॥ साए में धूप ॥


॥कहीं पे धूप ॥

कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गएकहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए ।जले जो रेत में तलवे तो हम



॥कहीं पे धूप ॥


कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए

कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए ।

जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा

बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए ।

खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को

सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए ।

दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों

तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए ।

लहू लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो

शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए ।

ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है

यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।