[{"data":1,"prerenderedAt":2205},["ShallowReactive",2],{"content-\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_09_purushartha_moksha":3,"content-query-GLb0wuOjVN":51},[4,12,17,21,25,29,33,37,41,45,49],{"_path":5,"title":6,"description":7,"part":8,"image":9,"prev_path":10,"next_path":11},"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fintro_01_intro","॥ परिचय ॥","यहाँ हम वैदिक दृष्टि से जीवन को समझने का प्रयास करेंगे। हम यहाँ कई सूत्रों को जोड़कर जीवन में सफल होने के उपाय ढूँढेंगे॥\n","॥ प्रस्तावना ॥","\u002Fimages\u002Fshiksha\u002Fjeevan_darshan.jpeg",null,"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_01_tripakshiyavivek",{"_path":11,"title":13,"description":14,"part":15,"image":9,"prev_path":5,"next_path":16},"॥ तृतीय मार्ग ॥","ज्ञान की परिक्षा का तीसरा मार्ग। बिना जिसके ज्ञान को प्रमाणित करना कठिन है॥\n","॥ आत्मज्ञान ॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_02_jnaan",{"_path":16,"title":18,"description":19,"part":15,"image":9,"prev_path":11,"next_path":20},"॥ ज्ञान ॥","ज्ञान से विद्या तक। व्यावहारिक अधिगम के प्राचीन चरण। यह स्पष्ट करता है कि कैसे सतही ज्ञान को जीवन का अंग बनाया जाता है॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_03_chittvijnaan",{"_path":20,"title":22,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":16,"next_path":24},"॥ चित्तविज्ञान ॥","पुरुषार्थ का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_04_varnn",{"_path":24,"title":26,"description":27,"part":15,"image":9,"prev_path":20,"next_path":28},"॥ चतुर्वण ॥","चतुर्वर्ण की तार्किक समीक्षा: अष्टलक्ष्मी, अष्टसरस्वती और एकादश शक्ति के माध्यम से समझिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का वास्तविक स्वरूप। प्राचीन दर्शन का आधुनिक विश्लेषण॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_05_ashram",{"_path":28,"title":30,"description":31,"part":15,"image":9,"prev_path":24,"next_path":32},"॥ आश्रम ॥","वर्णाश्रम की तार्किक समीक्षा और महत्व॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_06_purushartha_dharm",{"_path":32,"title":34,"description":35,"part":15,"image":9,"prev_path":28,"next_path":36},"॥ पुरुषार्थ (धर्म)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से धर्म की व्याख्या और धर्म परायण होने के लिए एक सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_07_purushartha_arth",{"_path":36,"title":38,"description":39,"part":15,"image":9,"prev_path":32,"next_path":40},"॥ पुरुषार्थ (अर्थ) ॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से अर्थ की व्याख्या और अर्थार्जन के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_08_purushartha_kaam",{"_path":40,"title":42,"description":43,"part":15,"image":9,"prev_path":36,"next_path":44},"॥ पुरुषार्थ (काम)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से काम का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_09_purushartha_moksha",{"_path":44,"title":46,"description":47,"part":15,"image":9,"prev_path":40,"next_path":48},"॥ पुरुषार्थ (मोक्ष)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से मोक्ष का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र।\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_10_purushartha_nishkarsha",{"_path":48,"title":50,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":44,"next_path":10},"॥ पुरुषार्थ (निष्कर्ष) ॥",{"_path":44,"_dir":52,"_draft":53,"_partial":53,"_locale":54,"title":46,"description":47,"navigation":55,"part":15,"author":56,"image":9,"tag":57,"body":61,"_type":2199,"_id":2200,"_source":2201,"_file":2202,"_stem":2203,"_extension":2204},"vedicjeevan",false,"",true,"Vikram Singh Rawat",[58,59,60],"literature","book","jeevandarshan",{"type":62,"children":63,"toc":2188},"root",[64,74,92,96,126,129,133,136,144,147,154,157,183,186,191,194,199,202,207,210,305,308,313,316,322,325,351,354,359,362,367,370,383,386,400,403,417,420,434,437,451,454,459,462,664,667,1834,1840,1843,1848,1851,1856,1859,1864,1867,1870,1873,1887,1890,1903,1906,1919,1922,1935,1938,1951,1954,1967,1970,1983,1986,1999,2002,2015,2018,2021,2024,2151,2154,2159,2162,2180,2183],{"type":65,"tag":66,"props":67,"children":68},"element","h1",{"id":54},[69],{"type":65,"tag":70,"props":71,"children":73},"binding",{"value":72},"$doc.title",[],{"type":65,"tag":75,"props":76,"children":79},"div",{"className":77},[78],"sub_heading",[80],{"type":65,"tag":81,"props":82,"children":83},"p",{},[84],{"type":65,"tag":85,"props":86,"children":87},"strong",{},[88],{"type":65,"tag":70,"props":89,"children":91},{"value":90},"$doc.description",[],{"type":65,"tag":93,"props":94,"children":95},"br",{},[],{"type":65,"tag":75,"props":97,"children":100},{"className":98},[99],"shloka",[101],{"type":65,"tag":102,"props":103,"children":104},"blockquote",{},[105],{"type":65,"tag":81,"props":106,"children":107},{},[108,111,117,119,124],{"type":109,"value":110},"text","यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।\n",{"type":65,"tag":112,"props":113,"children":114},"em",{},[115],{"type":109,"value":116},"जब हृदय में स्थित सभी कामनाएं (इच्छाएं) पूरी तरह से छूट जाती हैं।",{"type":109,"value":118},"\nअथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":120,"children":121},{},[122],{"type":109,"value":123},"तब मरणधर्मा (नश्वर) मनुष्य अमर हो जाता है और इसी लोक में ब्रह्म का अनुभव कर लेता है॥",{"type":109,"value":125},"\n— कठोपनिषद (अध्याय २, वल्ली ३, श्लोक १४)",{"type":65,"tag":93,"props":127,"children":128},{},[],{"type":65,"tag":130,"props":131,"children":132},"hr",{},[],{"type":65,"tag":93,"props":134,"children":135},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":137,"children":138},{},[139],{"type":65,"tag":140,"props":141,"children":143},"img",{"alt":142,"src":9},"॥ पुरुषार्थ (मोक्ष) ॥",[],{"type":65,"tag":93,"props":145,"children":146},{},[],{"type":65,"tag":148,"props":149,"children":151},"h2",{"id":150},"मोक्ष-मुक्ति-आत्मज्ञान-स्वतंत्रता",[152],{"type":109,"value":153},"मोक्ष (मुक्ति, आत्मज्ञान, स्वतंत्रता)",{"type":65,"tag":93,"props":155,"children":156},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":158,"children":160},{"className":159},[99],[161],{"type":65,"tag":102,"props":162,"children":163},{},[164],{"type":65,"tag":81,"props":165,"children":166},{},[167,169,174,176,181],{"type":109,"value":168},"योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।\n",{"type":65,"tag":112,"props":170,"children":171},{},[172],{"type":109,"value":173},"जो साधक आत्मा में ही सुख वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है और जो आत्मा में ही ज्ञान की ज्योति वाला है।",{"type":109,"value":175},"\nस योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":177,"children":178},{},[179],{"type":109,"value":180},"वह ब्रह्मरूप बना हुआ योगी 'ब्रह्मनिर्वाण' (मोक्ष) को प्राप्त होता है॥",{"type":109,"value":182},"\n— श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ५, श्लोक २४)",{"type":65,"tag":93,"props":184,"children":185},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":187,"children":188},{},[189],{"type":109,"value":190},"मोक्ष का अर्थ है — मुक्ति, यहाँ इसका अर्थ है जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति, आत्मा का परमात्मा में लय, या सभी बंधनों, इच्छाओं और अज्ञान से मुक्ति।\nउपनिषदों में मोक्ष को \"आत्मा और ब्रह्म का एकत्व\" कहा गया है। भारत के 9 के 9 दर्शनों में मोक्ष के प्रकार भिन्न-भिन्न हैं।\nउनमें से भी सांख्य और मिमांसा जैसे निरइश्वरवादी दर्शन जीवित मोक्ष की अवधारणा को भी प्रतिपादित करते हैं।\nक्योंकि मोक्ष केवल मृत्यु के बाद की स्थिति नहीं, अपितु जीवन रहते हुए भी अहंकार, अज्ञान,\nवासनाओं और बंधनों से मुक्त होकर जीना है। यह आत्मज्ञान, आंतरिक शांति, और पूर्ण स्वतंत्रता की अवस्था है।\nमोक्ष के मार्ग — ज्ञानयोग, भक्ति योग, कर्मयोग, राजयोग का उपनिषद, गीता और योगसूत्रों में विस्तार से वर्णन मिलता हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":192,"children":193},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":195,"children":196},{},[197],{"type":109,"value":198},"नास्तिक दृष्टिकोण से मोक्ष की पारंपरिक व्याख्या (आत्मा-परमात्मा का मिलन, पुनर्जन्म से मुक्ति) स्वीकार्य न भी हो,\nतो भी \"आंतरिक स्वतंत्रता\", \"मानसिक शांति\", \"सभी बंधनों से मुक्ति\" जैसे मूल्य सार्वभौमिक हैं। मनोविज्ञान में भी\n\"सेल्फ-एक्चुअलाइजेशन\" (स्व-प्राप्ति), \"इंटरनल फ्रीडम\" (आंतरिक स्वतंत्रता) को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है।\nमोक्ष केवल \"परलोक\" की वस्तु नहीं, अपितु मानसिक स्वास्थ्य और 'बर्नआउट' का समाधान भी है।\nभारतीय दर्शन के अनुसार मोक्ष की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि अज्ञान ही समस्त दुखों और जन्म-मरण के चक्र का मूल कारण है॥",{"type":65,"tag":93,"props":200,"children":201},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":203,"children":204},{},[205],{"type":109,"value":206},"सभी 9 दर्शनों का सार यह है कि जब मनुष्य अपनी अज्ञानता का त्याग कर अपने वास्तविक स्वरूप\n(चाहे वह जैन का अनंत सुख हो, बौद्ध की परम शांति हो, या वेदांत का ब्रह्म-आनंद) को पहचान\nलेता है, तभी वह संसार के कष्टों से मुक्त होकर शाश्वत आनंद प्राप्त कर सकता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":208,"children":209},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":212,"children":213},"ol",{},[214,225,235,245,255,265,275,285,295],{"type":65,"tag":215,"props":216,"children":217},"li",{},[218,223],{"type":65,"tag":85,"props":219,"children":220},{},[221],{"type":109,"value":222},"चार्वाक -",{"type":109,"value":224}," देह का विनाश ही मोक्ष है, क्योंकि जीवन का स्वभाव ही कष्टकारी है और मृत्यु ही समस्त शारीरिक दुखों का एकमात्र अंत है॥",{"type":65,"tag":215,"props":226,"children":227},{},[228,233],{"type":65,"tag":85,"props":229,"children":230},{},[231],{"type":109,"value":232},"जैन -",{"type":109,"value":234}," आत्मा का कर्म-पुद्गलों से मुक्त होकर ऊर्ध्वगमन 'कैवल्य' है, जिससे जीव अपने मूल स्वरूप 'अनंत ज्ञान और शाश्वत सुख' को पुनः प्राप्त कर लेता है॥",{"type":65,"tag":215,"props":236,"children":237},{},[238,243],{"type":65,"tag":85,"props":239,"children":240},{},[241],{"type":109,"value":242},"बौद्ध -",{"type":109,"value":244}," तृष्णा का क्षय और अविद्या का नाश 'निर्वाण' है, क्योंकि संसार 'सर्वं दुःखम्' है और इच्छाओं का अंत ही शून्य जैसी परम शांति प्रदान करता है॥",{"type":65,"tag":215,"props":246,"children":247},{},[248,253],{"type":65,"tag":85,"props":249,"children":250},{},[251],{"type":109,"value":252},"सांख्य -",{"type":109,"value":254}," पुरुष (आत्मा) और प्रकृति का विवेक-ज्ञान ही मुक्ति है, जिससे आत्मा अज्ञानवश प्रकृति के दुखों को अपना समझना छोड़कर स्वयं के 'द्रष्टा' रूप में स्थित हो जाती है॥",{"type":65,"tag":215,"props":256,"children":257},{},[258,263],{"type":65,"tag":85,"props":259,"children":260},{},[261],{"type":109,"value":262},"योग -",{"type":109,"value":264}," चित्त की वृत्तियों का पूर्ण निरोध 'कैवल्य' है, जो अशुद्धियों को मिटाकर साधक को उसके वास्तविक चैतन्य स्वरूप और आनंद में प्रतिष्ठित करता है॥",{"type":65,"tag":215,"props":266,"children":267},{},[268,273],{"type":65,"tag":85,"props":269,"children":270},{},[271],{"type":109,"value":272},"न्याय -",{"type":109,"value":274}," दुखों की आत्यंतिक निवृत्ति ही मोक्ष है, क्योंकि मिथ्या ज्ञान ही जन्म-मरण का कारण है और तत्वज्ञान से ही इस अंतहीन चक्र की समाप्ति संभव है॥",{"type":65,"tag":215,"props":276,"children":277},{},[278,283],{"type":65,"tag":85,"props":279,"children":280},{},[281],{"type":109,"value":282},"वैशेषिक -",{"type":109,"value":284}," आत्मा का उसके विशेष गुणों (सुख-दुख आदि) से पूर्ण विच्छेद ही मोक्ष है, जो जीव को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर परम शांत अवस्था में ले जाता है॥",{"type":65,"tag":215,"props":286,"children":287},{},[288,293],{"type":65,"tag":85,"props":289,"children":290},{},[291],{"type":109,"value":292},"मीमांसा -",{"type":109,"value":294}," कर्म-बंधनों का क्षय और आत्म-स्वरूप की उपलब्धि ही मोक्ष है, जिससे जीव सांसारिक कर्म-फलों के चक्र से निकलकर शाश्वत कल्याण को प्राप्त होता है॥",{"type":65,"tag":215,"props":296,"children":297},{},[298,303],{"type":65,"tag":85,"props":299,"children":300},{},[301],{"type":109,"value":302},"वेदांत -",{"type":109,"value":304}," अज्ञान (माया) का निवारण और 'ब्रह्म' से ऐक्य ही मोक्ष है, क्योंकि जीव मूलतः सच्चिदानंद है और स्वयं को ब्रह्म जानना ही पूर्ण आनंद की पराकाष्ठा है॥",{"type":65,"tag":93,"props":306,"children":307},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":309,"children":310},{},[311],{"type":109,"value":312},"भारतीय दर्शनों का सामूहिक निचोड़ यह है कि संसार के चक्र से मुक्ति का एकमात्र द्वार तत्वज्ञान (Right Knowledge) है।\nसभी दर्शन (चार्वाक को छोड़कर) इस बात पर सहमत हैं कि मनुष्य का मूल स्वभाव 'अज्ञान' के आवरण से ढका हुआ है,\nजिसके कारण वह स्वयं को शरीर, मन या इच्छाओं के साथ जोड़कर दुखी होता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए व्यक्ति को विवेकपूर्ण\nअभ्यास के माध्यम से बाहरी आसक्तियों और तृष्णा का त्याग करना चाहिए, ताकि वह अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान सके।\nसंक्षेप में, जब व्यक्ति आत्म-संयम और ज्ञान के प्रकाश से 'स्व' और 'पर' (प्रकृति\u002Fमाया) के भेद को जान लेता है,\nतब वह कर्म-बंधनों से मुक्त होकर उस शाश्वत शांति और आनंद में स्थित हो जाता है जिसे ही मोक्ष कहा गया है॥",{"type":65,"tag":93,"props":314,"children":315},{},[],{"type":65,"tag":148,"props":317,"children":319},{"id":318},"मोक्ष-के-प्रकार",[320],{"type":109,"value":321},"मोक्ष के प्रकार",{"type":65,"tag":93,"props":323,"children":324},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":326,"children":328},{"className":327},[99],[329],{"type":65,"tag":102,"props":330,"children":331},{},[332],{"type":65,"tag":81,"props":333,"children":334},{},[335,337,342,344,349],{"type":109,"value":336},"स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति।\n",{"type":65,"tag":112,"props":338,"children":339},{},[340],{"type":109,"value":341},"वह जो उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है, उसके कुल में कोई ब्रह्म को न जानने वाला उत्पन्न नहीं होता।",{"type":109,"value":343},"\nतरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":345,"children":346},{},[347],{"type":109,"value":348},"वह शोक को पार कर जाता है, पापों से मुक्त हो जाता है और हृदय की अज्ञान रूपी ग्रंथियों से छूटकर अमर हो जाता है॥",{"type":109,"value":350},"\n— मुण्डकोपनिषद् (तृतीय मुण्डक, द्वितीय खण्ड, श्लोक ९)",{"type":65,"tag":93,"props":352,"children":353},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":355,"children":356},{},[357],{"type":109,"value":358},"शिव पुराण के अनुसार, मोक्ष कोई अचानक घटने वाली घटना नहीं, अपितु भक्त और महादेव के बीच की\nदूरी घटने की एक क्रमिक यात्रा है। जब साधक निष्काम भक्ति और ज्ञान के मार्ग पर चलता है, तो वह\nसांसारिक बंधनों से मुक्त होकर दिव्यता की ओर बढ़ता है। यह यात्रा बाहरी सानिध्य से आरम्भ होकर आंतरिक\nमिलन पर समाप्त होती है, जिसे इन पाँच सोपानों में समझा जा सकता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":360,"children":361},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":363,"children":364},{},[365],{"type":109,"value":366},"सनातन दर्शन के अनुसार, मुक्ति कोई आकस्मिक घटना नहीं अपितु साधना की परिपक्वता से प्राप्त होने वाली चेतना की\nविभिन्न अवस्थाएँ हैं। जब जीव अज्ञान के पाश से मुक्त होने का संकल्प करता है, तो उसकी श्रद्धा और उपासना के\nअनुसार उसे इन पाँच श्रेणियों में से किसी एक की प्राप्ति होती है। यह यात्रा स्थूल लोक से सूक्ष्म ब्रह्म-तत्त्व तक की परिणति है॥",{"type":65,"tag":93,"props":368,"children":369},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":371,"children":372},{},[373],{"type":65,"tag":215,"props":374,"children":375},{},[376,381],{"type":65,"tag":85,"props":377,"children":378},{},[379],{"type":109,"value":380},"सालोक्य (समान लोक की प्राप्ति) -",{"type":109,"value":382}," यह मुक्ति का प्रथम स्तर है, जहाँ साधक अपने इष्ट देव के दिव्य लोक में स्थान प्राप्त\nकरता है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई सूर्य देव का अनन्य उपासक है, तो वह 'सूर्यलोक' को प्राप्त करता है, इसी प्रकार\nचंद्रलोक या अन्य दिव्य लोकों की प्राप्ति भी सालोक्य है। साधक जिस भी इष्ट (सूर्य, इंद्र, विष्णु या शिव) की अनन्य उपासना\nकरता है, वह उन्हीं के दिव्य लोक को प्राप्त करता है। यहाँ जीव संसार के त्रितापों से मुक्त होकर अपने आराध्य के दिव्य\nवातावरण का आनंद भोगता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":384,"children":385},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":387,"children":389},{"start":388},2,[390],{"type":65,"tag":215,"props":391,"children":392},{},[393,398],{"type":65,"tag":85,"props":394,"children":395},{},[396],{"type":109,"value":397},"सामीप्य (निकटता की प्राप्ति) -",{"type":109,"value":399}," लोक की प्राप्ति के पश्चात जब भक्ति और घनीभूत होती है, तो साधक को 'सामीप्य' प्राप्त\nहोता है। इसमें भक्त केवल लोक में ही नहीं रहता, अपितु अपने आराध्य के अत्यंत निकट रहने का सौभाग्य पाता है। वह\nप्रभु के पार्षद या प्रिय पात्र के रूप में उनकी उपस्थिति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है, जो उसकी निरंतर सेवा और सामीप्य\nसे तृप्त रहता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":401,"children":402},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":404,"children":406},{"start":405},3,[407],{"type":65,"tag":215,"props":408,"children":409},{},[410,415],{"type":65,"tag":85,"props":411,"children":412},{},[413],{"type":109,"value":414},"सारूप्य (समान रूप और पद की प्राप्ति) -",{"type":109,"value":416}," यह वह अवस्था है जहाँ भक्त का स्वरूप, गुण और शक्तियाँ उसके आराध्य के\nसमान हो जाती हैं। शास्त्रीय मान्यता है कि ब्रह्मांड के विभिन्न देव-पद (जैसे सूर्य, इंद्र, वायु आदि) शाश्वत हैं, किंतु उन पर\nआसीन होने वाले जीव कल्प-परिवर्तन के साथ बदलते रहते हैं। जिसे सारूप्य मुक्ति प्राप्त होती है, वह अगले कल्पों में साधना\nकी पूर्णता के कारण स्वयं उस 'देवता' के पद को सुशोभित कर सकता है। यहाँ जीव और ईश्वर का भेद लगभग समाप्त हो\nजाता है और वह स्वयं सृजन और नियमन की शक्ति धारण कर लेता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":418,"children":419},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":421,"children":423},{"start":422},4,[424],{"type":65,"tag":215,"props":425,"children":426},{},[427,432],{"type":65,"tag":85,"props":428,"children":429},{},[430],{"type":109,"value":431},"सायुज्य (ब्रह्म में पूर्ण विलय) -",{"type":109,"value":433}," सायुज्य मुक्ति केवल इष्ट देव तक सीमित रहने की स्थिति नहीं, अपितु यह उस विराट 'परब्रह्म'\nमें पूर्णतः विलीन हो जाने की अवस्था है। जिस प्रकार एक नदी अपनी नाम-रूप की सत्ता छोड़कर समुद्र में समाहित हो जाती\nहै और फिर स्वयं समुद्र ही बन जाती है, उसी प्रकार साधक की व्यक्तिगत चेतना उस अनंत निर्गुण ब्रह्म में एकाकार हो जाती\nहै। यहाँ 'अद्वैत' घटित होता है और द्वैत का लेशमात्र भी शेष नहीं बचता॥",{"type":65,"tag":93,"props":435,"children":436},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":438,"children":440},{"start":439},5,[441],{"type":65,"tag":215,"props":442,"children":443},{},[444,449],{"type":65,"tag":85,"props":445,"children":446},{},[447],{"type":109,"value":448},"कैवल्य (परम और अंतिम मुक्ति) -",{"type":109,"value":450}," यह मुक्ति की सर्वोच्च और निर्विकार अवस्था है। सांख्य दर्शन और योगसूत्र के अनुसार,\n'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' (जब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाए)। जहाँ सायुज्य में विलय की क्रिया का बोध है,\nवहीं कैवल्य वह स्थिति है जहाँ केवल 'शुद्ध चैतन्य' शेष रहता है। सायुज्य में 'द्वैत' से 'अद्वैत' की ओर संक्रमण की\nप्रक्रिया अन्तर्निहित है। परंतु कैवल्य में आत्मा को यह ज्ञात होता है कि वह स्वयं ही परम सत्य है। यहाँ आत्मा को यह साक्षात्कार होता है\nकि वह कभी बंधी ही नहीं थी, वह सदैव मुक्त, बुद्ध और शुद्ध स्वरूप ही थी। यहाँ न लोक है, न रूप है, न ही कोई अन्य—केवल\nएकमात्र अखंड सत्य (पुरुष, जीव, प्राण, ब्रह्म इत्यादि) शेष रहता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":452,"children":453},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":455,"children":456},{},[457],{"type":109,"value":458},"अतः यह स्पष्ट है कि मुक्ति का मार्ग केवल प्रार्थना तक सीमित नहीं है, अपितु यह स्वयं के देवत्व को जगाने की प्रक्रिया है। शास्त्रों का\nमत है कि \"देवो भूत्वा देवं यजेत्\" अर्थात देवता बनकर ही देवता की पूजा करनी चाहिए। आज का उपासक कई कल्पों के पश्चात स्वयं\nसृष्टि का नियामक 'ईश्वर' बन सकता है, क्योंकि आत्मा की क्षमता अनंत है। सालोक्य से आरम्भ होकर कैवल्य पर समाप्त होने वाली यह\nयात्रा जीव के आत्म-विस्तार की वह अनंत कथा है जो उसे 'क्षुद्र' से 'विराट' बना देती है॥",{"type":65,"tag":93,"props":460,"children":461},{},[],{"type":65,"tag":463,"props":464,"children":466},"swar-lipi",{":is-notation":465},"false",[467],{"type":65,"tag":468,"props":469,"children":470},"table",{},[471,500],{"type":65,"tag":472,"props":473,"children":474},"thead",{},[475],{"type":65,"tag":476,"props":477,"children":478},"tr",{},[479,485,490,495],{"type":65,"tag":480,"props":481,"children":482},"th",{},[483],{"type":109,"value":484},"मुक्ति का प्रकार",{"type":65,"tag":480,"props":486,"children":487},{},[488],{"type":109,"value":489},"मुख्य अर्थ",{"type":65,"tag":480,"props":491,"children":492},{},[493],{"type":109,"value":494},"शास्त्रीय स्रोत",{"type":65,"tag":480,"props":496,"children":497},{},[498],{"type":109,"value":499},"विशेषता",{"type":65,"tag":501,"props":502,"children":503},"tbody",{},[504,520,549,578,606,635],{"type":65,"tag":476,"props":505,"children":506},{},[507,511,514,517],{"type":65,"tag":508,"props":509,"children":510},"td",{},[],{"type":65,"tag":508,"props":512,"children":513},{},[],{"type":65,"tag":508,"props":515,"children":516},{},[],{"type":65,"tag":508,"props":518,"children":519},{},[],{"type":65,"tag":476,"props":521,"children":522},{},[523,531,536,544],{"type":65,"tag":508,"props":524,"children":525},{},[526],{"type":65,"tag":85,"props":527,"children":528},{},[529],{"type":109,"value":530},"सालोक्य",{"type":65,"tag":508,"props":532,"children":533},{},[534],{"type":109,"value":535},"इष्ट देव के लोक में निवास",{"type":65,"tag":508,"props":537,"children":538},{},[539],{"type":65,"tag":112,"props":540,"children":541},{},[542],{"type":109,"value":543},"भागवत पुराण",{"type":65,"tag":508,"props":545,"children":546},{},[547],{"type":109,"value":548},"त्रिताप से मुक्ति, दिव्य वातावरण",{"type":65,"tag":476,"props":550,"children":551},{},[552,560,565,573],{"type":65,"tag":508,"props":553,"children":554},{},[555],{"type":65,"tag":85,"props":556,"children":557},{},[558],{"type":109,"value":559},"सामीप्य",{"type":65,"tag":508,"props":561,"children":562},{},[563],{"type":109,"value":564},"इष्ट के निकटता",{"type":65,"tag":508,"props":566,"children":567},{},[568],{"type":65,"tag":112,"props":569,"children":570},{},[571],{"type":109,"value":572},"विष्णु पुराण",{"type":65,"tag":508,"props":574,"children":575},{},[576],{"type":109,"value":577},"पार्षद रूप में 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है।",{"type":65,"tag":102,"props":712,"children":713},{},[714],{"type":65,"tag":81,"props":715,"children":716},{},[717,719],{"type":109,"value":718},"एतद्वै तत् ॥१॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":720,"children":721},{},[722],{"type":109,"value":723},"नचिकेता, यही वह परम सत्य है।",{"type":65,"tag":102,"props":725,"children":726},{},[727],{"type":65,"tag":81,"props":728,"children":729},{},[730],{"type":109,"value":731},"— कठोपनिषद् (२.२.१)",{"type":65,"tag":93,"props":733,"children":734},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":736,"children":737},{},[738,740,745],{"type":109,"value":739},"जीवन में व्यक्ति को मुक्ति नहीं मिलती, वह सदा संसार में फँसा रहता है। इसके तीन मूल कारण हैं\n",{"type":65,"tag":85,"props":741,"children":742},{},[743],{"type":109,"value":744},"— मोह, कर्ताभाव और अविद्या",{"type":109,"value":746},"।",{"type":65,"tag":93,"props":748,"children":749},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":751,"children":752},{},[753],{"type":65,"tag":215,"props":754,"children":755},{},[756,761],{"type":65,"tag":85,"props":757,"children":758},{},[759],{"type":109,"value":760},"मोह",{"type":109,"value":762}," — व्यक्ति को मोह होता है पद, मान, प्रतिष्ठा, परिवार, सम्प्रदाय और ज्ञान तक से।\nयही मोह पहला बन्धन है। जीव अकेला आता है और अकेला ही जाता है, जो कुछ भी लेता\nया देता है, वह उसके कर्म का ही परिणाम है। योगवासिष्ठ कहता है — “मोह एव महाबन्धः”\n(मोह ही सबसे बड़ा बन्धन है)। परिवार का दायित्व आप पर है परंतु उनके अच्छे बुरे के लिए\nआप एक मात्र दोषी नहीं हो। मोह जीव को बार‑बार संसार में बाँधता है क्योंकि वह\nअसार वस्तुओं को सार मान लेता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":764,"children":765},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":767,"children":768},{"start":388},[769],{"type":65,"tag":215,"props":770,"children":771},{},[772,777],{"type":65,"tag":85,"props":773,"children":774},{},[775],{"type":109,"value":776},"कर्ताभाव",{"type":109,"value":778}," — दूसरा बन्धन है यह मानना कि संसार में जो कुछ घटित हो रहा है उसका\nकारण वही है। अपनों के दुःख में वह रोता है क्योंकि उसे लगता है कि वह दुःख कम कर सकता\nथा। किन्तु शास्त्र कहते हैं — “प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति\nमन्यते॥” (गीता ३.२७)। प्रत्येक जीव अपने कर्मफल का स्वयं भोग करता है। जब सारे प्रयास विफल\nहों, तब कर्मफल मानकर दुःखों को सहन करने में शान्ति मिलती है। यही कर्ताभाव‑त्याग का\nआरम्भ है॥",{"type":65,"tag":93,"props":780,"children":781},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":783,"children":784},{"start":405},[785],{"type":65,"tag":215,"props":786,"children":787},{},[788,793],{"type":65,"tag":85,"props":789,"children":790},{},[791],{"type":109,"value":792},"अविद्या",{"type":109,"value":794}," — तीसरा और सबसे गहरा बन्धन है अविद्या। जीव अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं\nजानता, वह शरीर, मन और इन्द्रियों को ही आत्मा मान लेता है। यही अज्ञान उसे बार‑बार जन्म\nदिलाता है। कठोपनिषद् कहता है — “अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः” — अज्ञान\nमें डूबे लोग स्वयं को ज्ञानी समझते हैं। जब तक आत्मस्वरूप का बोध नहीं होता, तब तक मुक्ति\nसम्भव नहीं॥",{"type":65,"tag":93,"props":796,"children":797},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":799,"children":800},{},[801],{"type":109,"value":802},"मोह जीव को बाह्य वस्तुओं से बाँधता है, कर्ताभाव उसे अहंकार में बाँधता है, और अविद्या उसे आत्मस्वरूप\nसे दूर रखती है। नीतिशास्त्र नियतिवादी होने से मना करता है परंतु जब आपके सारे प्रयास विफल हों तो\nकर्मफल मानकर दुःखों को भोगनें में शाँति मिलती है। मैं उसी शाँति को मोक्ष अथवा मुक्ति मानकर चल\nरहा हूँ। आइए इनका कारण और निवारण भी देखें॥",{"type":65,"tag":93,"props":804,"children":805},{},[],{"type":65,"tag":807,"props":808,"children":810},"h3",{"id":809},"ज्ञान-योग-मृत्यु-ही-परम-सत्य-है",[811],{"type":109,"value":812},"ज्ञान योग (मृत्यु ही परम सत्य है)",{"type":65,"tag":93,"props":814,"children":815},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":817,"children":819},{"className":818},[99],[820,836,849,865],{"type":65,"tag":102,"props":821,"children":822},{},[823],{"type":65,"tag":81,"props":824,"children":825},{},[826,828,831],{"type":109,"value":827},"यक्षः पप्रच्छ — किमाश्चर्यम्?",{"type":65,"tag":93,"props":829,"children":830},{},[],{"type":65,"tag":112,"props":832,"children":833},{},[834],{"type":109,"value":835},"यक्ष ने पूछा: सबसे बड़ा आश्चर्य क्या 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313)",{"type":65,"tag":93,"props":874,"children":875},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":877,"children":878},{},[879],{"type":109,"value":880},"मुक्ति का पहला सोपान यह है कि ये स्मरण रहे की एक दिन सबने मरना है। तुम मरोगे, मैं मरुँगा, तुम जिन्हे प्रेम करते हो वे मरेंगे और\nतुम जिनसे घृणा करते हो वह भी मरेंगे। संसार में अमर कोई नहीं है। सारे रावण, हिटलर, खिलजी मरें और सारे विवेकानंद, बुद्ध और\nजैन भी मरे। जब इश्वर इस धरती पे जन्म लेकर आया, वह राम के रूप में हो, कृष्ण के रूप में वह भी मरा। तो ये सोचना की मैं\nसदा जीवित रहूँगा ये तो ना केवल भूल है परंतु पाप है॥",{"type":65,"tag":93,"props":882,"children":883},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":885,"children":886},{},[887],{"type":109,"value":888},"एक कथा सुनाता हूँ। एक समय की बात है, एक प्रतापी नरेश के राजप्रासाद में एक आत्मज्ञानी सन्यासी का शुभागमन हुआ। राजा ने\nशास्त्रोक्त विधि से उनका स्वागत किया, उनके चरणों का प्रक्षालन किया और उन्हें अपने ही सिंहासन पर आसीन कर स्वयं एक\nविनीत सेवक की भाँति उनकी परिचर्या की॥",{"type":65,"tag":93,"props":890,"children":891},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":893,"children":894},{},[895],{"type":109,"value":896},"महात्मा के प्रस्थान के उपरांत, राजा के महामंत्री ने असंतोष व्यक्त करते हुए कहा — \"हे राजन्! आप इस विशाल आर्यावर्त के\nअधिपति हैं। एक भिक्षु के सम्मुख इस प्रकार नतमस्तक होना आपकी राजसी प्रतिष्ठा और गरिमा के प्रतिकूल है। यह दासत्व आपको\nशोभा नहीं देता।\"",{"type":65,"tag":93,"props":898,"children":899},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":901,"children":902},{},[903],{"type":109,"value":904},"राजा मन्द मुस्कुराए और उन्होंने महामंत्री को एक विचित्र आज्ञा दी— \"मंत्रीवर, आज राज्य में जितने भी पशु काल-कवलित हों, उनके शवों को एकत्र करें\nऔर उन्हें बाज़ार में विक्रय हेतु ले जाएँ।\" अगले दिन महामंत्री ने सूचित किया कि मृत पशुओं की चर्म, अस्थि और मांस के विक्रय से\nराजकोष में प्रचुर स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। राजा ने पुनः आदेश दिया— \"अब आज जितने भी मनुष्यों की मृत्यु हो, उनके देह को\nएकत्र करें और कल उन्हें विक्रय करने का प्रयास करें।\" महामंत्री ने वैसा ही किया, किंतु परिणाम पूर्णतः भिन्न था। कोई भी व्यक्ति\nमृत मानव देह को क्रय करने के लिए उद्यत नहीं था। एक सप्ताह, यहाँ तक\nकि एक मास व्यतीत हो जाने पर भी वह शव बिका नहीं, अपितु दुर्गंध के कारण समाज के लिए भार बन गया॥",{"type":65,"tag":93,"props":906,"children":907},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":909,"children":910},{},[911],{"type":109,"value":912},"तब राजा ने महामंत्री को अत्यंत गूढ़ दार्शनिक सत्य समझाते हुए कहा: \"हे अमात्य! तनिक विचार करो, मृत्यु के\nपश्चात इस नश्वर देह का मूल्य एक मृत पशु से भी न्यून है। जीवित अवस्था में जिसे तुम पद, प्रतिष्ठा और अहंकार का\nआधार मानते हो, प्राण पखेरू उड़ते ही वह 'अमेध्य' (अपवित्र) हो जाता है।\"",{"type":65,"tag":93,"props":914,"children":915},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":917,"children":919},{"className":918},[99],[920,933,946],{"type":65,"tag":102,"props":921,"children":922},{},[923],{"type":65,"tag":81,"props":924,"children":925},{},[926,928],{"type":109,"value":927},"गतप्राणस्य देहस्य, काष्ठलोष्टसमस्य च।\n",{"type":65,"tag":112,"props":929,"children":930},{},[931],{"type":109,"value":932},"जिस शरीर में प्राण नहीं रहे, वह लकड़ी और मिट्टी के ढेले के समान ही है।",{"type":65,"tag":102,"props":934,"children":935},{},[936],{"type":65,"tag":81,"props":937,"children":938},{},[939,941],{"type":109,"value":940},"यन्निधानं तु क्रियते, तत्कस्योपदिश्यते॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":942,"children":943},{},[944],{"type":109,"value":945},"उसका जो अंतिम संस्कार किया जाता है, वह वास्तव में किसके लिए किया जाता है॥",{"type":65,"tag":102,"props":947,"children":948},{},[949],{"type":65,"tag":81,"props":950,"children":951},{},[952],{"type":109,"value":953},"— महाभारत (वनपर्व, अरण्यक पर्व)",{"type":65,"tag":93,"props":955,"children":956},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":958,"children":959},{},[960],{"type":109,"value":961},"राजा ने सिद्ध किया कि बाह्य आवरण और राजसी वैभव क्षणिक हैं। मनुष्य की प्रतिष्ठा उसके पद में नहीं, अपितु उसके भीतर स्थित उस\n'परमात्म तत्त्व' और उसकी 'विनम्रता' में है। \"न हन्यते हन्यमाने शरीरे\" — शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नहीं मरती, किंतु जो\nअहंकार केवल शरीर से जुड़ा है, वह अंततः अपमानजनक अंत को प्राप्त होता है। मृत्यु के सम्मुख धन, संपत्ति और पद—सब शून्य हैं।\nअतः मनुष्य को अहंता का परित्याग कर सदैव उस शाश्वत सत्य का स्मरण रखना चाहिए कि वह केवल एक निमित्त मात्र है॥",{"type":65,"tag":93,"props":963,"children":964},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":966,"children":967},{},[968],{"type":109,"value":969},"जब भी कभी जीवन में लगे की समय का अभाव है, मैं फँस चुका हूँ या बहुत ही अधिक दुःखी हूँ तो सदा स्मरण रखना\nकि ये सब किसी दिन एक ही क्षण में समाप्त हो जाएगा। सुख में भी ये स्मरण रखना की ये भी स्थाई नहीं है और हमें\nअहंकार से बचना है॥",{"type":65,"tag":93,"props":971,"children":972},{},[],{"type":65,"tag":807,"props":974,"children":976},{"id":975},"भक्ति-योग-सबका-अपना-भाग्य-है",[977],{"type":109,"value":978},"भक्ति योग (सबका अपना भाग्य है)",{"type":65,"tag":93,"props":980,"children":981},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":983,"children":985},{"className":984},[99],[986,999,1012,1025,1038],{"type":65,"tag":102,"props":987,"children":988},{},[989],{"type":65,"tag":81,"props":990,"children":991},{},[992,994],{"type":109,"value":993},"यद्धात्रा निजभालपट्टलिखितं स्तोकं महद्वा धनं\n",{"type":65,"tag":112,"props":995,"children":996},{},[997],{"type":109,"value":998},"विधाता ने आपके भाग्य-रूपी ललाट पर जितना भी थोड़ा या बहुत धन लिख दिया है,",{"type":65,"tag":102,"props":1000,"children":1001},{},[1002],{"type":65,"tag":81,"props":1003,"children":1004},{},[1005,1007],{"type":109,"value":1006},"तत्प्राप्नोति मरुस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाधिकम् ।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1008,"children":1009},{},[1010],{"type":109,"value":1011},"वह मरुस्थल जैसी विषम परिस्थिति में भी निश्चित प्राप्त होगा, और सुमेरु पर्वत पर भी उससे अधिक नहीं मिलेगा।",{"type":65,"tag":102,"props":1013,"children":1014},{},[1015],{"type":65,"tag":81,"props":1016,"children":1017},{},[1018,1020],{"type":109,"value":1019},"तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्तिं वृथा मा कृथाः\n",{"type":65,"tag":112,"props":1021,"children":1022},{},[1023],{"type":109,"value":1024},"अतः धैर्यवान बनो और धनवानों के सामने व्यर्थ में दीनता (गिड़गिड़ाना) प्रदर्शित मत करो,",{"type":65,"tag":102,"props":1026,"children":1027},{},[1028],{"type":65,"tag":81,"props":1029,"children":1030},{},[1031,1033],{"type":109,"value":1032},"कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृह्णाति तुल्यं जलम् ॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1034,"children":1035},{},[1036],{"type":109,"value":1037},"देखो, घड़ा चाहे कुएँ में डाला जाए या अथाह समुद्र में, वह अपनी क्षमता के बराबर ही जल ग्रहण करता है।",{"type":65,"tag":102,"props":1039,"children":1040},{},[1041],{"type":65,"tag":81,"props":1042,"children":1043},{},[1044],{"type":109,"value":1045},"— नीतिशतकम्",{"type":65,"tag":93,"props":1047,"children":1048},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1050,"children":1051},{},[1052,1054,1059],{"type":109,"value":1053},"प्राचीन काल में एक अत्यंत ऐश्वर्यशाली राजा था जिसकी सात रूपवती कन्याएँ थीं। एक दिन राजा ने अपनी समस्त पुत्रियों को राजसभा में बुलाकर\nप्रश्न किया कि वे किसके भाग्य का अन्न ग्रहण करती हैं। छह ज्येष्ठ पुत्रियों ने राजा के अहंकार को पुष्ट करते हुए विनम्र स्वर में कहा\nकि वे साक्षात् अपने पिता के प्रताप और सौभाग्य से ही समस्त सुख भोग रही हैं। किंतु सबसे छोटी पुत्री, जो परम विदुषी और\nईश्वर-भक्त थी, उसे ज्ञात था कि उसका उत्तर उसके पिता को कुपित कर सकता भी तब भी उसने शांत भाव से उत्तर दिया कि\nहे तात! ",{"type":65,"tag":85,"props":1055,"children":1056},{},[1057],{"type":109,"value":1058},"इस संसार में प्रत्येक जीव अपने पूर्वकृत कर्मों और स्वयं के प्रारब्ध का ही भोग करता है",{"type":109,"value":1060},",\nमैं भी केवल अपने ही भाग्य का अन्न ग्रहण कर रही हूँ। पुत्री की यह सत्यवाणी राजा को वज्र के समान\nचुभी और उसने क्रोध के वशीभूत होकर घोषणा की कि वह अपनी इस पुत्री का विवाह किसी राजपुत्र से नहीं, अपितु नगर के\nद्वार पर मिलने वाले प्रथम भिक्षुक से करेगा ताकि उसका यह भाग्य का अहंकार टूट जाए॥",{"type":65,"tag":93,"props":1062,"children":1063},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1065,"children":1066},{},[1067,1069,1074],{"type":109,"value":1068},"नियति के विधान से उस दिन द्वार पर एक कुष्ठ रोग से ग्रस्त भिक्षुक खड़ा था और राजा ने हठवश अपनी सुकोमल पुत्री का विवाह उसी\nव्याधिग्रस्त पुरुष से कर दिया। राजकुमारी ने इसे नियति का संकेत मानकर तनिक भी विलाप नहीं किया, क्योंकि उसका अटूट विश्वास था\nकि ",{"type":65,"tag":85,"props":1070,"children":1071},{},[1072],{"type":109,"value":1073},"'मन का हो तो अच्छा और मन का न हो तो और भी अच्छा'",{"type":109,"value":1075},", क्योंकि जो हमारे मन का नहीं है, वह निश्चित ही उस विधाता के\nमन का है। वह अपने रुग्ण पति को टोकरी में रखकर वन-वन की खाक छानने लगी। एक रात्रि जब वह वन में विश्राम कर रही थी, उसने\nदेखा कि एक भयानक मणिधारी नाग उसके पति के मुख के समीप मंडरा रहा है। उस साहसी बाला ने अपने पुरुषार्थ और धैर्य से उस\nनाग को वश में कर लिया, जिससे प्रसन्न होकर नाग ने उसे अपनी दिव्य मणि प्रदान की। उस मणि के अलौकिक प्रभाव और राजकुमारी\nकी निस्वार्थ सेवा से उसका पति न केवल कुष्ठ रोग से मुक्त होकर साक्षात् कामदेव के समान तेजस्वी हो गया, अपितु वह वास्तव में एक\nउच्च कुल का युवराज निकला जिसका राज्य शत्रुओं ने छीन लिया था॥",{"type":65,"tag":93,"props":1077,"children":1078},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1080,"children":1081},{},[1082],{"type":109,"value":1083},"नाग की कृपा और राजकुमारी के सतित्व के बल पर उस राजपुत्र ने अपनी सेना पुनः एकत्रित की और अपना खोया हुआ वैभव व साम्राज्य\nप्राप्त कर लिया। वर्षों पश्चात जब वह राजकुमारी रानी बनकर अपने पिता के राज्य की सीमाओं से गुजरी, तो उसे ज्ञात हुआ कि उसके पिता\nका अहंकार उन्हें ले डूबा है। पड़ोसी राजाओं के आक्रमण और कुप्रबंधन के कारण राजा का संपूर्ण राज्य नष्ट हो चुका था और वे दाने-दाने\nको तरस रहे थे। जब राजा ने अपनी उसी पुत्री के ऐश्वर्य को देखा जिसे उन्होंने दरिद्रता में ढकेला था, तो उनका मस्तक ग्लानि से झुक गया।\nउन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से स्वीकार किया कि आज वे अपनी उसी पुत्री के भाग्य का अन्न ग्रहण कर रहे हैं। यह कथा सिखाती है कि प्रारब्ध\nको स्वीकार कर जब मनुष्य अटूट पुरुषार्थ करता है, तो ईश्वर की योजना अंततः उसे सर्वोच्च पद पर आसीन कर देती है। जैसा कि हरिवंश\nके दर्शन में निहित है, जीव को केवल अपने धर्म का पालन करना चाहिए, फल की व्यवस्था तो वह ईश्वर स्वयं करता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1085,"children":1086},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1088,"children":1089},{},[1090,1092,1097,1099,1104,1106,1111],{"type":109,"value":1091},"यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि ",{"type":65,"tag":85,"props":1093,"children":1094},{},[1095],{"type":109,"value":1096},"मैं कोई आजीवक या नियतिवादी नहीं हूँ",{"type":109,"value":1098},"। मैं यहाँ पर धर्म का ज्ञान भी नहीं दे रहा हूँ, मैं तो नीति शास्त्र के कुछ\nअसाधारण बिंदु यहाँ लिखना चाहता था जो व्यक्ति को दैनिक रूप से सहायता कर सकें। परंतु चूंकि मोक्ष, सन्यासीयों का मूलतः\nविषय है। तो मैं यहाँ ये कथा इसलिए लिख रहा हूँ कि भाग्य और पुरुषार्थ दोनो मिल कर व्यक्ति को महान बनाते हैं।\nबिना भाग्य के भी आप सफल नहीं हो सकते। मैं ",{"type":65,"tag":85,"props":1100,"children":1101},{},[1102],{"type":109,"value":1103},"पौत्तपरिहारवाद अथवा परिणामवाद",{"type":109,"value":1105}," का सिद्धांत प्रतिपादित नहीं कर रहा।\nपरंतु मैं भाग्य का औचित्य भी तुच्छ नहीं मानता। व्यक्ति के जीवन में ",{"type":65,"tag":85,"props":1107,"children":1108},{},[1109],{"type":109,"value":1110},"पुरूषार्थ और भाग्य",{"type":109,"value":1112}," दोनो का तालमेल होना चाहिए।\nइसे समझाने के लिए एक उपनिषद की कथा और सुनाता हूँ॥",{"type":65,"tag":93,"props":1114,"children":1115},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1117,"children":1118},{},[1119],{"type":109,"value":1120},"प्राचीन काल में असुरों पर विजय प्राप्त करने के उपरांत इंद्र आदि देवता इस मिथ्या अभिमान में डूब गए कि यह विजय उनके निजी पुरुषार्थ का\nपरिणाम है। उनके इस अहंकार का मर्दन करने के लिए परब्रह्म एक तेजोमय 'यक्ष' के रूप में प्रकट हुए। जब अग्नि देव उस तेज के\nसमीप पहुँचे, तो यक्ष ने उनके सम्मुख एक लघु तृण (तिनका) रखकर उसे जलाने की चुनौती दी, किंतु संपूर्ण ब्रह्मांड को भस्म करने की\nशक्ति रखने वाले अग्नि देव उस तिनके को झुलसा तक न सके। इसी प्रकार वायु देव अपनी समस्त प्रचंड शक्ति लगाने के बाद भी उस\nतृण को उसके स्थान से विचलित न कर सके। अंततः देवराज इंद्र को बोध हुआ कि उनकी विजय और शक्ति वास्तव में उनकी अपनी\nनहीं, अपितु उस अदृश्य ब्रह्म की ही कृपा थी॥",{"type":65,"tag":93,"props":1122,"children":1123},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1125,"children":1126},{},[1127],{"type":109,"value":1128},"यह कथा हमें यह गंभीर बोध कराती है कि जैसे देवताओं की शक्ति के पीछे ब्रह्म की सत्ता थी, वैसे ही हमारे जीवन की लघुतम उपलब्धि के\nपीछे भी एक विशाल अदृश्य शृंखला कार्यरत है। जब आप अन्न का एक ग्रास ग्रहण करते हैं, तो वह केवल आपका पुरुषार्थ नहीं, अपितु उसमें\nएक अज्ञात कृषक का स्वेद, ट्रैक्टर चालक का कौशल, उर्वरक प्रदाता, सिंचन हेतु जल, विद्युत और ऋतु चक्र का सम्मिलित वरदान छिपा\nहोता है। इसी प्रकार, जब आप वस्त्र धारण करते हैं, तो कपास के लघु फूल से लेकर बुनकर के करघे और दर्जी के टांके तक, आप\nएक अटूट मानवीय शृंखला पर आश्रित होते हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":1130,"children":1131},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1133,"children":1134},{},[1135],{"type":109,"value":1136},"माता सीता की भी यही स्थिति है। वह महाराज जनक की प्रिय पुत्री थी, राजा दशरथ की पुत्रवधु, साक्षात श्री रघुराम की स्वामिनी,\nपराक्रमी और वीर लव-कुश की माता और हनुमान एवं लक्षमण की पूज्य माँ तुल्य। परंतु इसके पश्चात भी वो पैदा होते ही\nगुरूकुल चलीं गई तो वन में रहीं, फिर विवाह पश्चात वनवास कोई गईं और तत्पश्चात वह महाऋषि वाल्मिकी के आश्रम में पुनः\nवन में चली गई। इस तरह संसार के सारी श्री, शक्ति और सरस्वती होते हुए भी स्वयं माँ आदिशक्ति वन-वन भटकती रहीं।\nकारण बहुत ही सूक्ष्म था कि पद्म पुराण के अनुसार, बचपन में सीता जी ने एक तोते के जोड़े को पिंजरे में बंद किया था,\nजिससे विलग होते समय तोते ने शाप दिया था कि तुम्हें भी अपने पति से वियोग सहना होगा।\nशास्त्र कहते हैं कि \"कर्मणां गतिर्गहना\" (कर्मों की गति अत्यंत गहन है)। माता सीता का जीवन यह सिखाता है कि\nव्यक्ति कितना भी सामर्थ्यवान क्यों न हो, उसे अपने 'प्रारब्ध' का सम्मान करना पड़ता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1138,"children":1139},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1141,"children":1142},{},[1143],{"type":109,"value":1144},"अतः सत्य यही है कि हमारा कोई भी कार्य केवल व्यक्तिगत नहीं, अपितु समाज का एक सामूहिक अनुष्ठान है।\nइस जगत में सब कुछ एक-दूसरे से गुंथा हुआ है और हमें इस विराट व्यवस्था के प्रति सदैव कृतज्ञ होना चाहिए।\nहमें यह स्वीकार करना चाहिए कि कोई अदृश्य शक्ति है जो 'भाग्य' का स्वरूप लेकर हमें जीवन के पथ पर\nआगे या पीछे धकेलती है। इस बोध के साथ ही व्यक्ति अहंकार मुक्त होकर कृतज्ञता से जीवन व्यतीत कर सकता\nहै, क्योंकि जब हम इस अंतर्संबंध को समझ लेते हैं, तो यह भाव स्वतः जागृत हो जाता है कि— \"मन का हो तो\nअच्छा, और मन का ना हो तो और भी अच्छा\", क्योंकि तब वह उस अनंत सत्ता की मंगलकारी योजना का हिस्सा\nहोता है। आप सब के भाग्य के लिए उत्तरदायी नहीं हो। आप के माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन और पति-पत्नी\nमें से किसी के भाग्य पे आपका अधिकार नहीं है, ये मानना कि मैं सब को एक सुखदायी जीवन दे सकता हूँ\nभ्रम है। आप इस भ्रम से मुक्ति पाओ और जहाँ आप असमर्थ हों तो अपना भाग्य को स्वीकार कर लेना चाहिए।\nइससे जीवन में शाँति मिलती है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1146,"children":1147},{},[],{"type":65,"tag":807,"props":1149,"children":1151},{"id":1150},"कर्म-योग-कर्म-जन्म-जन्म-की-यात्रा-है",[1152],{"type":109,"value":1153},"कर्म योग ( कर्म जन्म-जन्म की यात्रा है )",{"type":65,"tag":93,"props":1155,"children":1156},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1158,"children":1160},{"className":1159},[99],[1161,1177,1193],{"type":65,"tag":102,"props":1162,"children":1163},{},[1164],{"type":65,"tag":81,"props":1165,"children":1166},{},[1167,1169,1172],{"type":109,"value":1168},"यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् ।",{"type":65,"tag":93,"props":1170,"children":1171},{},[],{"type":65,"tag":112,"props":1173,"children":1174},{},[1175],{"type":109,"value":1176},"जैसे हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माँ को ढूँढ लेता है,",{"type":65,"tag":102,"props":1178,"children":1179},{},[1180],{"type":65,"tag":81,"props":1181,"children":1182},{},[1183,1185,1188],{"type":109,"value":1184},"तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥",{"type":65,"tag":93,"props":1186,"children":1187},{},[],{"type":65,"tag":112,"props":1189,"children":1190},{},[1191],{"type":109,"value":1192},"उसी प्रकार पूर्वजन्म में किए गए कर्म अपने कर्ता को ढूँढ ही लेते हैं।",{"type":65,"tag":102,"props":1194,"children":1195},{},[1196],{"type":65,"tag":81,"props":1197,"children":1198},{},[1199],{"type":109,"value":1200},"— स्कन्दपुराण",{"type":65,"tag":93,"props":1202,"children":1203},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1205,"children":1206},{},[1207],{"type":109,"value":1208},"मैं जो समझाना चाहता हूँ उसे मैं कुछ कथाओं के माध्यम से समझाता हूँ। आईए कुछ कथाएँ जाने\nऔर समझे कर्म के गूढ़तम् ज्ञान को॥",{"type":65,"tag":93,"props":1210,"children":1211},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":1213,"children":1214},{},[1215],{"type":65,"tag":215,"props":1216,"children":1217},{},[1218],{"type":109,"value":1219},"नारद जी एक बार वन से जा रहे थे। वहाँ दो तपस्वी मिले। पहले ने पूछा— \"प्रभु के दर्शन कब होंगे?\"।\nनारद बोले— \"जितने इस वृक्ष पर पत्ते हैं, उतने जन्मों के बाद।\"\nवह तपस्वी रोने लगा। दूसरे तपस्वी को भी यही उत्तर मिला, तो वह प्रसन्न होकर नाचने लगा\nकि— \"चलो, यह तो निश्चित है कि दर्शन होंगे!\" उसकी इस असीम शांति और धैर्य को देखकर भगवान\nउसी क्षण प्रकट हो गए। यह कथा सिखाती है कि जब आपके पास जितना धैर्य हो उतना ही फल शीघ्र मिलता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1221,"children":1222},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":1224,"children":1225},{"start":388},[1226],{"type":65,"tag":215,"props":1227,"children":1228},{},[1229],{"type":109,"value":1230},"जब भीष्म शरशय्या पर लेटे थे, उन्होंने कृष्ण से पूछा कि मुझे यह कष्ट क्यों? कृष्ण ने उन्हें उनके पिछले 72 जन्म दिखाए,\nजहाँ उन्होंने एक टिड्डे को कांटों पर फेंका था। बोले यह तुम्हारा कर्म है। यह कथा बताती है कि कर्म का फल मिलने में\nदेरी हो सकती है, हजारों जन्म लग सकते हैं, इसलिए वर्तमान में शांत रहकर केवल श्रेष्ठ कर्म करना ही हमारे हाथ में है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1232,"children":1233},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":1235,"children":1236},{"start":405},[1237],{"type":65,"tag":215,"props":1238,"children":1239},{},[1240],{"type":109,"value":1241},"प्राचीन काल में राजा भरत (जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा) एक महान चक्रवर्ती सम्राट और परम भक्त थे।\nअपने जीवन के अंतिम पड़ाव में वे राज-पाट त्यागकर गंडकी नदी के तट पर तपस्या करने चले गए। उनका लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना था।\nकिंतु, वन में रहते हुए उन्हें एक असहाय मृग-शावक (हिरण के बच्चे) से अत्यधिक मोह हो गया। वे अपनी साधना\nभूलकर सारा समय उस मृग की सेवा में लगाने लगे। अंत समय में जब प्राण निकलने को हुए, तब भी उनका ध्यान\nईश्वर के स्थान पर उस मृग में ही अटका रहा। परिणामतः, उन्हें अगले जन्म में मृग (हिरण) की योनि में जन्म लेना पड़ा॥",{"type":65,"tag":93,"props":1243,"children":1244},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":1246,"children":1247},{"start":422},[1248],{"type":65,"tag":215,"props":1249,"children":1250},{},[1251,1253,1256,1258,1261,1264],{"type":109,"value":1252},"भगवान विष्णु के पार्षद जय और विजय बैकुंठ के द्वारपाल थे। एक बार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र\n'सनकादि ऋषि' (सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार) भगवान के दर्शन हेतु आए। वे बालक\nरूप में थे, किंतु परम ज्ञानी और वयोवृद्ध थे। जय-विजय ने उन्हें साधारण बालक समझकर द्वार पर\nही रोक दिया। ऋषियों को यह मर्यादा का उल्लंघन लगा और उन्होंने क्रोध में जय-विजय को शाप दे\nदिया— \"तुम बैकुंठ के अधिकारी नहीं हो, जाओ मर्त्य लोक (पृथ्वी) में जाकर असुर योनि में जन्म लो।\"\nभगवान विष्णु स्वयं बाहर आए और उन्होंने स्थिति को संभाला। ऋषियों का शाप अमिट था, किंतु प्रभु ने\nअपने सेवकों को दो विकल्प दिए:",{"type":65,"tag":93,"props":1254,"children":1255},{},[],{"type":109,"value":1257},"\n1. **\"या तो सात जन्मों तक विष्णु भक्त के रूप में पृथ्वी पर रहो।\"**\n2. **\"या फिर केवल तीन जन्मों तक विष्णु के 'शत्रु' के रूप में जन्म लो।\"**\n",{"type":65,"tag":93,"props":1259,"children":1260},{},[],{"type":65,"tag":93,"props":1262,"children":1263},{},[],{"type":109,"value":1265},"बैकुंठ के द्वारपाल जय और विजय ने शाप को विधाता का विधान मानकर स्वीकार किया और तीन जन्मों की उस लंबी\nयात्रा पर निकल पड़े जो उन्हें पुनः प्रभु के समीप ले जाने वाली थी। प्रथम जन्म में वे हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु, द्वितीय\nमें रावण व कुंभकर्ण और तृतीय में शिशुपाल व दंतवक्र के रूप में अवतरित हुए। यह विस्तार सिद्ध करता है कि आत्मा\nका विकास एक जन्म की हड़बड़ी नहीं, अपितु अनेक जन्मों में फैला हुआ एक गंभीर और सुव्यवस्थित पुरुषार्थ है। जैसे\nसमाज की हर अदृश्य कड़ी हमारे अन्न और वस्त्र से जुड़ी है, वैसे ही हमारे ये जन्म भी एक अखंड शृंखला हैं जहाँ इस\nबार का अधूरा कार्य अगले जन्म की पूर्णता बनता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1267,"children":1268},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1270,"children":1271},{},[1272],{"type":109,"value":1273},"इस प्रकार व्यक्ति को ये समझना चाहिए की कार्य (कर्म) कभी भी समाप्त नहीं होता। व्यक्ति घिस जाता है, मर जाता है,\nपरंतु श्रम (कर्म) चलता रहता है। आप को यदि लगता है की आज मैं थोड़ा और काम कर लेता हूँ कल\nविश्राम करूँगा तो ये स्वभाव आपके लिए घातक है। क्योंकि कल नहीं आएगा। एक जीवन में आप सब कुछ नहीं कर सकते हो।\nसबको सीखना बंद करो। ये मानों की एक जीवन में सिमित संसाधनों और आयु के अनुसार केवल एक ही कार्य सिद्ध\nहो सकता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1275,"children":1276},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1278,"children":1280},{"className":1279},[99],[1281,1294,1307],{"type":65,"tag":102,"props":1282,"children":1283},{},[1284],{"type":65,"tag":81,"props":1285,"children":1286},{},[1287,1289],{"type":109,"value":1288},"एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1290,"children":1291},{},[1292],{"type":109,"value":1293},"एक ही साधना में सब सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, अनेक साधनाओं में सब व्यर्थ हो जाता है।",{"type":65,"tag":102,"props":1295,"children":1296},{},[1297],{"type":65,"tag":81,"props":1298,"children":1299},{},[1300,1302],{"type":109,"value":1301},"रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1303,"children":1304},{},[1305],{"type":109,"value":1306},"रहीम कहते हैं कि जैसे पौधे की जड़ को सींचने से ही वह फूलता‑फलता है॥",{"type":65,"tag":102,"props":1308,"children":1309},{},[1310],{"type":65,"tag":81,"props":1311,"children":1312},{},[1313],{"type":109,"value":1314},"— रहीमदास",{"type":65,"tag":93,"props":1316,"children":1317},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1319,"children":1320},{},[1321],{"type":109,"value":1322},"यह कहना बंद करना चाहिए की समय नहीं है या फिर मैं बहुत अधिक बल देकर आवश्यकता से अधिक\nकार्य कर लूँगा। इसका घाटा आपको अपने स्वास्थ्य के रूप में चुकाना पड़ता है। जो की किसी भी\nधन, सम्पत्ति से अधिक महत्वपूर्ण है। मेरी भी लॉकडाउन में वर्क फ्रॉम होम में काम करते समय मेरी\nरीढ़ की हड्डी खीसक गई। L4-L5 में दर्द रहता था और 3 माह तो बैड रैस्ट पे रहा, फ़िज़ियोथैरपी करवाई\nतत्पश्चात भी मैं अब अधिक भार नहीं उठा सकता और अब मुझे कमर का दर्द रहता है। ये उस नौकरी के\nलायक था ही नहीं, जिसने मुझे 2 वर्ष बाद निकाल दिया। तो व्यक्ति को कर्म में भी संतुलन बरतना चाहिए।\n\"अति सर्वत्र वर्जयेत्\" अति सदा वर्जित है। यही ऋत का पहला नियम है। ब्रह्मांड में भी सूर्य और\nचंद्रमा का अपना विश्राम काल (अस्त होना) है। श्रम और विश्राम का संतुलन ही कार्य का ऋत है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1324,"children":1325},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1327,"children":1329},{"className":1328},[99],[1330,1343,1356],{"type":65,"tag":102,"props":1331,"children":1332},{},[1333],{"type":65,"tag":81,"props":1334,"children":1335},{},[1336,1338],{"type":109,"value":1337},"न हि कर्मणा न कर्माणि नाशं यान्ति कदाचन ।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1339,"children":1340},{},[1341],{"type":109,"value":1342},"कर्मों (अनुष्ठानों या कार्यों) के द्वारा संचित कर्मों का नाश कभी भी संभव नहीं है।",{"type":65,"tag":102,"props":1344,"children":1345},{},[1346],{"type":65,"tag":81,"props":1347,"children":1348},{},[1349,1351],{"type":109,"value":1350},"ज्ञानाग्निदग्धकर्माणां न पुनर्भवभागिनाम् ॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1352,"children":1353},{},[1354],{"type":109,"value":1355},"जिनके कर्म 'ज्ञान' की अग्नि में जलकर भस्म हो गए हैं, वे फिर कभी जन्म-मरण के चक्र (पुनर्जन्म) के भागी नहीं बनते॥",{"type":65,"tag":102,"props":1357,"children":1358},{},[1359],{"type":65,"tag":81,"props":1360,"children":1361},{},[1362],{"type":109,"value":1363},"— शिव-गीता (13.12)",{"type":65,"tag":93,"props":1365,"children":1366},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1368,"children":1369},{},[1370,1372],{"type":109,"value":1371},"शिव गीता कहती है कर्म से कर्म नहीं कटते। क्योंकि कर्म तो करोड़ो जन्मों से संचित है।\nउन्हे मिटाने के लिए तो फिर से करोड़ जन्म ही लेने पड़ेंगे। कर्म केवल ज्ञान से मिटते हैं।\nइस लिए कर्म की अति भी अच्छी नहीं है। कर्म में भी ऋत लाओ।\nआप भी स्वयं से सदा प्रश्न करें की क्या आज मैंने पर्याप्त कार्य कर लिया है।\n",{"type":65,"tag":85,"props":1373,"children":1374},{},[1375],{"type":109,"value":1376},"ना श्रम अल्प हो ना ही अति यही सच्चा संतुलन है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1378,"children":1379},{},[],{"type":65,"tag":807,"props":1381,"children":1383},{"id":1382},"दृश्य-और-दृष्टा-का-भेद",[1384],{"type":109,"value":1385},"दृश्य और दृष्टा का भेद",{"type":65,"tag":93,"props":1387,"children":1388},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1390,"children":1392},{"className":1391},[99],[1393,1406,1419,1432,1445],{"type":65,"tag":102,"props":1394,"children":1395},{},[1396],{"type":65,"tag":81,"props":1397,"children":1398},{},[1399,1401],{"type":109,"value":1400},"रूपं दृश्यं लोचनं दृक्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1402,"children":1403},{},[1404],{"type":109,"value":1405},"बाहरी रूप (दृश्य वस्तुएँ) देखी जाती हैं, और आँख (लोचन) उन्हें देखने वाला उपकरण है।",{"type":65,"tag":102,"props":1407,"children":1408},{},[1409],{"type":65,"tag":81,"props":1410,"children":1411},{},[1412,1414],{"type":109,"value":1413},"तद् दृश्यं दृक्तु मानसम्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1415,"children":1416},{},[1417],{"type":109,"value":1418},"पर आँख भी एक दृश्य है, जिसे देखने वाला मन है — मन आँख के अनुभव को देखता है।",{"type":65,"tag":102,"props":1420,"children":1421},{},[1422],{"type":65,"tag":81,"props":1423,"children":1424},{},[1425,1427],{"type":109,"value":1426},"दृश्या धीवृत्तयः साक्षी।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1428,"children":1429},{},[1430],{"type":109,"value":1431},"मन की वृत्तियाँ (विचार, भाव, स्मृतियाँ) भी देखी जाती हैं, उन्हें देखने वाला साक्षी है।",{"type":65,"tag":102,"props":1433,"children":1434},{},[1435],{"type":65,"tag":81,"props":1436,"children":1437},{},[1438,1440],{"type":109,"value":1439},"दृगेव न तु दृश्यते॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1441,"children":1442},{},[1443],{"type":109,"value":1444},"साक्षी‑चैतन्य (आत्मा) केवल देखने वाला है, स्वयं कभी देखा नहीं जा सकता।",{"type":65,"tag":102,"props":1446,"children":1447},{},[1448],{"type":65,"tag":81,"props":1449,"children":1450},{},[1451],{"type":109,"value":1452},"— दृग्‑दृश्य विवेक (श्लोक १)",{"type":65,"tag":93,"props":1454,"children":1455},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1457,"children":1458},{},[1459],{"type":109,"value":1460},"उपरोक्त श्लोक दृग-दृश्य विवेक नामक ग्रंथ का है। दृग्-दृश्य विवेक अद्वैत वेदांत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण\nऔर वैज्ञानिक ग्रंथ है, जिसका श्रेय प्रायः आदि शंकराचार्य या स्वामी विद्यारण्य को दिया जाता है। इस ग्रंथ\nका नाम ही इसका सार है: 'दृग्' (देखने वाला\u002Fसाक्षी) और 'दृश्य' (देखी जाने वाली वस्तु) के\nबीच का 'विवेक' (भेद) करना॥",{"type":65,"tag":93,"props":1462,"children":1463},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":1465,"children":1466},{},[1467,1477,1487],{"type":65,"tag":215,"props":1468,"children":1469},{},[1470,1475],{"type":65,"tag":85,"props":1471,"children":1472},{},[1473],{"type":109,"value":1474},"आंखें दृश्य हैं, मन दृष्टा है -",{"type":109,"value":1476}," हमारी आंखें रूप और रंग को देखती हैं, इसलिए आंखें 'दृष्टा' हैं और\nसंसार 'दृश्य'। लेकिन, जब आंखें बंद होती हैं या धुंधली होती हैं, तो हमें इसका पता चलता है।\nइसका अर्थ है कि मन आंखों को देख रहा है। अब मन 'दृष्टा' हो गया और आंखें 'दृश्य'॥",{"type":65,"tag":215,"props":1478,"children":1479},{},[1480,1485],{"type":65,"tag":85,"props":1481,"children":1482},{},[1483],{"type":109,"value":1484},"मन दृश्य है, साक्षी (आत्मा) दृष्टा है -",{"type":109,"value":1486}," मन में उठने वाले विचार, सुख-दुःख और इच्छाएं बदलती रहती हैं।\nचूंकि हम इन विचारों के आने-जाने को जान सकते हैं, इसलिए मन भी एक 'दृश्य' है॥",{"type":65,"tag":215,"props":1488,"children":1489},{},[1490,1495],{"type":65,"tag":85,"props":1491,"children":1492},{},[1493],{"type":109,"value":1494},"अंतिम दृष्टा -",{"type":109,"value":1496}," वह 'प्रकाश' या 'चेतना' जो मन के विचारों को भी प्रकाशित करती है, वही वास्तविक\n'दृग्' (दृष्टा) है। वह स्वयं किसी के द्वारा नहीं देखा जा सकता, क्योंकि उसके पीछे कोई और नहीं है।\nवही हमारी वास्तविक आत्मा है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1498,"children":1499},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1501,"children":1502},{},[1503],{"type":109,"value":1504},"सैन्य अभ्यास और अग्निशमन दलों को एक विशेष कौशल सिखाया जाता है—किसी भी स्थल पर पहुँचकर सर्वप्रथम\nकिसी ऊँचे स्थान से निरीक्षण करना। ऊँचाई से वस्तुस्थिति अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। हम जीव, दोष, द्रव्य, मार्ग,\nदेश, काल, व्यक्ति सबको सुगमता से देख पाएँ और उनका विश्लेषण कर पाएँ।\nसत्य तो यह है कि जो स्वयं अग्नि की लपटों में घिरा हो, वह शांत मन से जल का स्रोत नहीं खोज सकता।\nजलती बहुतलीय अट्टालिका में फँसा मनुष्य अपने ही घर से बाहर आने का मार्ग भूल जाता है - क्योकिं आग उसे डरा\nरही होती है, धुआँ उसे देखने नहीं देता और हवा का अभाव उसके विवेक पर प्रभाव डालता है। परंतु एक अपरिचित\nअग्निशामक उस रास्ते को सरलता से ढूँढ लेता है। ऐसा ही भूल-भलैया में भी होता है। दूरदृष्टि ना रखने वाला मनुष्य\nवहाँ से बाहर नहीं आ पाता। भूल-भुलैया से वही सुगमता से बाहर निकलता है, जो उसे ऊपर से देख रहा हो॥",{"type":65,"tag":93,"props":1506,"children":1507},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1509,"children":1510},{},[1511],{"type":109,"value":1512},"यही कारण है कि घोर कष्ट के समय हम अपनों से परामर्श लेते हैं, क्योंकि उस क्षण हम 'दृश्य' बनकर झुलस रहे होते\nहैं और अपना 'द्रष्टा' भाव खो देते हैं। कितना कल्याणकारी हो, यदि हम निरंतर आत्म-निरीक्षण की उस ऊँचाई पर\nस्थित रह सकें, जहाँ से जीवन की जटिलताएँ मात्र एक खेल दिखाई दें। जीवन की भूल-भुलैया में उलझने के बजाय,\nयदि हम स्वयं के ही साक्षी बन जाएँ, तो समाधान खोजना नहीं पड़ता, वह स्वतः ही प्रकट हो जाता है।\n'ऊँचाई' कहीं बाहर नहीं, अपितु हमारे भीतर की 'सजगता' (Awareness) है। जो अग्नि (दुख) को\nदेख रहा है, वह स्वयं अग्नि नहीं हो सकता। यही विवेक है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1514,"children":1515},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1517,"children":1518},{},[1519],{"type":109,"value":1520},"आइए इसे कुछ कथाओं के माध्यम से समझते हैं। एक बार तीन ऋषि घोर तपस्या कर रहे थे।\nभगवान विष्णु ने कौतूहलवश देवऋषि नारद से पूछा, \"नारद! तुम्हारे विचार में इन\nतीनों में से संसार के वास्तविक सार को कौन समझता है?\" नारद जी ने उत्तर दिया, \"प्रभु! जो आयु में सबसे बड़े और वरिष्ठ हैं,\nवे ही परम ज्ञानी होंगे। यदि वे नहीं, तो मंझले ऋषि को भी उचित ज्ञानी माना जा सकता है।\" भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा,\n\"जाओ, तीनों को मेरे दिव्य यान से बैकुंठ ले आओ। किंतु ध्यान रहे, एक-एक करके ही मुझसे मिलवाना और सबसे पहले सबसे बड़े ऋषि को लाना।\"",{"type":65,"tag":93,"props":1522,"children":1523},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":1525,"children":1526},{},[1527],{"type":65,"tag":215,"props":1528,"children":1529},{},[1530,1535,1537,1540],{"type":65,"tag":85,"props":1531,"children":1532},{},[1533],{"type":109,"value":1534},"वरिष्ठ ऋषि -",{"type":109,"value":1536}," जब बड़े ऋषि आए, तो प्रभु ने उनसे यात्रा का अनुभव पूछा।\nऋषि बोले, \"प्रभु! मार्ग में मैंने देखा कि एक बगुला बड़ी निर्दयता से मछली को खा रहा था। एक जीव दूसरे जीव के प्राण ले रहा है,\nयह दृश्य बहुत अनुचित और दुखद था। मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।\"",{"type":65,"tag":93,"props":1538,"children":1539},{},[],{"type":109,"value":1541},"भगवान विष्णु ने कहा, \"मुनिवर! आपने यह तो देखा कि मछली मर रही है, पर यह नहीं देखा कि वह बगुला तीन दिनों से भूखा था\nऔर उसे आज ही आहार प्राप्त हुआ है। आप अभी मोह दृष्टि में बंधे हैं, आपको अभी पूर्ण बोध नहीं है, अतः आप वापस जाइए।\"",{"type":65,"tag":93,"props":1543,"children":1544},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":1546,"children":1547},{"start":388},[1548],{"type":65,"tag":215,"props":1549,"children":1550},{},[1551,1556,1558,1561],{"type":65,"tag":85,"props":1552,"children":1553},{},[1554],{"type":109,"value":1555},"मंझले ऋषि -",{"type":109,"value":1557}," इसके बाद मंझले ऋषि आए। उन्होंने भी वही दृश्य देखा था। पूछने पर उन्होंने कहा,\n\"भगवन! संसार का नियम है कि जीव ही जीव का भोजन है, (जीव जीवस्य भोजनम्) इसमें कोई दोष नहीं। किंतु बगुले को मछली\nको शीघ्र मार देना चाहिए था। उसे तड़पाना उचित नहीं था।\"",{"type":65,"tag":93,"props":1559,"children":1560},{},[],{"type":109,"value":1562},"भगवान ने कहा, \"आपने मछली की तड़प तो देखी, पर यह नहीं देखा कि पिछले जन्म में इसी मछली ने उस बगुले को अत्यंत क्रूरता से\nतड़पाकर मारा था। आज कर्म अपना चक्र पूरा कर रहा है। आपने कर्म का न्याय नहीं देखा, आपकी दृष्टि अभी परा-अपरा में भेद नहीं\nसमझ पाती। आपका ज्ञान भी अभी अधूरा है, आप भी वापस लौट जाइए।\"",{"type":65,"tag":93,"props":1564,"children":1565},{},[],{"type":65,"tag":211,"props":1567,"children":1568},{"start":405},[1569],{"type":65,"tag":215,"props":1570,"children":1571},{},[1572,1577,1579,1582,1584,1587],{"type":65,"tag":85,"props":1573,"children":1574},{},[1575],{"type":109,"value":1576},"कनिष्ठ ऋषि -",{"type":109,"value":1578}," अंत में सबसे छोटे ऋषि आए। प्रभु के पूछने पर उन्होंने बड़े आनंद से कहा, \"प्रभु! पूरी यात्रा मंगलमय थी।\"\nभगवान ने पूछा, \"क्या तुमने वहां कोई बगुला और मछली देखी? क्या तुम्हें उन पर दया नहीं आई?\"",{"type":65,"tag":93,"props":1580,"children":1581},{},[],{"type":109,"value":1583},"ऋषि ने शांत भाव से उत्तर दिया, \"नहीं प्रभु! आपकी सृष्टि इतनी सुचारू और न्यायपूर्ण ढंग से चलती है कि इसमें हस्तक्षेप करने\nवाला मैं कौन होता हूँ? जो हो रहा है, वह आपके विधान के अनुसार ही है।\"",{"type":65,"tag":93,"props":1585,"children":1586},{},[],{"type":109,"value":1588},"भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, \"तुमने 'दृष्टा' और 'दृश्य' के भेद को समझ लिया है।\nदृग्-दृश्य विवेक के कारण तुम साक्षी भाव में स्थित हो,\nइसलिए तुम ही बैकुंठ में निवास के वास्तविक अधिकारी हो।\"",{"type":65,"tag":93,"props":1590,"children":1591},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1593,"children":1594},{},[1595],{"type":109,"value":1596},"यह कथा अत्यंत सरल ढंग से स्पष्ट करती है कि संसार को देखना मात्र पर्याप्त नहीं है, अपितु यह बोध होना आवश्यक है कि उसे\n'कौन' और 'किस भाव' से देख रहा है। पहले ऋषि की भूल यह थी कि वे केवल बाहरी दृश्य (आंखों के स्तर) पर अटक गए\nऔर भावनाओं के वशीभूत होकर स्वयं को घटना से जोड़ बैठे, जिससे उनके भीतर न्याय-अन्याय का द्वंद्व पैदा हुआ। दूसरे\nऋषि ने अपनी बुद्धि का प्रयोग तो किया, परंतु वे भी केवल तर्क, जन्म-मरण और कर्म के चक्र (मन के स्तर) तक ही सीमित रहे,\nजिससे वे सत्य की गहराई को नहीं देख पाए। असली 'दृष्टा' वह छोटा ऋषि था, जिसने यह जान लिया था कि जो कुछ\nभी घटित हो रहा है वह प्रकृति का एक खेल मात्र है और वह स्वयं उससे पूरी तरह अलग एक निर्लिप्त साक्षी है। इस\nप्रकार, यह कथा स्पष्ट करती है कि जब तक हम दृश्य के साथ खुद को जोड़कर दुखी या सुखी होते हैं, तब तक हम\n'दृश्य' के गुलाम होते हैं, लेकिन जब हम सब कुछ होते हुए देखकर भी अपने भीतर की शांति में अडिग रहते हैं, तभी\nहम वास्तविक 'दृष्टा' कहलाते हैं। अंततः, यह कहानी हमें अपनी पहचान उस चेतना से जोड़ने की प्रेरणा देती है जो हर\nपरिस्थिति में अपरिवर्तित और मुक्त रहती है। यह बोध ही हमें संसार के मानसिक बंधनों से मुक्त कर वास्तविक आनंद\nऔर बैकुंठ के मार्ग पर ले जाता है।",{"type":65,"tag":93,"props":1598,"children":1599},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1601,"children":1603},{"className":1602},[99],[1604,1617,1630,1643],{"type":65,"tag":102,"props":1605,"children":1606},{},[1607],{"type":65,"tag":81,"props":1608,"children":1609},{},[1610,1612],{"type":109,"value":1611},"द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1613,"children":1614},{},[1615],{"type":109,"value":1616},"दो सुहृद् समान वृक्ष पर साथ-साथ बैठे हैं।",{"type":65,"tag":102,"props":1618,"children":1619},{},[1620],{"type":65,"tag":81,"props":1621,"children":1622},{},[1623,1625],{"type":109,"value":1624},"तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1626,"children":1627},{},[1628],{"type":109,"value":1629},"उनमें से एक जीव मीठे फल (कर्म‑फल) का भोग करता है।",{"type":65,"tag":102,"props":1631,"children":1632},{},[1633],{"type":65,"tag":81,"props":1634,"children":1635},{},[1636,1638],{"type":109,"value":1637},"अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1639,"children":1640},{},[1641],{"type":109,"value":1642},"दूसरा (परमात्मा) स्वयं कुछ नहीं खाता, केवल साक्षीभाव से देखता रहता है।",{"type":65,"tag":102,"props":1644,"children":1645},{},[1646],{"type":65,"tag":81,"props":1647,"children":1648},{},[1649],{"type":109,"value":1650},"— मुण्डकोपनिषद् (३.१.१)",{"type":65,"tag":93,"props":1652,"children":1653},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1655,"children":1656},{},[1657],{"type":109,"value":1658},"मुण्डकोपनिषद् का यह अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक दो पक्षियों के माध्यम से 'जीवात्मा' और 'परमात्मा' के शाश्वत संबंध को\nस्पष्ट करता है। इस कथा के अनुसार, हमारा शरीर एक 'वृक्ष' के समान है, जिस पर दो पक्षी (चेतना के दो रूप)\nबैठे हैं। पहला पक्षी हमारा 'अहंकार' या 'जीवात्मा' है, जो संसार के खट्टे-मीठे फलों (सुख-दुःख और कर्मफल) को\nचखता है और उनमें इतना खो जाता है कि कभी हर्षित होता है तो कभी व्याकुल। वहीं, दूसरा पक्षी हमारी 'अंतरात्मा'\nया 'साक्षी चैतन्य' है, जो शांत भाव से बिना कुछ चखे केवल पहले पक्षी की गतिविधियों को देख रहा है। दृग्-दृश्य\nविवेक के अनुसार, जब तक हम स्वयं को 'फल खाने वाला' (भोक्ता) समझते हैं, तब तक हम दृश्य के बंधनों में बंधे\nरहते हैं, लेकिन जैसे ही हमारी दृष्टि उस दूसरे 'साक्षी पक्षी' पर पड़ती है, हमें यह बोध हो जाता है कि हम वास्तव में\nवह शांत दृष्टा ही हैं। यही बोध हमारे समस्त दुखों का अंत कर देता है, क्योंकि साक्षी पक्षी को न कोई फल बांध सकता है\nऔर न ही संसार का कोई उतार-चढ़ाव विचलित कर सकता है।",{"type":65,"tag":93,"props":1660,"children":1661},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1663,"children":1664},{},[1665],{"type":109,"value":1666},"एक कथा और प्रयोग कर रहा हूँ इसे समझाने को। ऋषि व्यास के पुत्र शुकदेव, जिन्होंने समस्त वेदों और शास्त्रों का गहन\nअध्ययन कर लिया था, अभी भी मन की उस परम शांति और सन्यास के वास्तविक मर्म को नहीं खोज पा रहे थे।\nजब व्यास जी ने देखा कि उनका पुत्र ज्ञान के बोझ तले तो दबा है पर अनुभव की दृष्टि अभी कोरी है, तो उन्होंने\nउसे मिथिला नरेश महाराज जनक के पास भेजा। शुकदेव के मन में भारी संकोच और अहंकार का मिश्रण था, उन्हें\nलगा कि जो राजा राजसी ठाठ-बाट, रानियों और वैभव के बीच डूबा है, वह एक विरक्त को भला सन्यास क्या सिखाएगा?",{"type":65,"tag":93,"props":1668,"children":1669},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1671,"children":1672},{},[1673],{"type":109,"value":1674},"राजा जनक ने उनका आदर-सत्कार किया और उन्हें अपने दैनिक कार्यों का साक्षी बनाया। शुकदेव ने देखा कि राजा शासन\nभी कर रहे हैं, न्याय भी कर रहे हैं और भोग भी विलास रहे हैं। उन्हें लगा कि यह तो एक साधारण संसारी जीवन है।\nकिंतु सत्य की परीक्षा अभी शेष थी।",{"type":65,"tag":93,"props":1676,"children":1677},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1679,"children":1680},{},[1681],{"type":109,"value":1682},"एक दिन जब दोनों नदी के तट पर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर रहे थे, तभी एक प्रहरी दौड़ता हुआ आया और चिल्लाया,\n\"महाराज! अनर्थ हो गया, वह अतिथि भवन धू-धू कर जल उठा है जहाँ मुनिवर ठहरे थे!\"",{"type":65,"tag":93,"props":1684,"children":1685},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1687,"children":1688},{},[1689],{"type":109,"value":1690},"यह सुनते ही शुकदेव का धैर्य जवाब दे गया। वे यह भूल गए कि वे एक ब्रह्मज्ञानी हैं और अपनी एकमात्र 'कमंडल' और 'अंगवस्त्र'\nबचाने के लिए गीली लंगोटी में ही उस जलते हुए भवन की ओर भाग खड़े हुए। दूसरी ओर, महाराज जनक शांत खड़े रहे।\nउन्होंने संयम से अग्नि शमन के आदेश दिए और पुनः अपने अनुष्ठान में लीन हो गए। उनके चेहरे पर न कोई शिकन थी, न कोई शोक।",{"type":65,"tag":93,"props":1692,"children":1693},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1695,"children":1696},{},[1697],{"type":109,"value":1698},"जब शुकदेव हाफते हुए वापस लौटे और अपनी लंगोटी जलने का विलाप करने लगे, तब महाराज जनक ने मंद मुस्कान के साथ कहा -",{"type":65,"tag":93,"props":1700,"children":1701},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1703,"children":1704},{},[1705],{"type":109,"value":1706},"\"मुनिवर! उस विशाल भवन को बनाने में मेरा अपार धन, श्रम और समय लगा था, वह क्षण भर में भस्म हो गया किंतु मैं\nविचलित नहीं हुआ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह एक 'दृश्य' था जो मुझसे पृथक और नश्वर है। किंतु आप, जो स्वयं को\nसन्यासी कहते हैं, एक तुच्छ वस्त्र (अंगवस्त्र) रूपी दृश्य के नष्ट होने पर व्याकुल हो उठे। वास्तविक सन्यास वस्त्रों के त्याग में\nनहीं, अपितु 'अहंकार' और 'आसक्ति' के त्याग में है।\"",{"type":65,"tag":93,"props":1708,"children":1709},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1711,"children":1713},{"className":1712},[99],[1714,1727,1740,1753,1766],{"type":65,"tag":102,"props":1715,"children":1716},{},[1717],{"type":65,"tag":81,"props":1718,"children":1719},{},[1720,1722],{"type":109,"value":1721},"नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1723,"children":1724},{},[1725],{"type":109,"value":1726},"तत्व को जानने वाला योगी यह अनुभव करे कि \"मैं वास्तव में कुछ भी नहीं करता हूँ\"॥",{"type":65,"tag":102,"props":1728,"children":1729},{},[1730],{"type":65,"tag":81,"props":1731,"children":1732},{},[1733,1735],{"type":109,"value":1734},"पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन्॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1736,"children":1737},{},[1738],{"type":109,"value":1739},"देखते हुए, सुनते हुए, स्पर्श करते हुए, सूँघते हुए, भोजन करते हुए, चलते हुए, सोते हुए और श्वास लेते हुए भी॥",{"type":65,"tag":102,"props":1741,"children":1742},{},[1743],{"type":65,"tag":81,"props":1744,"children":1745},{},[1746,1748],{"type":109,"value":1747},"प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1749,"children":1750},{},[1751],{"type":109,"value":1752},"बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए तथा आँखों को खोलते और मूंदते हुए भी॥",{"type":65,"tag":102,"props":1754,"children":1755},{},[1756],{"type":65,"tag":81,"props":1757,"children":1758},{},[1759,1761],{"type":109,"value":1760},"इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1762,"children":1763},{},[1764],{"type":109,"value":1765},"वह यही माने कि समस्त इंद्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं (मैं केवल उन इंद्रियों का भी दृष्टा हूँ)॥",{"type":65,"tag":102,"props":1767,"children":1768},{},[1769],{"type":65,"tag":81,"props":1770,"children":1771},{},[1772],{"type":109,"value":1773},"— श्रीमद्भगवद्गीता (५.८ - ५.९)",{"type":65,"tag":93,"props":1775,"children":1776},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1778,"children":1779},{},[1780],{"type":109,"value":1781},"दृग-दृश्य विवेक को समझने के लिए आप को स्थितप्रज्ञा को समझना होगा। जो व्यक्ति\nप्रारब्ध भोगकर भी स्वयं को सुख दुःख से हटाकर, संसार में रहते हुए उसके क्रियाकलापों से हटाकर\nकर्म करते हुए कर्मफल से स्वयं को हटाकर, और युद्ध करते हुए हार-जीत से हटा पाए वही स्थितप्रज्ञा है।\nऔर वही सच्चा योगी जीवन में ही मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। आइये समझते हैं कि इस साक्षी\nभाव को पाने की व्यावहारिक विधि क्या है?",{"type":65,"tag":93,"props":1783,"children":1784},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":1786,"children":1788},{"className":1787},[99],[1789,1802,1815],{"type":65,"tag":102,"props":1790,"children":1791},{},[1792],{"type":65,"tag":81,"props":1793,"children":1794},{},[1795,1797],{"type":109,"value":1796},"अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम्।\n",{"type":65,"tag":112,"props":1798,"children":1799},{},[1800],{"type":109,"value":1801},"अस्तित्व, प्रकाश, प्रियता, रूप और नाम — ये पाँच अंश हैं।",{"type":65,"tag":102,"props":1803,"children":1804},{},[1805],{"type":65,"tag":81,"props":1806,"children":1807},{},[1808,1810],{"type":109,"value":1809},"आद्यत्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम्॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":1811,"children":1812},{},[1813],{"type":109,"value":1814},"पहले तीन (अस्ति, भाति, प्रिय) ब्रह्मस्वरूप हैं, और अंतिम दो (रूप, नाम) जगत्‑स्वरूप हैं।",{"type":65,"tag":102,"props":1816,"children":1817},{},[1818],{"type":65,"tag":81,"props":1819,"children":1820},{},[1821],{"type":109,"value":1822},"— दृग्‑दृश्य विवेक (श्लोक २०)",{"type":65,"tag":93,"props":1824,"children":1825},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1827,"children":1828},{},[1829],{"type":109,"value":1830},"इस श्लोक के माध्यम से दृग्-दृश्य विवेक के मार्ग को समझने के लिए साधक को अपनी दृष्टि को स्थूल से सूक्ष्म की\nओर ले जाना चाहिए। सबसे पहले, हमें संसार की किसी भी वस्तु को देखते समय उसके बाहरी 'नाम' और 'रूप'\n(जैसे यह मोबाइल है, यह वृक्ष है) को केवल एक अस्थायी पहचान मानकर मानसिक रूप से अलग करना चाहिए,\nक्योंकि ये निरंतर बदलते रहते हैं। इसके बाद, अपना ध्यान उस वस्तु की सत्ता यानी 'अस्ति' (वह है), उसके\nज्ञान यानी 'भाति' (वह प्रकाशित हो रही है) और उससे मिलने वाले आनंद के मूल 'प्रिय' स्वरूप पर टिकाना\nचाहिए। जब हम इस अभ्यास को गहरा करते हैं, तो हमें समझ आता है कि नाम और रूप तो केवल मन की\nकल्पना या 'दृश्य' हैं, जबकि अस्ति-भाति-प्रिय वह शाश्वत 'दृष्टा' या ब्रह्म है जो हर वस्तु में समान रूप से\nविद्यमान है। अंततः, जब व्यक्ति बाहरी आकृतियों के मोह को छोड़कर हर जड़-चेतन में उसी एक अस्तित्व के\nप्रकाश को देखने लगता है, तब दृष्टा और दृश्य का भेद मिट जाता है और वह स्वयं को उस अनंत चेतना के रूप\nमें अनुभव करने लगता है जो इस पूरे जगत का आधार है।",{"type":65,"tag":93,"props":1832,"children":1833},{},[],{"type":65,"tag":148,"props":1835,"children":1837},{"id":1836},"उपसंहार-पुरुषार्थ-मोक्ष",[1838],{"type":109,"value":1839},"॥ उपसंहार: पुरुषार्थ (मोक्ष) ॥",{"type":65,"tag":93,"props":1841,"children":1842},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1844,"children":1845},{},[1846],{"type":109,"value":1847},"इस संपूर्ण लेख का सार यह है कि मुक्ति कहीं बाहर खोजने की वस्तु नहीं, अपितु जीवन को देखने के दृष्टिकोण में एक मौलिक परिवर्तन है।\nजब हम स्वीकार कर लेते हैं कि मृत्यु शाश्वत है, तो हमारा अहंकार गल जाता है और हम वर्तमान क्षण की महत्ता को समझते हैं।\nभाग्य की स्वीकारोक्ति हमें व्यर्थ की चिंता और ईर्ष्या से मुक्त कर 'कृतज्ञता' के भाव में ले आती है, जिससे यह बोध होता है कि\nहम एक विराट दैवीय योजना का हिस्सा हैं। कर्म की निरंतरता और संतुलन हमें यह सिखाता है कि न तो आलस्य उचित है और न ही\nअति-श्रम, अपितु फल की आसक्ति छोड़कर शांत भाव से अपना कर्तव्य करना ही वास्तविक योग है। अंततः, दृग्-दृश्य विवेक हमें उस सर्वोच्च\nशिखर पर पहुँचाता है जहाँ हम यह जान लेते हैं कि हम यह शरीर या अशांत मन नहीं, अपितु वह 'साक्षी चेतना' हैं जो सब कुछ\nप्रकाशित कर रही है। इन चारों उपायों का समन्वय ही व्यक्ति को 'स्थितप्रज्ञ' बनाता है, जो संसार के थपेड़ों के बीच भी हिमालय की\nभाँति अडिग और शांत रहता है। यही जीवनमुक्ति है॥",{"type":65,"tag":93,"props":1849,"children":1850},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1852,"children":1853},{},[1854],{"type":109,"value":1855},"मोक्ष केवल मृत्यु के उपरांत मिलने वाली कोई काल्पनिक अवस्था नहीं है, अपितु यह जीवन जीने का वह परम विवेक है जिसे हर क्षण\nअनुभव किया जाना चाहिए। हम प्रायः सुख और सुविधाओं के मोह में अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रख देते हैं। विचार कीजिए, यदि एक\nपक्षी को सोने के पिंजरे में डाल दिया जाए और उसे उत्तम भोजन दिया जाए, तो क्या वह सुखी रहेगा? पिंजरे की चमक उसके उड़ने\nकी प्यास को नहीं बुझा सकती, उसके लिए नीला आकाश ही सत्य है। यही स्थिति हमारे जीवन की भी है। यदि आपको एक ऐसी\nनौकरी दी जाए जहाँ वेतन तो बहुत अधिक हो, लेकिन आपको अपनी जवानी के बहुमूल्य 24 घंटे उसी दफ्तर की चारदीवारी को\nदेने पड़ें और प्रतिफल केवल सेवानिवृत्ति के बाद मिले, तो क्या आप अपना यौवन बेचने को सज्ज होंगे? या केवल धन के संचय के\nलिए अपने परिवार, मित्रों और अपनी मिट्टी से 10 वर्षों के लिए दूर हो जाना क्या वास्तव में उन्नति है?",{"type":65,"tag":93,"props":1857,"children":1858},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":1860,"children":1861},{},[1862],{"type":109,"value":1863},"मुक्ति पुरुषार्थ भले ही शास्त्रों में अंत में आता है, लेकिन दृष्टि में यह सदैव प्रथम होना चाहिए। जैसे एक कुशल व्यापारी व्यापार आरम्भ\nकरने से पहले अपनी 'Exit Strategy' सज्ज रखता है, वैसे ही जीवन के हर पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम) में हमारे पास मोह\nऔर कर्ताभाव से बाहर निकलने का मार्ग होना चाहिए। यदि आप नहीं जानते कि कब 'रुकना' है और कब 'छोड़ना' है, तो आप\nसंसार को नहीं भोग रहे, अपितु संसार आपको भोग रहा है। अतः मुक्ति का अर्थ पलायन नहीं, अपितु पूर्ण जागरूकता के साथ यह\nसमझना है कि हम इस जगत रूपी रंगमंच पर केवल अपना पात्र (Role) निभाने आए हैं। जब हम मृत्यु की शाश्वतता,\nभाग्य की गरिमा, कर्म का संतुलन और दृष्टा का विवेक अपना लेते हैं, तब हम पिंजरे के सोने पर नहीं, अपितु अपनी आज़ाद\nउड़ान पर ध्यान देते हैं। याद रखें, जिस पुरुषार्थ में 'बाहर निकलने का द्वार' (Exit) न हो, वह पुरुषार्थ नहीं, अपितु एक अंतहीन कारागार है।",{"type":65,"tag":93,"props":1865,"children":1866},{},[],{"type":65,"tag":130,"props":1868,"children":1869},{},[],{"type":65,"tag":93,"props":1871,"children":1872},{},[],{"type":65,"tag":1874,"props":1875,"children":1876},"ul",{},[1877],{"type":65,"tag":215,"props":1878,"children":1879},{},[1880,1885],{"type":65,"tag":85,"props":1881,"children":1882},{},[1883],{"type":109,"value":1884},"मोह -",{"type":109,"value":1886}," यह पहला बंधन है, जीव अकेला आता है और अकेला जाता है। जो असार को सार मान लेता है, वही बंधता है।",{"type":65,"tag":93,"props":1888,"children":1889},{},[],{"type":65,"tag":1874,"props":1891,"children":1892},{},[1893],{"type":65,"tag":215,"props":1894,"children":1895},{},[1896,1901],{"type":65,"tag":85,"props":1897,"children":1898},{},[1899],{"type":109,"value":1900},"कर्ताभाव -",{"type":109,"value":1902}," यह मानना कि \"मैं ही कारण हूँ\" दूसरा बंधन है। जब प्रयास विफल हों, तो कर्मफल मानकर दुःखों को सहना ही शांति का मार्ग है।",{"type":65,"tag":93,"props":1904,"children":1905},{},[],{"type":65,"tag":1874,"props":1907,"children":1908},{},[1909],{"type":65,"tag":215,"props":1910,"children":1911},{},[1912,1917],{"type":65,"tag":85,"props":1913,"children":1914},{},[1915],{"type":109,"value":1916},"अविद्या -",{"type":109,"value":1918}," स्वयं को शरीर, मन और इन्द्रियां मानना ही अज्ञान है। आत्मस्वरूप का बोध ही मुक्ति का एकमात्र द्वार है।",{"type":65,"tag":93,"props":1920,"children":1921},{},[],{"type":65,"tag":1874,"props":1923,"children":1924},{},[1925],{"type":65,"tag":215,"props":1926,"children":1927},{},[1928,1933],{"type":65,"tag":85,"props":1929,"children":1930},{},[1931],{"type":109,"value":1932},"ज्ञान योग (मृत्यु) -",{"type":109,"value":1934}," यह स्मरण रहे कि एक दिन सबको मरना है। मृत्यु की शाश्वतता का बोध अहंकार को मिटाकर विनम्रता लाता है।",{"type":65,"tag":93,"props":1936,"children":1937},{},[],{"type":65,"tag":1874,"props":1939,"children":1940},{},[1941],{"type":65,"tag":215,"props":1942,"children":1943},{},[1944,1949],{"type":65,"tag":85,"props":1945,"children":1946},{},[1947],{"type":109,"value":1948},"भक्ति योग (भाग्य) -",{"type":109,"value":1950}," प्रत्येक जीव अपने प्रारब्ध का ही भोग करता है। \"मन का हो तो अच्छा, न हो तो और भी अच्छा\" क्योंकि वह विधाता की योजना है।",{"type":65,"tag":93,"props":1952,"children":1953},{},[],{"type":65,"tag":1874,"props":1955,"children":1956},{},[1957],{"type":65,"tag":215,"props":1958,"children":1959},{},[1960,1965],{"type":65,"tag":85,"props":1961,"children":1962},{},[1963],{"type":109,"value":1964},"कर्म योग (संतुलन) -",{"type":109,"value":1966}," एक जीवन में सब कुछ सिद्ध नहीं हो सकता। श्रम और विश्राम में 'ऋत' (संतुलन) लाएं, अति सदा वर्जित है।",{"type":65,"tag":93,"props":1968,"children":1969},{},[],{"type":65,"tag":1874,"props":1971,"children":1972},{},[1973],{"type":65,"tag":215,"props":1974,"children":1975},{},[1976,1981],{"type":65,"tag":85,"props":1977,"children":1978},{},[1979],{"type":109,"value":1980},"दृश्य और दृष्टा का भेद -",{"type":109,"value":1982}," आंखें दृश्य हैं—मन दृष्टा है, मन दृश्य है—साक्षी (आत्मा) दृष्टा है। स्वयं को 'साक्षी' भाव में स्थित करना ही वास्तविक स्वतंत्रता है।",{"type":65,"tag":93,"props":1984,"children":1985},{},[],{"type":65,"tag":1874,"props":1987,"children":1988},{},[1989],{"type":65,"tag":215,"props":1990,"children":1991},{},[1992,1997],{"type":65,"tag":85,"props":1993,"children":1994},{},[1995],{"type":109,"value":1996},"अस्ति-भाति-प्रिय -",{"type":109,"value":1998}," नाम और रूप (दृश्य) को बदलकर, वस्तु की सत्ता (अस्ति), उसके ज्ञान (भाति) और आनंद (प्रिय) पर ध्यान दें।",{"type":65,"tag":93,"props":2000,"children":2001},{},[],{"type":65,"tag":1874,"props":2003,"children":2004},{},[2005],{"type":65,"tag":215,"props":2006,"children":2007},{},[2008,2013],{"type":65,"tag":85,"props":2009,"children":2010},{},[2011],{"type":109,"value":2012},"मुक्ति -",{"type":109,"value":2014}," जिस पुरुषार्थ में बाहर निकलने का द्वार न हो, वह पुरुषार्थ नहीं वरन कारागार है। 'रुकना' और 'छोड़ना' जानना ही मुक्ति है।",{"type":65,"tag":93,"props":2016,"children":2017},{},[],{"type":65,"tag":130,"props":2019,"children":2020},{},[],{"type":65,"tag":93,"props":2022,"children":2023},{},[],{"type":65,"tag":463,"props":2025,"children":2026},{":is-notation":465},[2027],{"type":65,"tag":468,"props":2028,"children":2029},{},[2030,2052],{"type":65,"tag":472,"props":2031,"children":2032},{},[2033],{"type":65,"tag":476,"props":2034,"children":2035},{},[2036,2042,2047],{"type":65,"tag":480,"props":2037,"children":2039},{"align":2038},"left",[2040],{"type":109,"value":2041},"मुक्ति का उपाय",{"type":65,"tag":480,"props":2043,"children":2044},{"align":2038},[2045],{"type":109,"value":2046},"मूल मंत्र (Key Concept)",{"type":65,"tag":480,"props":2048,"children":2049},{"align":2038},[2050],{"type":109,"value":2051},"जीवन में प्रभाव",{"type":65,"tag":501,"props":2053,"children":2054},{},[2055,2067,2088,2109,2130],{"type":65,"tag":476,"props":2056,"children":2057},{},[2058,2061,2064],{"type":65,"tag":508,"props":2059,"children":2060},{"align":2038},[],{"type":65,"tag":508,"props":2062,"children":2063},{"align":2038},[],{"type":65,"tag":508,"props":2065,"children":2066},{"align":2038},[],{"type":65,"tag":476,"props":2068,"children":2069},{},[2070,2078,2083],{"type":65,"tag":508,"props":2071,"children":2072},{"align":2038},[2073],{"type":65,"tag":85,"props":2074,"children":2075},{},[2076],{"type":109,"value":2077},"ज्ञान योग (मृत्यु)",{"type":65,"tag":508,"props":2079,"children":2080},{"align":2038},[2081],{"type":109,"value":2082},"\"मृत्यु शाश्वत 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