्राप्ति): यह वह अवस्था है जहाँ भक्त का स्वरूप, गुण और शक्तियाँ उसके आराध्य के समान हो जाती हैं। शास्त्रीय मान्यता है कि ब्रह्मांड के विभिन्न देव-पद (जैसे सूर्य, इंद्र, वायु आदि) शाश्वत हैं, किंतु उन पर आसीन होने वाले जीव कल्प-परिवर्तन के साथ बदलते रहते हैं। जिसे सारूप्य मुक्ति प्राप्त होती है, वह अगले कल्पों में साधना की पूर्णता के कारण स्वयं उस 'देवता' के पद को सुशोभित कर सकता है। यहाँ जीव और ईश्वर का भेद लगभग समाप्त हो जाता है और वह स्वयं सृजन और नियमन की शक्ति धारण कर लेता है॥
- सायुज्य (ब्रह्म में पूर्ण विलय): सायुज्य मुक्ति केवल इष्ट देव तक सीमित रहने की स्थिति नहीं, अपितु यह उस विराट 'परब्रह्म' में पूर्णतः विलीन हो जाने की अवस्था है। जिस प्रकार एक नदी अपनी नाम-रूप की सत्ता छोड़कर समुद्र में समाहित हो जाती है और फिर स्वयं समुद्र ही बन जाती है, उसी प्रकार साधक की व्यक्तिगत चेतना उस अनंत निर्गुण ब्रह्म में एकाकार हो जाती है। यहाँ 'अद्वैत' घटित होता है और द्वैत का लेशमात्र भी शेष नहीं बचता॥
- कैवल्य (परम और अंतिम मुक्ति): यह मुक्ति की सर्वोच्च और निर्विकार अवस्था है। जहाँ सायुज्य में विलय की क्रिया का बोध है, वहीं कैवल्य वह स्थिति है जहाँ केवल 'शुद्ध चैतन्य' शेष रहता है। यह वह परम सत्य है जहाँ आत्मा को यह साक्षात्कार होता है कि वह कभी बंधी ही नहीं थी, वह सदैव मुक्त, बुद्ध और शुद्ध स्वरूप ही थी। यहाँ न लोक है, न रूप है, न ही कोई अन्य—केवल एकमात्र अखंड सत्य शेष रहता है॥
अतः यह स्पष्ट है कि मुक्ति का मार्ग केवल प्रार्थना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वयं के देवत्व को जगाने की प्रक्रिया है। शास्त्रों का मत है कि "देवो भूत्वा देवं यजेत्" अर्थात देवता बनकर ही देवता की पूजा करनी चाहिए। आज का उपासक कई कल्पों के पश्चात स्वयं सृष्टि का नियामक 'ईश्वर' बन सकता है, क्योंकि आत्मा की क्षमता अनंत है। सालोक्य से शुरू होकर कैवल्य पर समाप्त होने वाली यह यात्रा जीव के आत्म-विस्तार की वह अनंत कथा है जो उसे 'क्षुद्र' से 'विराट' बना देती है॥
| मुक्ति का प्रकार | मुख्य अर्थ | शास्त्रीय स्रोत | विशेषता |
|---|---|---|---|
| सालोक्य | इष्ट देव के लोक में निवास | भागवत पुराण | त्रिताप से मुक्ति, दिव्य वातावरण |
| सामीप्य | इष्ट के निकटता | विष्णु पुराण | पार्षद रूप में सेवा |
| सारूप्य | इष्ट के समान रूप | भागवत पुराण | देव-पद की प्राप्ति |
| सायुज्य | ईश्वर में विलय | उपनिषद | अद्वैत अनुभव |
| कैवल्य | शुद्ध चैतन्य का बोध | अद्वैत वेदांत | परम सत्य, निर्विकार अवस्था |
मुक्ति के उपाय
पुरमेकादशद्वारम् अजस्यावक्रचेतसः। यह शरीर ग्यारह द्वारों वाला नगर है, जिसमें रहने वाला आत्मा अजन्मा है और जिसकी बुद्धि सीधी, निर्मल है।
अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते। जो इस आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है, वह शोक नहीं करता, जो यहाँ (जीवन में) मुक्त है, वही शरीर छूटने पर भी मुक्त रहता है।
एतद्वै तत् ॥१॥ नचिकेता, यही वह परम सत्य है।
— कठोपनिषद् (२.२.१)
जीवन में व्यक्ति को मुक्ति नहीं मिलती वह सदा संसार में फँसा रहता है। उसके दो मूल कारण है - मोह और कर्ताभाव। व्यक्ति को मोह होता है, पद, मान, सम्मान और प्रतिष्ठा से, अपने देश, सम्प्रदाय, माता, पिता, ज्ञान से। यह मोह ही पहला बंधन है। और दूसरा बंधन है व्यक्ति का ये मानना की वह संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है उसका कारण वह है। वह अपनों के दुःख में रोता है क्योंकि वह मानता है कि उसे वह दुःख कम कर पाना चाहिए था। वह भूल जाता है कि संसार में जीव अपने कर्मफल स्वयं भोगता है। और धनी से धनी व्यक्ति को भी दुःख हो सकता है। आइए इनका कारण और निवारण भी देखें॥
ज्ञान योग (मृत्यु ही परम सत्य है)
यक्षः पप्रच्छ — किमाश्चर्यम्?
यक्ष ने पूछा: सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
अहंन्यहनि भूतानि, गच्छन्ति यममन्दिरम्। प्रतिदिन असंख्य जीव, मृत्यु के अधीन होकर यमलोक को जाते हैं॥
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति, किमाश्चर्यमतः परम् ॥
शेष जीवित लोग सोचते हैं कि वे स्थायी रहेंगे, इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है॥
— यक्ष प्रश्न (महाभारत, वनपर्व, अरण्यक पर्व, अध्याय 313)
मुक्ति का पहला सोपान यह है कि ये स्मरण रहे की एक दिन सबने मरना है। तुम मरोगे, मैं मरुँगा, तुम जिन्हे प्रेम करते हो वे मरेंगे और तुम जिनसे घृणा करते हो वह भी मरेंगे। संसार में अमर कोई नहीं है। सारे रावण, हिटलर, खिलजी मरें और सारे विवेकानंद, बुद्ध और जैन भी मरे। जब इश्वर इस धरती पे जन्म लेकर आया, वह राम के रूप में हो, कृष्ण के रूप में वह भी मरा। तो ये सोचना की मैं सदा जीवित रहूँगा ये तो ना केवल भूल है परंतु पाप है॥
एक कथा सुनाता हूँ। एक समय की बात है, एक प्रतापी नरेश के राजप्रासाद में एक आत्मज्ञानी सन्यासी का शुभागमन हुआ। राजा ने शास्त्रोक्त विधि से उनका स्वागत किया, उनके चरणों का प्रक्षालन किया और उन्हें अपने ही सिंहासन पर आसीन कर स्वयं एक विनीत सेवक की भाँति उनकी परिचर्या की॥
महात्मा के प्रस्थान के उपरांत, राजा के महामंत्री ने असंतोष व्यक्त करते हुए कहा — "हे राजन्! आप इस विशाल आर्यावर्त के अधिपति हैं। एक भिक्षु के सम्मुख इस प्रकार नतमस्तक होना आपकी राजसी प्रतिष्ठा और गरिमा के प्रतिकूल है। यह दासत्व आपको शोभा नहीं देता।"
राजा मन्द मुस्कुराए और उन्होंने महामंत्री को एक विचित्र आज्ञा दी— "मंत्रीवर, आज राज्य में जितने भी पशु काल-कवलित हों, उनके शवों को एकत्र करें और उन्हें बाज़ार में विक्रय हेतु ले जाएँ।" अगले दिन महामंत्री ने सूचित किया कि मृत पशुओं की चर्म, अस्थि और मांस के विक्रय से राजकोष में प्रचुर स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। राजा ने पुनः आदेश दिया— "अब आज जितने भी मनुष्यों की मृत्यु हो, उनके देह को एकत्र करें और कल उन्हें विक्रय करने का प्रयास करें।" महामंत्री ने वैसा ही किया, किंतु परिणाम पूर्णतः भिन्न था। कोई भी व्यक्ति मृत मानव देह को क्रय करने के लिए उद्यत नहीं था। एक सप्ताह, यहाँ तक कि एक मास व्यतीत हो जाने पर भी वह शव बिका नहीं, अपितु दुर्गंध के कारण समाज के लिए भार बन गया॥
तब राजा ने महामंत्री को अत्यंत गूढ़ दार्शनिक सत्य समझाते हुए कहा: "हे अमात्य! तनिक विचार करो, मृत्यु के पश्चात इस नश्वर देह का मूल्य एक मृत पशु से भी न्यून है। जीवित अवस्था में जिसे तुम पद, प्रतिष्ठा और अहंकार का आधार मानते हो, प्राण पखेरू उड़ते ही वह 'अमेध्य' (अपवित्र) हो जाता है।"
गतप्राणस्य देहस्य, काष्ठलोष्टसमस्य च। जिस शरीर में प्राण नहीं रहे, वह लकड़ी और मिट्टी के ढेले के समान ही है।
यन्निधानं तु क्रियते, तत्कस्योपदिश्यते॥ उसका जो अंतिम संस्कार किया जाता है, वह वास्तव में किसके लिए किया जाता है॥
— महाभारत (वनपर्व, अरण्यक पर्व)
राजा ने सिद्ध किया कि बाह्य आवरण और राजसी वैभव क्षणिक हैं। मनुष्य की प्रतिष्ठा उसके पद में नहीं, बल्कि उसके भीतर स्थित उस 'परमात्म तत्त्व' और उसकी 'विनम्रता' में है। "न हन्यते हन्यमाने शरीरे" — शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नहीं मरती, किंतु जो अहंकार केवल शरीर से जुड़ा है, वह अंततः अपमानजनक अंत को प्राप्त होता है। मृत्यु के सम्मुख धन, संपत्ति और पद—सब शून्य हैं। अतः मनुष्य को अहंता का परित्याग कर सदैव उस शाश्वत सत्य का स्मरण रखना चाहिए कि वह केवल एक निमित्त मात्र है॥
जब भी कभी जीवन में लगे की समय की कमी है, मैं फँस चुका हूँ या बहुत ही अधिक दुःखी हूँ तो सदा स्मरण रखना कि ये सब किसी दिन एक ही क्षण में समाप्त हो जाएगा॥
भक्ति योग (सबका अपना भाग्य है)
यद्धात्रा निजभालपट्टलिखितं स्तोकं महद्वा धनं विधाता ने आपके भाग्य-रूपी ललाट पर जितना भी थोड़ा या बहुत धन लिख दिया है,
तत्प्राप्नोति मरुस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाधिकम् । वह मरुस्थल जैसी विषम परिस्थिति में भी निश्चित प्राप्त होगा, और सुमेरु पर्वत पर भी उससे अधिक नहीं मिलेगा।
तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्तिं वृथा मा कृथाः अतः धैर्यवान बनो और धनवानों के सामने व्यर्थ में दीनता (गिड़गिड़ाना) प्रदर्शित मत करो,
कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृह्णाति तुल्यं जलम् ॥ देखो, घड़ा चाहे कुएँ में डाला जाए या अथाह समुद्र में, वह अपनी क्षमता के बराबर ही जल ग्रहण करता है।
— नीतिशतकम्
प्राचीन काल में एक अत्यंत ऐश्वर्यशाली राजा था जिसकी सात रूपवती कन्याएँ थीं। एक दिन राजा ने अपनी समस्त पुत्रियों को राजसभा में बुलाकर प्रश्न किया कि वे किसके भाग्य का अन्न ग्रहण करती हैं। छह ज्येष्ठ पुत्रियों ने राजा के अहंकार को पुष्ट करते हुए विनम्र स्वर में कहा कि वे साक्षात् अपने पिता के प्रताप और सौभाग्य से ही समस्त सुख भोग रही हैं। किंतु सबसे छोटी पुत्री, जो परम विदुषी और ईश्वर-भक्त थी, उसे ज्ञात था कि उसका उत्तर उसके पिता को कुपित कर सकता भी तब भी उसने शांत भाव से उत्तर दिया कि हे तात! इस संसार में प्रत्येक जीव अपने पूर्वकृत कर्मों और स्वयं के प्रारब्ध का ही भोग करता है, मैं भी केवल अपने ही भाग्य का अन्न ग्रहण कर रही हूँ। पुत्री की यह सत्यवाणी राजा को वज्र के समान चुभी और उसने क्रोध के वशीभूत होकर घोषणा की कि वह अपनी इस पुत्री का विवाह किसी राजपुत्र से नहीं, अपितु नगर के द्वार पर मिलने वाले प्रथम भिक्षुक से करेगा ताकि उसका यह भाग्य का अहंकार टूट जाए॥
नियति के विधान से उस दिन द्वार पर एक कुष्ठ रोग से ग्रस्त भिक्षुक खड़ा था और राजा ने हठवश अपनी सुकोमल पुत्री का विवाह उसी व्याधिग्रस्त पुरुष से कर दिया। राजकुमारी ने इसे नियति का संकेत मानकर तनिक भी विलाप नहीं किया, क्योंकि उसका अटूट विश्वास था कि 'मन का हो तो अच्छा और मन का न हो तो और भी अच्छा', क्योंकि जो हमारे मन का नहीं है, वह निश्चित ही उस विधाता के मन का है। वह अपने रुग्ण पति को टोकरी में रखकर वन-वन की खाक छानने लगी। एक रात्रि जब वह वन में विश्राम कर रही थी, उसने देखा कि एक भयानक मणिधारी नाग उसके पति के मुख के समीप मंडरा रहा है। उस साहसी बाला ने अपने पुरुषार्थ और धैर्य से उस नाग को वश में कर लिया, जिससे प्रसन्न होकर नाग ने उसे अपनी दिव्य मणि प्रदान की। उस मणि के अलौकिक प्रभाव और राजकुमारी की निस्वार्थ सेवा से उसका पति न केवल कुष्ठ रोग से मुक्त होकर साक्षात् कामदेव के समान तेजस्वी हो गया, अपितु वह वास्तव में एक उच्च कुल का युवराज निकला जिसका राज्य शत्रुओं ने छीन लिया था॥
नाग की कृपा और राजकुमारी के सतित्व के बल पर उस राजपुत्र ने अपनी सेना पुनः एकत्रित की और अपना खोया हुआ वैभव व साम्राज्य प्राप्त कर लिया। वर्षों पश्चात जब वह राजकुमारी रानी बनकर अपने पिता के राज्य की सीमाओं से गुजरी, तो उसे ज्ञात हुआ कि उसके पिता का अहंकार उन्हें ले डूबा है। पड़ोसी राजाओं के आक्रमण और कुप्रबंधन के कारण राजा का संपूर्ण राज्य नष्ट हो चुका था और वे दाने-दाने को तरस रहे थे। जब राजा ने अपनी उसी पुत्री के ऐश्वर्य को देखा जिसे उन्होंने दरिद्रता में ढकेला था, तो उनका मस्तक ग्लानि से झुक गया। उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से स्वीकार किया कि आज वे अपनी उसी पुत्री के भाग्य का अन्न ग्रहण कर रहे हैं। यह कथा सिखाती है कि प्रारब्ध को स्वीकार कर जब मनुष्य अटूट पुरुषार्थ करता है, तो ईश्वर की योजना अंततः उसे सर्वोच्च पद पर आसीन कर देती है। जैसा कि हरिवंश के दर्शन में निहित है, जीव को केवल अपने धर्म का पालन करना चाहिए, फल की व्यवस्था तो वह ईश्वर स्वयं करता है॥
यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ मैं कोई आजीवक या नियतिवादी नहीं हूँ। मैं यहाँ पर धर्म का ज्ञान भी नहीं दे रहा हूँ, मैं तो नीति शास्त्र के कुछ असाधारण बिंदु यहाँ लिखना चाहता था जो व्यक्ति को दैनिक रूप से सहायता कर सकें। परंतु चूंकि मोक्ष, सन्यासीयों का मूलतः विषय है। तो मैं यहाँ ये कथा इसलिए लिख रहा हूँ कि भाग्य और पुरुषार्थ दोनो मिल कर व्यक्ति को महान बनाते हैं। बिना भाग्य के भी आप सफल नहीं हो सकते। मैं पौत्तपरिहारवाद अथवा परिणामवाद का सिद्धांत प्रतिपादित नहीं कर रहा। परंतु मैं भाग्य का औचित्य भी तुच्छ नहीं मानता। व्यक्ति के जीवन में पुरूषार्थ और भाग्य दोनो का तालमेल होना चाहिए। इसे समझाने के लिए एक उपनिषद की कथा और सुनाता हूँ॥
प्राचीन काल में असुरों पर विजय प्राप्त करने के उपरांत इंद्र आदि देवता इस मिथ्या अभिमान में डूब गए कि यह विजय उनके निजी पुरुषार्थ का परिणाम है। उनके इस अहंकार का मर्दन करने के लिए परब्रह्म एक तेजोमय 'यक्ष' के रूप में प्रकट हुए। जब अग्नि देव उस तेज के समीप पहुँचे, तो यक्ष ने उनके सम्मुख एक लघु तृण (तिनका) रखकर उसे जलाने की चुनौती दी, किंतु संपूर्ण ब्रह्मांड को भस्म करने की शक्ति रखने वाले अग्नि देव उस तिनके को झुलसा तक न सके। इसी प्रकार वायु देव अपनी समस्त प्रचंड शक्ति लगाने के बाद भी उस तृण को उसके स्थान से विचलित न कर सके। अंततः देवराज इंद्र को बोध हुआ कि उनकी विजय और शक्ति वास्तव में उनकी अपनी नहीं, बल्कि उस अदृश्य ब्रह्म की ही कृपा थी॥
यह कथा हमें यह गंभीर बोध कराती है कि जैसे देवताओं की शक्ति के पीछे ब्रह्म की सत्ता थी, वैसे ही हमारे जीवन की लघुतम उपलब्धि के पीछे भी एक विशाल अदृश्य शृंखला कार्यरत है। जब आप अन्न का एक ग्रास ग्रहण करते हैं, तो वह केवल आपका पुरुषार्थ नहीं, बल्कि उसमें एक अज्ञात कृषक का स्वेद, ट्रैक्टर चालक का कौशल, उर्वरक प्रदाता, सिंचन हेतु जल, विद्युत और ऋतु चक्र का सम्मिलित वरदान छिपा होता है। इसी प्रकार, जब आप वस्त्र धारण करते हैं, तो कपास के लघु फूल से लेकर बुनकर के करघे और दर्जी के टांके तक, आप एक अटूट मानवीय शृंखला पर आश्रित होते हैं॥
माता सीता की भी यही स्थिति है। वह महाराज जनक की प्रिय पुत्री थी, राजा दशरथ की पुत्रवधु, साक्षात श्री रघुराम की स्वामिनी, पराक्रमी और वीर लव-कुश की माता और हनुमान एवं लक्षमण की पूज्य माँ तुल्य। परंतु इसके पश्चात भी वो पैदा होते ही गुरूकुल चलीं गई तो वन में रहीं, फिर विवाह पश्चात वनवास कोई गईं और तत्पश्चात वह महाऋषि वाल्मिकी के आश्रम में पुनः वन में चली गई। इस तरह संसार के सारी श्री, शक्ति और सरस्वती होते हुए भी स्वयं माँ आदिशक्ति वन-वन भटकती रहीं। कारण बहुत ही सूक्ष्म था कि पद्म पुराण के अनुसार, बचपन में सीता जी ने एक तोते के जोड़े को पिंजरे में बंद किया था, जिससे विलग होते समय तोते ने शाप दिया था कि तुम्हें भी अपने पति से वियोग सहना होगा। शास्त्र कहते हैं कि "कर्मणां गतिर्गहना" (कर्मों की गति अत्यंत गहन है)। माता सीता का जीवन यह सिखाता है कि व्यक्ति कितना भी सामर्थ्यवान क्यों न हो, उसे अपने 'प्रारब्ध' का सम्मान करना पड़ता है॥
अतः सत्य यही है कि हमारा कोई भी कार्य केवल व्यक्तिगत नहीं, अपितु समाज का एक सामूहिक अनुष्ठान है। इस जगत में सब कुछ एक-दूसरे से गुंथा हुआ है और हमें इस विराट व्यवस्था के प्रति सदैव कृतज्ञ होना चाहिए। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि कोई अदृश्य शक्ति है जो 'भाग्य' का स्वरूप लेकर हमें जीवन के पथ पर आगे या पीछे धकेलती है। इस बोध के साथ ही व्यक्ति अहंकार मुक्त होकर कृतज्ञता से जीवन व्यतीत कर सकता है, क्योंकि जब हम इस अंतर्संबंध को समझ लेते हैं, तो यह भाव स्वतः जागृत हो जाता है कि— "मन का हो तो अच्छा, और मन का ना हो तो और भी अच्छा", क्योंकि तब वह उस अनंत सत्ता की मंगलकारी योजना का हिस्सा होता है। आप सब के भाग्य के लिए उत्तरदायी नहीं हो। आप के माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन और पति-पत्नी में से किसी के भाग्य पे आपका अधिकार नहीं है, ये मानना कि मैं सब को एक सुखदायी जीवन दे सकता हूँ भ्रम है। आप इस भ्रम से मुक्ति पाओ और जहाँ आप असमर्थ हों तो अपना भाग्य को स्वीकार कर लेना चाहिए। इससे जीवन में शाँति मिलती है॥
कर्म योग ( कर्म जन्म-जन्म की यात्रा है )
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् ।
जैसे हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माँ को ढूँढ लेता है,
तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥
उसी प्रकार पूर्वजन्म में किए गए कर्म अपने कर्ता को ढूँढ ही लेते हैं।
— स्कन्दपुराण
मैं जो समझाना चाहता हूँ उसे मैं कुछ कथाओं के माध्यम से समझाता हूँ। आईए कुछ कथाएँ जाने और समझे कर्म के गूढ़तम् ज्ञान को॥
- नारद जी एक बार वन से जा रहे थे। वहाँ दो तपस्वी मिले। पहले ने पूछा— "प्रभु के दर्शन कब होंगे?"। नारद बोले— "जितने इस वृक्ष पर पत्ते हैं, उतने जन्मों के बाद।" वह तपस्वी रोने लगा। दूसरे तपस्वी को भी यही उत्तर मिला, तो वह प्रसन्न होकर नाचने लगा कि— "चलो, यह तो निश्चित है कि दर्शन होंगे!" उसकी इस असीम शांति और धैर्य को देखकर भगवान उसी क्षण प्रकट हो गए। यह कथा सिखाती है कि जब आपके पास जितना धैर्य हो उतना ही फल शीघ्र मिलता है॥
- जब भीष्म शरशय्या पर लेटे थे, उन्होंने कृष्ण से पूछा कि मुझे यह कष्ट क्यों? कृष्ण ने उन्हें उनके पिछले 72 जन्म दिखाए, जहाँ उन्होंने एक टिड्डे को कांटों पर फेंका था। बोले यह तुम्हारा कर्म है। यह कथा बताती है कि कर्म का फल मिलने में देरी हो सकती है, हजारों जन्म लग सकते हैं, इसलिए वर्तमान में शांत रहकर केवल श्रेष्ठ कर्म करना ही हमारे हाथ में है॥
- प्राचीन काल में राजा भरत (जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा) एक महान चक्रवर्ती सम्राट और परम भक्त थे। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में वे राज-पाट त्यागकर गंडकी नदी के तट पर तपस्या करने चले गए। उनका लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना था। किंतु, वन में रहते हुए उन्हें एक असहाय मृग-शावक (हिरण के बच्चे) से अत्यधिक मोह हो गया। वे अपनी साधना भूलकर सारा समय उस मृग की सेवा में लगाने लगे। अंत समय में जब प्राण निकलने को हुए, तब भी उनका ध्यान ईश्वर के स्थान पर उस मृग में ही अटका रहा। परिणामतः, उन्हें अगले जन्म में मृग (हिरण) की योनि में जन्म लेना पड़ा॥
- भगवान विष्णु के पार्षद जय और विजय बैकुंठ के द्वारपाल थे। एक बार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र
'सनकादि ऋषि' (सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार) भगवान के दर्शन हेतु आए। वे बालक
रूप में थे, किंतु परम ज्ञानी और वयोवृद्ध थे। जय-विजय ने उन्हें साधारण बालक समझकर द्वार पर
ही रोक दिया। ऋषियों को यह मर्यादा का उल्लंघन लगा और उन्होंने क्रोध में जय-विजय को शाप दे
दिया— "तुम बैकुंठ के अधिकारी नहीं हो, जाओ मर्त्य लोक (पृथ्वी) में जाकर असुर योनि में जन्म लो।"
भगवान विष्णु स्वयं बाहर आए और उन्होंने स्थिति को संभाला। ऋषियों का शाप अमिट था, किंतु प्रभु ने
अपने सेवकों को दो विकल्प दिए:
1. **"या तो सात जन्मों तक विष्णु भक्त के रूप में पृथ्वी पर रहो।"** 2. **"या फिर केवल तीन जन्मों तक विष्णु के 'शत्रु' के रूप में जन्म लो।"**
बैकुंठ के द्वारपाल जय और विजय ने शाप को विधाता का विधान मानकर स्वीकार किया और तीन जन्मों की उस लंबी यात्रा पर निकल पड़े जो उन्हें पुनः प्रभु के समीप ले जाने वाली थी। प्रथम जन्म में वे हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु, द्वितीय में रावण व कुंभकर्ण और तृतीय में शिशुपाल व दंतवक्र के रूप में अवतरित हुए। यह विस्तार सिद्ध करता है कि आत्मा का विकास एक जन्म की हड़बड़ी नहीं, बल्कि अनेक जन्मों में फैला हुआ एक गंभीर और सुव्यवस्थित पुरुषार्थ है। जैसे समाज की हर अदृश्य कड़ी हमारे अन्न और वस्त्र से जुड़ी है, वैसे ही हमारे ये जन्म भी एक अखंड शृंखला हैं जहाँ इस बार का अधूरा कार्य अगले जन्म की पूर्णता बनता है॥
इस प्रकार व्यक्ति को ये समझना चाहिए की कार्य (कर्म) कभी भी समाप्त नहीं होता। व्यक्ति घिस जाता है, मर जाता है, परंतु श्रम (कर्म) चलता रहता है। आप को यदि लगता है की आज मैं थोड़ा और काम कर लेता हूँ कल विश्राम करूँगा तो ये स्वभाव आपके लिए घातक है। क्योंकि कल नहीं आएगा। एक जीवन में आप सब कुछ नहीं कर सकते हो। सबको सीखना बंद करो। ये मानों की एक जीवन में सिमित संसाधनों और आयु के अनुसार केवल एक ही कार्य सिद्ध हो सकता है॥
एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। एक ही साधना में सब सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, अनेक साधनाओं में सब व्यर्थ हो जाता है।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥ रहीम कहते हैं कि जैसे पौधे की जड़ को सींचने से ही वह फूलता‑फलता है॥
— रहीमदास
यह कहना बंद करना चाहिए की समय नहीं है या फिर मैं बहुत अधिक बल देकर आवश्यकता से अधिक कार्य कर लूँगा। इसका घाटा आपको अपने स्वास्थ्य के रूप में चुकाना पड़ता है। जो की किसी भी धन, सम्पत्ति से अधिक महत्वपूर्ण है। मेरी भी लॉकडाउन में वर्क फ्रॉम होम में काम समय मेरी रीढ़ की हड्डी खीसक गई। L4-L5 में दर्द रहता था और 3 माह तो बैड रैस्ट पे रहा, फ़िज़ियोथैरपी करवाई तत्पश्चात भी मैं अब अधिक भार नहीं उठा सकता और अब मुझे कमर का दर्द रहता है। ये उस नौकरी के लायक था ही नहीं, जिसने मुझे 2 वर्ष बाद निकाल दिया। तो व्यक्ति को कर्म में भी संतुलन बरतना चाहिए।॥
न हि कर्मणा न कर्माणि नाशं यान्ति कदाचन । कर्मों (अनुष्ठानों या कार्यों) के द्वारा संचित कर्मों का नाश कभी भी संभव नहीं है।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणां न पुनर्भवभागिनाम् ॥ जिनके कर्म 'ज्ञान' की अग्नि में जलकर भस्म हो गए हैं, वे फिर कभी जन्म-मरण के चक्र (पुनर्जन्म) के भागी नहीं बनते॥
— शिव-गीता (13.12)
शिव गीता कहती है कर्म से कर्म नहीं कटते। क्योंकि कर्म तो करोड़ो जन्मों से संचित है। उन्हे मिटाने के लिए तो फिर से करोड़ जन्म ही लेने पड़ेंगे। कर्म केवल ज्ञान से मिटते हैं। इस लिए कर्म की अति भी अच्छी नहीं है। कर्म में भी ऋत लाओ। आप भी स्वयं से सदा प्रश्न करें की क्या आज मैंने पर्याप्त कार्य कर लिया है। ना श्रम अल्प हो ना ही अति यही सच्चा संतुलन है॥
दृष्य और दृष्टा का भेद
रूपं दृश्यं लोचनं दृक्। बाहरी रूप (दृश्य वस्तुएँ) देखी जाती हैं, और आँख (लोचन) उन्हें देखने वाला उपकरण है।
तद् दृश्यं दृक्तु मानसम्। पर आँख भी एक दृश्य है, जिसे देखने वाला मन है — मन आँख के अनुभव को देखता है।
दृश्या धीवृत्तयः साक्षी। मन की वृत्तियाँ (विचार, भाव, स्मृतियाँ) भी देखी जाती हैं; उन्हें देखने वाला साक्षी है।
दृगेव न तु दृश्यते॥ साक्षी‑चैतन्य (आत्मा) केवल देखने वाला है, स्वयं कभी देखा नहीं जा सकता।
— दृग्‑दृश्य विवेक (श्लोक १)
उपरोक्त श्लोक दृग-दृश्य विवेक नामक ग्रंथ का है। दृग्-दृश्य विवेक अद्वैत वेदांत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक ग्रंथ है, जिसका श्रेय प्रायः आदि शंकराचार्य या स्वामी विद्यारण्य को दिया जाता है। इस ग्रंथ का नाम ही इसका सार है: 'दृग्' (देखने वाला/साक्षी) और 'दृश्य' (देखी जाने वाली वस्तु) के बीच का 'विवेक' (भेद) करना॥
- आंखें दृश्य हैं, मन दृष्टा है: हमारी आंखें रूप और रंग को देखती हैं, इसलिए आंखें 'दृष्टा' हैं और संसार 'दृश्य'। लेकिन, जब आंखें बंद होती हैं या धुंधली होती हैं, तो हमें इसका पता चलता है। इसका अर्थ है कि मन आंखों को देख रहा है। अब मन 'दृष्टा' हो गया और आंखें 'दृश्य'॥
- मन दृश्य है, साक्षी (आत्मा) दृष्टा है: मन में उठने वाले विचार, सुख-दुःख और इच्छाएं बदलती रहती हैं। चूंकि हम इन विचारों के आने-जाने को जान सकते हैं, इसलिए मन भी एक 'दृश्य' है॥
- अंतिम दृष्टा: वह 'प्रकाश' या 'चेतना' जो मन के विचारों को भी प्रकाशित करती है, वही वास्तविक 'दृग्' (दृष्टा) है। वह स्वयं किसी के द्वारा नहीं देखा जा सकता, क्योंकि उसके पीछे कोई और नहीं है। वही हमारी वास्तविक आत्मा है॥
आइए इसे कुछ कथाओं के माध्यम से समझते हैं। एक बार तीन ऋषि घोर तपस्या कर रहे थे। भगवान विष्णु ने कौतूहलवश देवऋषि नारद से पूछा, "नारद! तुम्हारे विचार में इन तीनों में से संसार के वास्तविक सार को कौन समझता है?" नारद जी ने उत्तर दिया, "प्रभु! जो आयु में सबसे बड़े और वरिष्ठ हैं, वे ही परम ज्ञानी होंगे। यदि वे नहीं, तो मंझले ऋषि को भी उचित ज्ञानी माना जा सकता है।" भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा, "जाओ, तीनों को मेरे दिव्य यान से बैकुंठ ले आओ। किंतु ध्यान रहे, एक-एक करके ही मुझसे मिलवाना और सबसे पहले सबसे बड़े ऋषि को लाना।"
- वरिष्ठ ऋषि: जब बड़े ऋषि आए, तो प्रभु ने उनसे यात्रा का अनुभव पूछा।
ऋषि बोले, "प्रभु! मार्ग में मैंने देखा कि एक बगुला बड़ी निर्दयता से मछली को खा रहा था। एक जीव दूसरे जीव के प्राण ले रहा है,
यह दृश्य बहुत अनुचित और दुखद था। मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।"
भगवान विष्णु ने कहा, "मुनिवर! आपने यह तो देखा कि मछली मर रही है, पर यह नहीं देखा कि वह बगुला तीन दिनों से भूखा था और उसे आज ही आहार प्राप्त हुआ है। आप अभी मोह दृष्टि में बंधे हैं, आपको अभी पूर्ण बोध नहीं है, अतः आप वापस जाइए।" - मंझले ऋषि: इसके बाद मंझले ऋषि आए। उन्होंने भी वही दृश्य देखा था। पूछने पर उन्होंने कहा,
"भगवन! संसार का नियम है कि जीव ही जीव का भोजन है, (जीव जीवस्य भोजनम्) इसमें कोई दोष नहीं। किंतु बगुले को मछली
को शीघ्र मार देना चाहिए था। उसे तड़पाना उचित नहीं था।"
भगवान ने कहा, "आपने मछली की तड़प तो देखी, पर यह नहीं देखा कि पिछले जन्म में इसी मछली ने उस बगुले को अत्यंत क्रूरता से तड़पाकर मारा था। आज कर्म अपना चक्र पूरा कर रहा है। आपने कर्म का न्याय नहीं देखा, आपकी दृष्टि अभी परा-अपरा में भेद नहीं समझ पाती। आपका ज्ञान भी अभी अधूरा है, आप भी वापस लौट जाइए।" - कनिष्ठ ऋषि: अंत में सबसे छोटे ऋषि आए। प्रभु के पूछने पर उन्होंने बड़े आनंद से कहा, "प्रभु! पूरी यात्रा मंगलमय थी।"
भगवान ने पूछा, "क्या तुमने वहां कोई बगुला और मछली देखी? क्या तुम्हें उन पर दया नहीं आई?"
ऋषि ने शांत भाव से उत्तर दिया, "नहीं प्रभु! आपकी सृष्टि इतनी सुचारू और न्यायपूर्ण ढंग से चलती है कि इसमें हस्तक्षेप करने वाला मैं कौन होता हूँ? जो हो रहा है, वह आपके विधान के अनुसार ही है।"
भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, "तुमने 'दृष्टा' और 'दृश्य' के भेद को समझ लिया है। दृग्-दृश्य विवेक के कारण तुम साक्षी भाव में स्थित हो, इसलिए तुम ही बैकुंठ में निवास के वास्तविक अधिकारी हो।"
यह कथा अत्यंत सरल ढंग से स्पष्ट करती है कि संसार को देखना मात्र पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह बोध होना आवश्यक है कि उसे 'कौन' और 'किस भाव' से देख रहा है। पहले ऋषि की भूल यह थी कि वे केवल बाहरी दृश्य (आंखों के स्तर) पर अटक गए और भावनाओं के वशीभूत होकर स्वयं को घटना से जोड़ बैठे, जिससे उनके भीतर न्याय-अन्याय का द्वंद्व पैदा हुआ। दूसरे ऋषि ने अपनी बुद्धि का प्रयोग तो किया, परंतु वे भी केवल तर्क और कर्म के चक्र (मन के स्तर) तक ही सीमित रहे, जिससे वे सत्य की गहराई को नहीं देख पाए। असली 'दृष्टा' वह छोटा ऋषि था, जिसने यह जान लिया था कि जो कुछ भी घटित हो रहा है वह प्रकृति का एक खेल मात्र है और वह स्वयं उससे पूरी तरह अलग एक निर्लिप्त साक्षी है। इस प्रकार, यह कथा स्पष्ट करती है कि जब तक हम दृश्य के साथ खुद को जोड़कर दुखी या सुखी होते हैं, तब तक हम 'दृश्य' के गुलाम होते हैं, लेकिन जब हम सब कुछ होते हुए देखकर भी अपने भीतर की शांति में अडिग रहते हैं, तभी हम वास्तविक 'दृष्टा' कहलाते हैं। अंततः, यह कहानी हमें अपनी पहचान उस चेतना से जोड़ने की प्रेरणा देती है जो हर परिस्थिति में अपरिवर्तित और मुक्त रहती है। यह बोध ही हमें संसार के मानसिक बंधनों से मुक्त कर वास्तविक आनंद और बैकुंठ के मार्ग पर ले जाता है।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। दो सुहृद् समान वृक्ष पर साथ-साथ बैठे हैं।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति। उनमें से एक जीव मीठे फल (कर्म‑फल) का भोग करता है।
अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ दूसरा (परमात्मा) स्वयं कुछ नहीं खाता, केवल साक्षीभाव से देखता रहता है।
— मुण्डकोपनिषद् (३.१.१)
मुण्डकोपनिषद् का यह अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक दो पक्षियों के माध्यम से 'जीवात्मा' और 'परमात्मा' के शाश्वत संबंध को स्पष्ट करता है। इस कथा के अनुसार, हमारा शरीर एक 'वृक्ष' के समान है, जिस पर दो पक्षी (चेतना के दो रूप) बैठे हैं। पहला पक्षी हमारा 'अहंकार' या 'जीवात्मा' है, जो संसार के खट्टे-मीठे फलों (सुख-दुःख और कर्मफल) को चखता है और उनमें इतना खो जाता है कि कभी हर्षित होता है तो कभी व्याकुल। वहीं, दूसरा पक्षी हमारी 'अंतरात्मा' या 'साक्षी चैतन्य' है, जो शांत भाव से बिना कुछ चखे केवल पहले पक्षी की गतिविधियों को देख रहा है। दृग्-दृश्य विवेक के अनुसार, जब तक हम स्वयं को 'फल खाने वाला' (भोक्ता) समझते हैं, तब तक हम दृश्य के बंधनों में बंधे रहते हैं, लेकिन जैसे ही हमारी दृष्टि उस दूसरे 'साक्षी पक्षी' पर पड़ती है, हमें यह बोध हो जाता है कि हम वास्तव में वह शांत दृष्टा ही हैं। यही बोध हमारे समस्त दुखों का अंत कर देता है, क्योंकि साक्षी पक्षी को न कोई फल बांध सकता है और न ही संसार का कोई उतार-चढ़ाव विचलित कर सकता है।
एक कथा और प्रयोग कर रहा हूँ इसे समझाने को। ऋषि व्यास के पुत्र शुकदेव, जिन्होंने समस्त वेदों और शास्त्रों का गहन अध्ययन कर लिया था, अभी भी मन की उस परम शांति और सन्यास के वास्तविक मर्म को नहीं खोज पा रहे थे। जब व्यास जी ने देखा कि उनका पुत्र ज्ञान के बोझ तले तो दबा है पर अनुभव की दृष्टि अभी कोरी है, तो उन्होंने उसे मिथिला नरेश महाराज जनक के पास भेजा। शुकदेव के मन में भारी संकोच और अहंकार का मिश्रण था; उन्हें लगा कि जो राजा राजसी ठाठ-बाट, रानियों और वैभव के बीच डूबा है, वह एक विरक्त को भला सन्यास क्या सिखाएगा?
राजा जनक ने उनका आदर-सत्कार किया और उन्हें अपने दैनिक कार्यों का साक्षी बनाया। शुकदेव ने देखा कि राजा शासन भी कर रहे हैं, न्याय भी कर रहे हैं और भोग भी विलास रहे हैं। उन्हें लगा कि यह तो एक साधारण संसारी जीवन है। किंतु सत्य की परीक्षा अभी शेष थी।
एक दिन जब दोनों नदी के तट पर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर रहे थे, तभी एक प्रहरी दौड़ता हुआ आया और चिल्लाया, "महाराज! अनर्थ हो गया, वह अतिथि भवन धू-धू कर जल उठा है जहाँ मुनिवर ठहरे थे!"
यह सुनते ही शुकदेव का धैर्य जवाब दे गया। वे यह भूल गए कि वे एक ब्रह्मज्ञानी हैं और अपनी एकमात्र 'लंगोटी' और 'अंगवस्त्र' बचाने के लिए नग्न अवस्था में ही उस जलते हुए भवन की ओर भाग खड़े हुए। दूसरी ओर, महाराज जनक शांत खड़े रहे। उन्होंने संयम से अग्नि शमन के आदेश दिए और पुनः अपने अनुष्ठान में लीन हो गए। उनके चेहरे पर न कोई शिकन थी, न कोई शोक।
जब शुकदेव हाफते हुए वापस लौटे और अपनी लंगोटी जलने का विलाप करने लगे, तब महाराज जनक ने मंद मुस्कान के साथ कहा:
"मुनिवर! उस विशाल भवन को बनाने में मेरा अपार धन, श्रम और समय लगा था, वह क्षण भर में भस्म हो गया किंतु मैं विचलित नहीं हुआ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह एक 'दृश्य' था जो मुझसे पृथक और नश्वर है। किंतु आप, जो स्वयं को सन्यासी कहते हैं, एक तुच्छ वस्त्र (लंगोटी) रूपी दृश्य के नष्ट होने पर व्याकुल हो उठे। वास्तविक सन्यास वस्त्रों के त्याग में नहीं, बल्कि 'अहंकार' और 'आसक्ति' के त्याग में है।"
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। तत्व को जानने वाला योगी यह अनुभव करे कि "मैं वास्तव में कुछ भी नहीं करता हूँ"॥
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन्॥ देखते हुए, सुनते हुए, स्पर्श करते हुए, सूँघते हुए, भोजन करते हुए, चलते हुए, सोते हुए और श्वास लेते हुए भी॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि। बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए तथा आँखों को खोलते और मूंदते हुए भी॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥ वह यही माने कि समस्त इंद्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं (मैं केवल उन इंद्रियों का भी दृष्टा हूँ)॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (५.८ - ५.९)
दृग-दृश्य विवेक को समझने के लिए आप को स्थितप्रज्ञा को समझना होगा। जो व्यक्ति प्रारब्ध भोगकर भी स्वयं को सुख दुःख से हटाकर, संसार में रहते हुए उसके क्रियाकलापों से हटाकर कर्म करते हुए कर्मफल से स्वयं को हटाकर, और युद्ध करते हुए हार-जीत से हटा पाए वही स्थितप्रज्ञा है। और वही सच्चा योगी जीवन में ही मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। आइये समझते हैं कि इस साक्षी भाव को पाने की व्यावहारिक विधि क्या है?
अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम्। अस्तित्व, प्रकाश, प्रियता, रूप और नाम — ये पाँच अंश हैं।
आद्यत्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम्॥ पहले तीन (अस्ति, भाति, प्रिय) ब्रह्मस्वरूप हैं; और अंतिम दो (रूप, नाम) जगत्‑स्वरूप हैं।
— दृग्‑दृश्य विवेक (श्लोक २०)
इस श्लोक के माध्यम से दृग्-दृश्य विवेक के मार्ग को समझने के लिए साधक को अपनी दृष्टि को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाना चाहिए। सबसे पहले, हमें संसार की किसी भी वस्तु को देखते समय उसके बाहरी 'नाम' और 'रूप' (जैसे यह मोबाइल है, यह वृक्ष है) को केवल एक अस्थायी पहचान मानकर मानसिक रूप से अलग करना चाहिए, क्योंकि ये निरंतर बदलते रहते हैं। इसके बाद, अपना ध्यान उस वस्तु की सत्ता यानी 'अस्ति' (वह है), उसके ज्ञान यानी 'भाति' (वह प्रकाशित हो रही है) और उससे मिलने वाले आनंद के मूल 'प्रिय' स्वरूप पर टिकाना चाहिए। जब हम इस अभ्यास को गहरा करते हैं, तो हमें समझ आता है कि नाम और रूप तो केवल मन की कल्पना या 'दृश्य' हैं, जबकि अस्ति-भाति-प्रिय वह शाश्वत 'दृष्टा' या ब्रह्म है जो हर वस्तु में समान रूप से विद्यमान है। अंततः, जब व्यक्ति बाहरी आकृतियों के मोह को छोड़कर हर जड़-चेतन में उसी एक अस्तित्व के प्रकाश को देखने लगता है, तब दृष्टा और दृश्य का भेद मिट जाता है और वह स्वयं को उस अनंत चेतना के रूप में अनुभव करने लगता है जो इस पूरे जगत का आधार है।
उपसंहार
इस संपूर्ण लेख का सार यह है कि मुक्ति कहीं बाहर खोजने की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन को देखने के दृष्टिकोण में एक मौलिक परिवर्तन है। जब हम स्वीकार कर लेते हैं कि मृत्यु शाश्वत है, तो हमारा अहंकार गल जाता है और हम वर्तमान क्षण की महत्ता को समझते हैं। भाग्य की स्वीकारोक्ति हमें व्यर्थ की चिंता और ईर्ष्या से मुक्त कर 'कृतज्ञता' के भाव में ले आती है, जिससे यह बोध होता है कि हम एक विराट दैवीय योजना का हिस्सा हैं। कर्म की निरंतरता और संतुलन हमें यह सिखाता है कि न तो आलस्य उचित है और न ही अति-श्रम; बल्कि फल की आसक्ति छोड़कर शांत भाव से अपना कर्तव्य करना ही वास्तविक योग है। अंततः, दृग्-दृश्य विवेक हमें उस सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाता है जहाँ हम यह जान लेते हैं कि हम यह शरीर या अशांत मन नहीं, बल्कि वह 'साक्षी चेतना' हैं जो सब कुछ प्रकाशित कर रही है। इन चारों उपायों का समन्वय ही व्यक्ति को 'स्थितप्रज्ञ' बनाता है, जो संसार के थपेड़ों के बीच भी हिमालय की भाँति अडिग और शांत रहता है। यही जीवनमुक्ति है॥
मोक्ष केवल मृत्यु के उपरांत मिलने वाली कोई काल्पनिक अवस्था नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का वह परम विवेक है जिसे हर क्षण अनुभव किया जाना चाहिए। हम अक्सर सुख और सुविधाओं के मोह में अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रख देते हैं। विचार कीजिए, यदि एक पक्षी को सोने के पिंजरे में डाल दिया जाए और उसे उत्तम भोजन दिया जाए, तो क्या वह सुखी रहेगा? पिंजरे की चमक उसके उड़ने की प्यास को नहीं बुझा सकती; उसके लिए नीला आकाश ही सत्य है। यही स्थिति हमारे जीवन की भी है। यदि आपको एक ऐसी नौकरी दी जाए जहाँ वेतन तो बहुत अधिक हो, लेकिन आपको अपनी जवानी के बहुमूल्य 24 घंटे उसी दफ्तर की चारदीवारी को देने पड़ें और प्रतिफल केवल सेवानिवृत्ति के बाद मिले, तो क्या आप अपना यौवन बेचने को सज्ज होंगे? या केवल धन के संचय के लिए अपने परिवार, मित्रों और अपनी मिट्टी से 10 वर्षों के लिए दूर हो जाना क्या वास्तव में उन्नति है?
मुक्ति पुरुषार्थ भले ही शास्त्रों में अंत में आता है, लेकिन दृष्टि में यह सदैव प्रथम होना चाहिए। जैसे एक कुशल व्यापारी व्यापार शुरू करने से पहले अपनी 'Exit Strategy' सज्ज रखता है, वैसे ही जीवन के हर पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम) में हमारे पास मोह और कर्ताभाव से बाहर निकलने का मार्ग होना चाहिए। यदि आप नहीं जानते कि कब 'रुकना' है और कब 'छोड़ना' है, तो आप संसार को नहीं भोग रहे, बल्कि संसार आपको भोग रहा है। अतः मुक्ति का अर्थ पलायन नहीं, बल्कि पूर्ण जागरूकता के साथ यह समझना है कि हम इस जगत रूपी रंगमंच पर केवल अपना पात्र (Role) निभाने आए हैं। जब हम मृत्यु की शाश्वतता, भाग्य की गरिमा, कर्म का संतुलन और दृष्टा का विवेक अपना लेते हैं, तब हम पिंजरे के सोने पर नहीं, बल्कि अपनी आज़ाद उड़ान पर ध्यान देते हैं। याद रखें, जिस पुरुषार्थ में 'बाहर निकलने का द्वार' (Exit) न हो, वह पुरुषार्थ नहीं, बल्कि एक अंतहीन कारागार है।
आइये मोक्ष का सार देखें और समझें की मोक्षप्राप्ति के क्या उपाय हमने यहाँ जाने?
| मुक्ति का उपाय | मूल मंत्र (Key Concept) | जीवन में प्रभाव |
|---|---|---|
| ज्ञान योग (मृत्यु) | "मृत्यु शाश्वत है" | विनम्रता का उदय और क्षणिकता का बोध |
| भक्ति योग (भाग्य) | "प्रारब्ध एवं भाग्य को स्वीकार करो" | "मन का हो तो अच्छा, न हो तो और भी अच्छा" - संतोष परमआवश्यक है |
| कर्म योग (अनन्त कर्म) | "श्रम में ऋत (नियम) लाओ" | कर्म के साथ नातों, स्वास्थ्य और आनंद का संतुलन बनाओ |
| विवेक (स्थितप्रज्ञ) | "दृष्टा-दृश्य भेद समझो" | स्थितप्रज्ञ बनो |
अब आप बताइये क्या आप जो जॉब कर रहे हैं वह आपको बाँध रही है या मुक्ति दे रही है? क्या आप अपना समय अपने परिवार, सखा, सहेला, बंधुओं के साथ बिता रहे हैं? क्या आपका स्वास्थ्य संतुलित है? क्या आप टैंशन में तो नहीं रहते हर दिन? यदि हाँ तो आपको ये दुबारा पढ़ना चाहिए और अपने जीवन को एक नई दिशा देनी चाहिए॥
