॥ साए में धूप ॥


॥चांदनी छत पे चल रही होगी ॥

चांदनी छत पे चल रही होगी अब अकेली टहल रही होगी फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा बर्फ़-सी वो पिघल र



॥चांदनी छत पे चल रही होगी ॥


चांदनी छत पे चल रही होगी

अब अकेली टहल रही होगी

फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा

बर्फ़-सी वो पिघल रही होगी

कल का सपना बहुत सुहाना था

ये उदासी न कल रही होगी

सोचता हूँ कि बंद कमरे में

एक शमअ-सी जल रही होगी

तेरे गहनों सी खनखनाती थी

बाजरे की फ़सल रही होगी

जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया

उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी