[{"data":1,"prerenderedAt":1206},["ShallowReactive",2],{"content-\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_06_purushartha_kaam":3,"content-query-5WmSARUirO":44},[4,12,17,21,25,29,33,37,41],{"_path":5,"title":6,"description":7,"part":8,"image":9,"prev_path":10,"next_path":11},"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fintro_01_intro","॥ परिचय ॥","यहाँ हम वैदिक दृष्टि से जीवन को समझने का प्रयास करेंगे। हम यहाँ कई सूत्रों को जोड़कर जीवन में सफल होने के उपाय ढूँढेंगे॥\n","॥ प्रस्तावना ॥","\u002Fimages\u002Fshiksha\u002Fjeevan_darshan.jpeg",null,"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_01_tripakshiyavivek",{"_path":11,"title":13,"description":14,"part":15,"image":9,"prev_path":5,"next_path":16},"॥ तृतीय मार्ग ॥","ज्ञान की परिक्षा का तीसरा मार्ग। बिना जिसके ज्ञान को प्रमाणित करना कठिन है॥\n","॥ आत्मज्ञान ॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_02_varnn",{"_path":16,"title":18,"description":19,"part":15,"image":9,"prev_path":11,"next_path":20},"॥ चतुर्वण ॥","चतुर्वर्ण की तार्किक समीक्षा: अष्टलक्ष्मी, अष्टसरस्वती और एकादश शक्ति के माध्यम से समझिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का वास्तविक स्वरूप। प्राचीन दर्शन का आधुनिक विश्लेषण॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_03_ashram",{"_path":20,"title":22,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":16,"next_path":24},"॥ आश्रम ॥","वर्णाश्रम की तार्किक समीक्षा और महत्व॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_04_purushartha_dharm",{"_path":24,"title":26,"description":27,"part":15,"image":9,"prev_path":20,"next_path":28},"॥ पुरुषार्थ (धर्म)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से धर्म की व्याख्या और धर्म परायण होने के लिए एक सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_05_purushartha_arth",{"_path":28,"title":30,"description":31,"part":15,"image":9,"prev_path":24,"next_path":32},"॥ पुरुषार्थ (अर्थ) ॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से अर्थ की व्याख्या और अर्थार्जन के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_06_purushartha_kaam",{"_path":32,"title":34,"description":35,"part":15,"image":9,"prev_path":28,"next_path":36},"॥ पुरुषार्थ (काम)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से काम का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_07_purushartha_moksha",{"_path":36,"title":38,"description":39,"part":15,"image":9,"prev_path":32,"next_path":40},"॥ पुरुषार्थ (मोक्ष)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से मोक्ष का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र।\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_08_purushartha_nishkarsha",{"_path":40,"title":42,"description":43,"part":15,"image":9,"prev_path":36,"next_path":10},"॥ पुरुषार्थ (निष्कर्ष) ॥","पुरुषार्थ का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n",{"_path":32,"_dir":45,"_draft":46,"_partial":46,"_locale":47,"title":34,"description":35,"navigation":48,"part":15,"author":49,"image":9,"tag":50,"body":54,"_type":1200,"_id":1201,"_source":1202,"_file":1203,"_stem":1204,"_extension":1205},"vedicjeevan",false,"",true,"Vikram Singh Rawat",[51,52,53],"literature","book","jeevandarshan",{"type":55,"children":56,"toc":1191},"root",[57,67,85,89,133,136,140,143,151,154,161,164,190,193,198,201,220,223,228,231,257,260,265,268,294,297,309,312,338,341,346,349,381,384,410,413,418,421,426,429,434,437,442,445,471,474,479,482,487,490,495,498,503,506,511,514,519,522,548,551,556,559,565,568,594,597,602,605,610,613,648,651,656,659,685,688,700,703,729,732,738,741,767,770,775,778,818,821,826,829,834,837,842,845,850,853,858,861,866,869,893,896,901,904,909,932,935,940,943,948,951,956,959,964,967,991,994,1183,1186],{"type":58,"tag":59,"props":60,"children":61},"element","h1",{"id":47},[62],{"type":58,"tag":63,"props":64,"children":66},"binding",{"value":65},"$doc.title",[],{"type":58,"tag":68,"props":69,"children":72},"div",{"className":70},[71],"sub_heading",[73],{"type":58,"tag":74,"props":75,"children":76},"p",{},[77],{"type":58,"tag":78,"props":79,"children":80},"strong",{},[81],{"type":58,"tag":63,"props":82,"children":84},{"value":83},"$doc.description",[],{"type":58,"tag":86,"props":87,"children":88},"br",{},[],{"type":58,"tag":68,"props":90,"children":93},{"className":91},[92],"shloka",[94],{"type":58,"tag":95,"props":96,"children":97},"blockquote",{},[98],{"type":58,"tag":74,"props":99,"children":100},{},[101,104,110,112,117,119,124,126,131],{"type":102,"value":103},"text","काममय एवायं पुरुष इति।\n",{"type":58,"tag":105,"props":106,"children":107},"em",{},[108],{"type":102,"value":109},"यह पुरुष (जीव) वास्तव में काममय है — इच्छाओं से ही निर्मित।",{"type":102,"value":111},"\nस यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति।\n",{"type":58,"tag":105,"props":113,"children":114},{},[115],{"type":102,"value":116},"जैसी उसकी इच्छा होती है, वैसा ही उसका संकल्प बनता है।",{"type":102,"value":118},"\nयत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते।\n",{"type":58,"tag":105,"props":120,"children":121},{},[122],{"type":102,"value":123},"जैसा संकल्प होता है, वैसा ही कर्म करता है।",{"type":102,"value":125},"\nयत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":127,"children":128},{},[129],{"type":102,"value":130},"और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है।",{"type":102,"value":132},"\n— (बृहदारण्यक उपनिषद् ४.४.५)",{"type":58,"tag":86,"props":134,"children":135},{},[],{"type":58,"tag":137,"props":138,"children":139},"hr",{},[],{"type":58,"tag":86,"props":141,"children":142},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":144,"children":145},{},[146],{"type":58,"tag":147,"props":148,"children":150},"img",{"alt":149,"src":9},"॥ पुरुषार्थ ॥",[],{"type":58,"tag":86,"props":152,"children":153},{},[],{"type":58,"tag":155,"props":156,"children":158},"h2",{"id":157},"काम-सौंदर्य-इच्छा-रसानंद",[159],{"type":102,"value":160},"काम (सौंदर्य, इच्छा, रसानंद)",{"type":58,"tag":86,"props":162,"children":163},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":165,"children":167},{"className":166},[92],[168],{"type":58,"tag":95,"props":169,"children":170},{},[171],{"type":58,"tag":74,"props":172,"children":173},{},[174,176,181,183,188],{"type":102,"value":175},"अकामतः क्रिया काचित् दृश्यते नेह कर्हिचित्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":177,"children":178},{},[179],{"type":102,"value":180},"इस संसार में बिना किसी कामना (इच्छा) के कभी कोई क्रिया दिखाई नहीं देती।",{"type":102,"value":182},"\nयद्यद्धि कुरुते किञ्चित् तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":184,"children":185},{},[186],{"type":102,"value":187},"मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह सब उसकी कामनाओं की ही चेष्टा (प्रयास) का परिणाम है।",{"type":102,"value":189},"\n— (मनुस्मृति, २.४)",{"type":58,"tag":86,"props":191,"children":192},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":194,"children":195},{},[196],{"type":102,"value":197},"काम का अर्थ केवल शारीरिक वासना नहीं, अपितु इच्छा, प्रेम, सौंदर्य, भावनाएँ, रचनात्मकता, कला, संगीत, साहित्य, और जीवन के सभी आनंददायक अनुभव हैं।\nयदि अनुभव ना हो पाए तो उनकी इच्छा मात्र भी काम है। परंतु काम ही संसार में सारे कर्मों का मूल है।\nकामसूत्र में \"कामो नाम मनसो वाञ्छा\" — काम मन की वह वांछा है जो सौंदर्य और आनंद की ओर आकर्षित करती है। संसार की\nसारी तीव्र इच्छाएँ काम हैं। और इच्छाओं के बिना जीवन में कोई कर्म होगा ही नहीं।",{"type":58,"tag":86,"props":199,"children":200},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":202,"children":204},{"className":203},[92],[205],{"type":58,"tag":95,"props":206,"children":207},{},[208],{"type":58,"tag":74,"props":209,"children":210},{},[211,213,218],{"type":102,"value":212},"इन्द्रियाणां मनःसन्निकर्षेण स्वविषयेषु अनुकूलप्रवृत्तिः कामः॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":214,"children":215},{},[216],{"type":102,"value":217},"इन्द्रियों का मन के साथ जुड़ाव होने पर अपने-अपने विषयों में जो सुखद या अनुकूल प्रवृत्ति होती है, वही 'काम' है।",{"type":102,"value":219},"\n— कामसूत्र (१.२.११)",{"type":58,"tag":86,"props":221,"children":222},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":224,"children":225},{},[226],{"type":102,"value":227},"काम का संतुलित और धर्मसम्मत पालन जीवन को आनंदमय, रचनात्मक और संतुलित बनाता है।\nकाम का दमन मानसिक विकृति, तनाव और सामाजिक विघटन को जन्म देता है, जबकि उसका अतिरेक पतन का कारण बनता है।\nसामान्यतः समाज में 'काम' (Desires) को अध्यात्म का शत्रु मानकर उसे दबाने या उससे भागने की शिक्षा दी जाती है।\nलेकिन यदि हम गहरे भारतीय दर्शन और उपनिषदों की ओर मुड़ें, तो पाते हैं कि काम कोई पाप नहीं, अपितु जीवन की वह प्राथमिक\nऊर्जा है जिसे यदि दिशा मिल जाए, तो वह 'समाधि' का मार्ग प्रशस्त करती है।",{"type":58,"tag":86,"props":229,"children":230},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":232,"children":234},{"className":233},[92],[235],{"type":58,"tag":95,"props":236,"children":237},{},[238],{"type":58,"tag":74,"props":239,"children":240},{},[241,243,248,250,255],{"type":102,"value":242},"कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":244,"children":245},{},[246],{"type":102,"value":247},"सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहले 'काम' (सृजन की इच्छा) उत्पन्न हुआ, जो मन का प्रथम बीज था।",{"type":102,"value":249},"\nसतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":251,"children":252},{},[253],{"type":102,"value":254},"बुद्धिमान ऋषियों ने अपने अंतःकरण में खोज करते हुए अपनी मेधा से 'सत' (अस्तित्व) के संबंध को 'असत' (अस्तित्वहीनता) में ढूँढ निकाला।",{"type":102,"value":256},"\n— (ऋग्वेद, १०.१२९.४)",{"type":58,"tag":86,"props":258,"children":259},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":261,"children":262},{},[263],{"type":102,"value":264},"ये सारा संसार अस्तित्व में आया क्योंकि ब्रह्म को इच्छा हुई की संसार उत्पन्न हो जाए। सृष्टि का मूल भी काम है। उपरोक्त श्लोक इस बात की\nपुष्टि करता है। और साथ ही स्वयं भगवान श्री कृष्ण स्वयं को उस 'काम' के रूप में स्वीकार करते हैं जो धर्म के विरुद्ध नहीं है।\nयह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि काम ऊर्जा अपने आप में अशुद्ध नहीं है॥",{"type":58,"tag":86,"props":266,"children":267},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":269,"children":271},{"className":270},[92],[272],{"type":58,"tag":95,"props":273,"children":274},{},[275],{"type":58,"tag":74,"props":276,"children":277},{},[278,280,285,287,292],{"type":102,"value":279},"बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् |\n",{"type":58,"tag":105,"props":281,"children":282},{},[283],{"type":102,"value":284},"बलवानों में वह बल मैं हूँ, जो काम (आसक्ति) और राग (मोह) से रहित है।",{"type":102,"value":286},"\nधर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ||\n",{"type":58,"tag":105,"props":288,"children":289},{},[290],{"type":102,"value":291},"हे भरतश्रेष्ठ! प्राणियों में धर्म के अनुकूल (मर्यादा के भीतर) जो काम (इच्छा) है, वह मैं हूँ।",{"type":102,"value":293},"\n— (श्रीमद्भगवद्गीता, ७.११)",{"type":58,"tag":86,"props":295,"children":296},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":298,"children":299},{},[300,302,307],{"type":102,"value":301},"बिना रस के, बिना आनंद के संसार का कोई मोल नहीं। कोई भी संसार में जन्म क्यों लेगा यदि यहाँ रस ना हो, आनंद ना हो। इसलिए तो वेदों में\nगंधर्ववेद को भी पढ़ाया जाता है। संगीतकला, छंदकला, नृत्यकला, चित्रकला, पाककला ऐसी 64 कलाएँ भारत में धर्म को समझने के लिए पढ़ाई जाती थी।\nक्यों हर एक कला एक योग है और वह योग आपको ब्रह्म से मिला सकता है। जैसे संगीत नादयोग, छंदकला मंत्रयोग, नृत्य नटयोग, शब्दयोग, हठयोग इत्यादि\nसब प्रभू का सार भी हैं और सब रस को भी समझते हैं। उपनिषद सिखाते हैं कि आनंद का स्रोत 'रस' है और परमात्मा स्वयं ",{"type":58,"tag":78,"props":303,"children":304},{},[305],{"type":102,"value":306},"'रसो वै सः'",{"type":102,"value":308},"\n(वह रस स्वरूप है) है। जीवन के रसों से भागना नहीं, अपितु उन्हें जानते हुए उनसे ऊपर उठना ही पुरुषार्थ है॥",{"type":58,"tag":86,"props":310,"children":311},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":313,"children":315},{"className":314},[92],[316],{"type":58,"tag":95,"props":317,"children":318},{},[319],{"type":58,"tag":74,"props":320,"children":321},{},[322,324,329,331,336],{"type":102,"value":323},"रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वा आनन्दी भवति।\n",{"type":58,"tag":105,"props":325,"children":326},{},[327],{"type":102,"value":328},"वह (परमात्मा) ही रस स्वरूप है। उस रस को प्राप्त करके ही यह जीवात्मा आनन्दित होता है।",{"type":102,"value":330},"\nको ह्येवान्यत् कः प्राण्यात्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":332,"children":333},{},[334],{"type":102,"value":335},"यदि इस हृदयाकाश में यह आनन्द न होता, तो भला कौन चेष्टा करता और कौन जीवित रहता?",{"type":102,"value":337},"\n— (तैत्तिरीय उपनिषद्, २.७.१)",{"type":58,"tag":86,"props":339,"children":340},{},[],{"type":58,"tag":155,"props":342,"children":344},{"id":343},"संभोग",[345],{"type":102,"value":343},{"type":58,"tag":86,"props":347,"children":348},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":350,"children":352},{"className":351},[92],[353],{"type":58,"tag":95,"props":354,"children":355},{},[356],{"type":58,"tag":74,"props":357,"children":358},{},[359,361,364,369,371,374,379],{"type":102,"value":360},"ये चिद्धि पूर्वे ऋतसाप आसन् साकं देवेभिरवदन्नृतानि।",{"type":58,"tag":86,"props":362,"children":363},{},[],{"type":58,"tag":105,"props":365,"children":366},{},[367],{"type":102,"value":368},"वे प्राचीन ऋषि, जो ऋत (सत्य) के साधक थे, देवों के साथ मिलकर सत्य-वचन करते थे।",{"type":102,"value":370},"\nते चिदवासुर्नह्यन्तमापुः समू नु पत्नीर्वृषभिर्जगम्युः॥",{"type":58,"tag":86,"props":372,"children":373},{},[],{"type":58,"tag":105,"props":375,"children":376},{},[377],{"type":102,"value":378},"उन्होंने ब्रह्मचर्य-व्रत का अतिक्रमण किए बिना ही गृहस्थ-धर्म का पालन किया; वे अपनी पत्नियों के पास गए और संतानोत्पत्ति की।",{"type":102,"value":380},"\n— (ऋग्वेद १.१७९.२)",{"type":58,"tag":86,"props":382,"children":383},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":385,"children":386},{},[387,389,394,396,401,403,408],{"type":102,"value":388},"हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि तीन प्रकार के ऋण है ऋषि ऋण, पितृ ऋण और देव ऋण। पितृ ऋण को चुकाने के कई सोपान हैं।\nउनमें से एक संभोग भी है। पितृ अपने पाप-पुण्य भोगने के पश्चात एक लोक में रुकते हैं जिसे ",{"type":58,"tag":78,"props":390,"children":391},{},[392],{"type":102,"value":393},"'पुत लोक'",{"type":102,"value":395}," कहा जाता है।\nशास्त्रों में 'पुत' (या पुं) नाम का एक विशेष नर्क बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति संतानहीन होते हैं, उन्हें इस\nकष्टकारी लोक में जाना पड़ता है। यहाँ आत्माएँ अपने अगले जन्म के लिए उचित शरीर और समय (प्रारब्ध) की प्रतीक्षा करती हैं।\nवंश में बच्चों का जन्म होना पितरों के लिए एक नया अवसर माना जाता है। मान्यता है कि पितर ही सामान्यतः अपने ही कुल में\nपोते-पोतियों के रूप में पुनर्जन्म लेते हैं ताकि वे अपने अधूरे कर्मों को पूरा कर सकें।\nइसलिए बच्चों को ",{"type":58,"tag":78,"props":397,"children":398},{},[399],{"type":102,"value":400},"पुत्र और पुत्री",{"type":102,"value":402}," कहते हैं, की उन्होंने पुत लोक को तार दिया।\nवहाँ एक ",{"type":58,"tag":78,"props":404,"children":405},{},[406],{"type":102,"value":407},"अंधकूप",{"type":102,"value":409}," होता है जहाँ पर उनके गिरने की निरंतर संभावना बनी रहती है और वो सदैव प्रतीक्षाग्रस्त होते हैं।",{"type":58,"tag":86,"props":411,"children":412},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":414,"children":415},{},[416],{"type":102,"value":417},"ये बताता है कि संसार को सुचारू रूप से चलने के लिए आपको विवाह करना पड़ेगा और बच्चे पैदा करने पड़ेंगें।\nऐसी कुछ कथाएँ शास्त्रों में हैं। उनमें से दो मैं बताता हूँ। महर्षि अगस्त्य घोर तपस्वी थे और उन्होंने विवाह न करने\nका निश्चय किया था। एक बार भ्रमण करते हुए उन्होंने एक विशाल कुआँ देखा, जिसमें उनके\nपूर्वज (पितर) पैर ऊपर और सिर नीचे करके लटके हुए थे। उनकी दशा अत्यंत दयनीय थी।\nअगस्त्य जी ने जब उनसे इसका कारण पूछा, तो उन्होंने कहा:\n\"हे पुत्र! हम तुम्हारे पूर्वज हैं। तुम्हारे विवाह न करने और संतान उत्पन्न न करने के कारण हमारा 'संतान-तन्तु' (वंश की निरंतरता) टूट गया है।\nजो व्यक्ति संतानहीन होता है, उसे 'पुत्' नामक नरक में जाना पड़ता है। हम इसी कारण यहाँ लटके हुए हैं। यदि तुम विवाह करके पुत्र\nउत्पन्न करोगे, तभी हमें मुक्ति मिलेगी और हम दिव्य लोकों को जा सकेंगे।\"\nइसलिए उन्होंने लोपमुद्रा से विवाह करा॥",{"type":58,"tag":86,"props":419,"children":420},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":422,"children":423},{},[424],{"type":102,"value":425},"विवाह के बाद भी अगस्त्य मुनि केवल तपस्या और साधना में लगे रहते थे। तब लोपामुद्रा उन्हें 'काम' और दांपत्य जीवन के महत्व को समझाते हुए कहती हैं:\n\"मैं कई वर्षों से दिन-रात तुम्हारी सेवा कर रही हूँ। अब बुढ़ापा मेरे शरीर की सुंदरता को कम कर रहा है। जो प्राचीन काल के महान ऋषि थे,\nजो सत्य के मार्ग पर चलते थे और देवताओं के साथ संवाद करते थे, उन्होंने भी अपनी पत्नियों के साथ सहवास किया और संतान उत्पन्न की।\nतपस्या और दांपत्य जीवन (काम) दोनों का संतुलन आवश्यक है।\" इसके बाद अगस्त्य मुनि स्वीकार करते हैं कि केवल तपस्या ही जीवन का सत्य\nनहीं है, अपितु पत्नी के साथ प्रेम और सृजन भी उतना ही पवित्र है॥",{"type":58,"tag":86,"props":427,"children":428},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":430,"children":431},{},[432],{"type":102,"value":433},"और ऐसी कथाएँ आपको महर्षि जरत्कारु, प्रजापति रुचि, महर्षि मंदपाल इत्यादि इत्यादि महानुभावों की भी मिलेंगीं। तो हमने कामशास्त्र लिखा,\nखजुराहो के मंदिर बनाए, अजंता ऐलोरा की गुफाएँ बनाई, 4 पुरुषार्थों में काम को रखा। आदि शंकराचार्य जीवन में केवल एक\nशास्त्रार्थ हारते हैं, विदुषी उभय भारती से, और उसका विषय होता है कामशास्त्र, चुँकि शंकराचार्य एक सन्यासी थे उन्हे इसका कोई ज्ञान नहीं था।\nफिर वह 6 महीने एक राजा के साथ रहते हैं जिसकी 100 रानियाँ थी और कामशास्त्र सीख कर आते हैं और उभय भारती को फिर\nहराते हैं। हमारे में कामदेव और रति की भी पूजा की जाती है। तो मेरा तात्पर्य है कि हमने\nसंभोग को कभी भी हेय नहीं माना अपितु संसार का चक्र चलाने के लिए\nआवश्यक कारक माना। जब श्री कृष्ण स्वयं कह रहे हैं कि मैं काम हूँ। तो काम को हेय मानना एक भूल है।\nसंभोग यहाँ केवल प्रजनन का साधन नहीं, बल्कि दो आत्माओं के बीच 'ऋत' (सत्य\u002Fनियम) का निर्वहन भी है।\nपरंतु मूल अंतर है काम वासना और काम योग जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।",{"type":58,"tag":86,"props":435,"children":436},{},[],{"type":58,"tag":155,"props":438,"children":440},{"id":439},"समाधि",[441],{"type":102,"value":439},{"type":58,"tag":86,"props":443,"children":444},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":446,"children":448},{"className":447},[92],[449],{"type":58,"tag":95,"props":450,"children":451},{},[452],{"type":58,"tag":74,"props":453,"children":454},{},[455,457,462,464,469],{"type":102,"value":456},"भोगेन भोगं त्यजति योगी योगेन चापरम्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":458,"children":459},{},[460],{"type":102,"value":461},"योगी भोग को भोगकर ही उससे ऊपर उठता है, और योग से शेष वासनाएँ शांत होती हैं।",{"type":102,"value":463},"\nभोगयोगयुतो देवि मुक्तिमार्गं स गच्छति॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":465,"children":466},{},[467],{"type":102,"value":468},"हे देवि! भोग और योग—दोनों के संतुलन से ही साधक मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है।",{"type":102,"value":470},"\n— (कुलार्णव तंत्र, २.५६)",{"type":58,"tag":86,"props":472,"children":473},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":475,"children":476},{},[477],{"type":102,"value":478},"गोरखनाथ और उनके शिष्य की एक कथा नाथ पंथ की परंपराओं में बहुत प्रचलित है। यह विशेष रूप से 'अनुभव' के माध्यम से 'वैराग्य' की प्राप्ति\nको दर्शाती है। भारतीय दर्शन में इसे 'भुक्ति से मुक्ति' का मार्ग कहा जाता है, जहाँ दमन (Suppression) के बजाय तृप्ति (Saturation) के\nमाध्यम से मन को शांत किया जाता है।",{"type":58,"tag":86,"props":480,"children":481},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":483,"children":484},{},[485],{"type":102,"value":486},"गुरु गोरखनाथ के पास एक शिष्य आया जो साधना तो करना चाहता था, परंतु उसकी तामसिक वृत्तियाँ बहुत प्रबल थीं। उसने गुरु से निवेदन किया—\n\"हे नाथ! मैं योग मार्ग पर चलना चाहता हूँ, किंतु मेरा मन मांस खाने की प्रबल इच्छा से ग्रस्त है। मैं चाहकर भी इस स्वाद को छोड़ नहीं पा रहा हूँ।\"",{"type":58,"tag":86,"props":488,"children":489},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":491,"children":492},{},[493],{"type":102,"value":494},"गुरु गोरखनाथ जानते थे कि यदि शिष्य को बलात रोका गया, तो उसका मन सदैव उसी विचार में अटका रहेगा। उन्होंने शिष्य की आंखों में झाँका\nऔर अपनी योगशक्ति से उसे एक वनराज (शेर) बना दिया। गुरु ने कहा— \"जाओ, अब तुम स्वतंत्र हो। जी भरकर अपनी इस भूख को शांत करो।\"\nवह शिष्य शेर के रूप में १२ वर्षों तक घने जंगलों में रहा। उसने अनगिनत शिकार किए, निरंतर मांस का भक्षण किया और अपनी उस वासना\nको चरम सीमा तक जी लिया।",{"type":58,"tag":86,"props":496,"children":497},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":499,"children":500},{},[501],{"type":102,"value":502},"१२ वर्ष बाद गुरु गोरखनाथ उसी वन से गुजरे। उन्होंने उस शेर को पुकारा। शेर गुरु के चरणों में आकर गिर पड़ा। उसकी आँखों में अब\nवह हिंसक चमक नहीं, अपितु एक गहरी ऊब और शांति थी। उसने कहा— \"प्रभु! मैं वितृप्त गया हूँ (पूर्णतः तृप्त और थक गया हूँ)।\nअब मांस के प्रति न तो आकर्षण बचा है, न ही उसकी गंध सुख देती है। मैंने देख लिया कि जिस रस के पीछे मैं भाग रहा था, वह\nकेवल नश्वर है। अब मुझे इस पशु देह और वासना से मुक्ति दें।\"",{"type":58,"tag":86,"props":504,"children":505},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":507,"children":508},{},[509],{"type":102,"value":510},"गोरखनाथ ने अपनी शक्ति से उसे पुनः मनुष्य रूप में बदल दिया। अब वह शिष्य पूरी तरह शुद्ध हो चुका था क्योंकि उसकी वासना अब\n\"दबी हुई\" नहीं थी, अपितु \"अनुभव होकर समाप्त\" हो चुकी थी।",{"type":58,"tag":86,"props":512,"children":513},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":515,"children":516},{},[517],{"type":102,"value":518},"यही बात अष्टावक्र गीता में स्वयं ऋषि अष्टावक्र भी करते हैं।",{"type":58,"tag":86,"props":520,"children":521},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":523,"children":525},{"className":524},[92],[526],{"type":58,"tag":95,"props":527,"children":528},{},[529],{"type":58,"tag":74,"props":530,"children":531},{},[532,534,539,541,546],{"type":102,"value":533},"यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":535,"children":536},{},[537],{"type":102,"value":538},"जहाँ यह सम्पूर्ण विश्व रज्जु पर सर्प की भाँति कल्पित प्रतीत होता है;",{"type":102,"value":540},"\nतदानन्दपदं ज्ञात्वा जीवन्मुक्तः सुखी भव॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":542,"children":543},{},[544],{"type":102,"value":545},"उस आनन्दस्वरूप पद को जानकर मनुष्य जीवन्मुक्त होकर सुखी हो जाता है।",{"type":102,"value":547},"\n— (अष्टावक्र गीता २.७)",{"type":58,"tag":86,"props":549,"children":550},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":552,"children":553},{},[554],{"type":102,"value":555},"इसी बात को ओशो भी लिखते हैं कि व्यक्ति संभोग से समाधि तक पहुँच सकता है। और शास्त्र भी इसकी पुष्टि करते हैं। हाँ परंतु अब\nहमें काम वासना और काम योग का अंतर भी स्पष्ट करना होगा॥",{"type":58,"tag":86,"props":557,"children":558},{},[],{"type":58,"tag":155,"props":560,"children":562},{"id":561},"कर्म-के-रूप",[563],{"type":102,"value":564},"कर्म के रूप",{"type":58,"tag":86,"props":566,"children":567},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":569,"children":571},{"className":570},[92],[572],{"type":58,"tag":95,"props":573,"children":574},{},[575],{"type":58,"tag":74,"props":576,"children":577},{},[578,580,585,587,592],{"type":102,"value":579},"तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।\n",{"type":58,"tag":105,"props":581,"children":582},{},[583],{"type":102,"value":584},"इसलिए आसक्ति रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म का आचरण करो।",{"type":102,"value":586},"\nअसक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":588,"children":589},{},[590],{"type":102,"value":591},"क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करने वाला पुरुष परम पद को प्राप्त होता है।",{"type":102,"value":593},"\n— (भगवद्गीता ३.१९)",{"type":58,"tag":86,"props":595,"children":596},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":598,"children":599},{},[600],{"type":102,"value":601},"जीवन की यात्रा में 'काम' और 'कर्म' दो ऐसे स्तंभ हैं जो हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं।\nसामान्यतः हम 'काम' को केवल वासना या इच्छा तक सीमित मान लेते हैं, परंतु भारतीय दर्शन में यह पुरुषार्थ का एक\nमहत्वपूर्ण अंग है। यदि इसे धर्म और संयम के साथ जोड़ा जाए तो यही योग भी है।",{"type":58,"tag":86,"props":603,"children":604},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":606,"children":607},{},[608],{"type":102,"value":609},"भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म की सूक्ष्म गति को समझाया है। हमें अपने कार्यों को केवल शारीरिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक साधना के रूप में देखना चाहिए।\nकर्म 3 प्रकार के होते हैं जिन्हे कर्म की त्रिवेणी भी कहा जाता है। ये हैं:",{"type":58,"tag":86,"props":611,"children":612},{},[],{"type":58,"tag":614,"props":615,"children":616},"ul",{},[617,628,638],{"type":58,"tag":618,"props":619,"children":620},"li",{},[621,626],{"type":58,"tag":78,"props":622,"children":623},{},[624],{"type":102,"value":625},"सकर्म:",{"type":102,"value":627}," फल की इच्छा के साथ किया गया शुभ कार्य।",{"type":58,"tag":618,"props":629,"children":630},{},[631,636],{"type":58,"tag":78,"props":632,"children":633},{},[634],{"type":102,"value":635},"विकर्म:",{"type":102,"value":637}," गलत मार्ग पर ले जाने वाले निषिद्ध कर्म।",{"type":58,"tag":618,"props":639,"children":640},{},[641,646],{"type":58,"tag":78,"props":642,"children":643},{},[644],{"type":102,"value":645},"अकर्म:",{"type":102,"value":647}," कर्म करते हुए भी फल के प्रति अनासक्त रहना (यही वास्तव में कर्मयोग है)।",{"type":58,"tag":86,"props":649,"children":650},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":652,"children":653},{},[654],{"type":102,"value":655},"उपनिषद भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि संसार में इस भाव से भोग करना चाहिए की ये मेरा नहीं है और ये किसी का ऋण है जिसे चुकाना पड़ेगा।\nकाम को संयमित रखने का अर्थ दमन नहीं, बल्कि उसका उदात्तीकरण (Sublimation) है। जब हम प्रत्येक वस्तु में ईश्वर का वास देखते हैं, तो हमारी दृष्टि बदल जाती है।",{"type":58,"tag":86,"props":657,"children":658},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":660,"children":662},{"className":661},[92],[663],{"type":58,"tag":95,"props":664,"children":665},{},[666],{"type":58,"tag":74,"props":667,"children":668},{},[669,671,676,678,683],{"type":102,"value":670},"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":672,"children":673},{},[674],{"type":102,"value":675},"इस जगत में जो कुछ भी गतिशील है—सब ईश्वर से आवृत है।",{"type":102,"value":677},"\nतेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":679,"children":680},{},[681],{"type":102,"value":682},"त्यागभाव से उसका उपभोग करो; किसी और के धन पर लोभ मत करो।",{"type":102,"value":684},"\n— (ईशोपनिषद् १)",{"type":58,"tag":86,"props":686,"children":687},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":689,"children":690},{},[691,693,698],{"type":102,"value":692},"जब हम किसी कार्य से बहुत अधिक चिपक जाते हैं, तो वह 'काम-वासना' बन जाता है, लेकिन जब हम उसे कर्तव्य\nमानकर करते हैं, तो वह 'काम-योग' बन जाता है। काम वासना और काम योग के बीच की रेखा बहुत पतली\nहै—वह रेखा है ",{"type":58,"tag":78,"props":694,"children":695},{},[696],{"type":102,"value":697},"'आसक्ति'",{"type":102,"value":699},"। विषयों का निरंतर चिंतन क्रोध और अशांति लाता है, जबकि कर्तव्य भाव से\nकिया गया कर्म शांति और मुक्ति प्रदान करता है। पुरुषार्थ का अर्थ यही है कि हम संसार में रहें, उपभोग भी\nकरें, परंतु 'त्याग' और 'अनासक्ति' के बोध के साथ। गीता भी इसकी पुष्टि करती है कि कामयोग और काम वासना में\nक्या अंतर है॥",{"type":58,"tag":86,"props":701,"children":702},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":704,"children":706},{"className":705},[92],[707],{"type":58,"tag":95,"props":708,"children":709},{},[710],{"type":58,"tag":74,"props":711,"children":712},{},[713,715,720,722,727],{"type":102,"value":714},"युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":716,"children":717},{},[718],{"type":102,"value":719},"योगयुक्त पुरुष कर्मफल का त्याग करके नैष्ठिकी शांति (मोक्ष) को प्राप्त होता है।",{"type":102,"value":721},"\nअयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":723,"children":724},{},[725],{"type":102,"value":726},"परंतु जो योगयुक्त नहीं है, वह कामना (वासना) के कारण फल में आसक्त होकर बँध जाता है।",{"type":102,"value":728},"\n— (श्रीमद्भगवद्गीता ५.१२)",{"type":58,"tag":86,"props":730,"children":731},{},[],{"type":58,"tag":155,"props":733,"children":735},{"id":734},"सत-असत-नित्य-अनित्य",[736],{"type":102,"value":737},"सत-असत (नित्य-अनित्य)",{"type":58,"tag":86,"props":739,"children":740},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":742,"children":744},{"className":743},[92],[745],{"type":58,"tag":95,"props":746,"children":747},{},[748],{"type":58,"tag":74,"props":749,"children":750},{},[751,753,758,760,765],{"type":102,"value":752},"नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।\n",{"type":58,"tag":105,"props":754,"children":755},{},[756],{"type":102,"value":757},"असत वस्तु की कोई सत्ता नहीं है, और सत का कभी अभाव नहीं होता।",{"type":102,"value":759},"\nउभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":761,"children":762},{},[763],{"type":102,"value":764},"तत्त्वदर्शियों ने इन दोनों के ही वास्तविक स्वरूप का अंत (निष्कर्ष) देख लिया है।",{"type":102,"value":766},"\n— (श्रीमद्भगवद्गीता २.१६)",{"type":58,"tag":86,"props":768,"children":769},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":771,"children":772},{},[773],{"type":102,"value":774},"अब मैं यहाँ सूत्र देता हूँ जो आपको अपनी कामना ( काम ऊर्जा ) को उचित मार्ग पर लगाने का मार्ग बताएगी।\nवैसे काम को साधने का मूल होता है अपनी इच्छाओं पर संयम रखना उसके लिए अपने मन पर संयम रखना चाहिए।\nकठोपनिषद् में भी कहा गया है शरीर एक रथ के समान है। आत्मा रथी है, बुद्धि सारथी और मन लगाम है। यह\nइंद्रिय रूपी घोड़ों को, जो निरंतर इधर-उधर भागते रहते हैं, उन्हे नियंत्रित करती है। इन्हे नियंत्रित करने के लिए मन को\nवश में करो। परंतु मैंने जो धर्म के प्रकरण में मनसा, वाचा, कर्मणा का सूत्र दिया था। वह ऋत, सत और धर्म\nमन को भी वश में करने के लिए सक्षम है। यहाँ तो मैं चाहता हूँ कि काम का दमन हो अपितु काम को उचित दिशा दी जाए।\nकाम का दमन तो सन्यास आश्रम वाले व्यक्तियों के लिए है। मैं तो पूरी पुस्तक ही ग्रहस्थों के लिए\nलिख रहा हूँ। जब सारा संसार ही काम से चलता है, हर कर्म के पीछे कोई आसक्ति है तो फिर काम\nकौन सा उचित है और कौन सा अनुचित है। ये ही हम समझ पाएँ तो जीवन में हर कार्य में अग्रिम होंगे॥",{"type":58,"tag":86,"props":776,"children":777},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":779,"children":781},{"className":780},[92],[782],{"type":58,"tag":95,"props":783,"children":784},{},[785],{"type":58,"tag":74,"props":786,"children":787},{},[788,790,795,797,802,804,809,811,816],{"type":102,"value":789},"आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।\n",{"type":58,"tag":105,"props":791,"children":792},{},[793],{"type":102,"value":794},"आत्मा को रथ का स्वामी (रथी) जानो और इस शरीर को केवल एक रथ समझो।",{"type":102,"value":796},"\nबुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":798,"children":799},{},[800],{"type":102,"value":801},"बुद्धि को सारथी (रथ चलाने वाला) जानो और मन को लगाम (लगाम\u002Fप्रग्रह) समझो।",{"type":102,"value":803},"\nइन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":805,"children":806},{},[807],{"type":102,"value":808},"इंद्रियों को रथ के घोड़े कहा गया है और विषय (रूप, रस, गंध आदि) वे मार्ग हैं जिन पर वे दौड़ते हैं।",{"type":102,"value":810},"\nआत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":812,"children":813},{},[814],{"type":102,"value":815},"शरीर, इंद्रिय और मन से युक्त उस आत्मा को ही मनीषी (विद्वान) 'भोक्ता' कहते हैं।",{"type":102,"value":817},"\n— (कठोपनिषद् १.३.३ - १.३.४)",{"type":58,"tag":86,"props":819,"children":820},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":822,"children":823},{},[824],{"type":102,"value":825},"पहले ये कथा समझते हैं। प्राचीन काल में एक अत्यंत तेजस्वी ऋषि घोर तपस्या में लीन थे।\nउनकी साधना इतनी दीर्घ और स्थिर थी कि समय के प्रवाह के साथ उनके शरीर पर दीमकों\nने अपना घर बना लिया और वे पूर्णतः एक वल्मीक (बाँबी) के भीतर समा गए। युग बीत गए,\nकिंतु ऋषि का ध्यान भंग न हुआ।",{"type":58,"tag":86,"props":827,"children":828},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":830,"children":831},{},[832],{"type":102,"value":833},"एक समय उस वन में अपनी सहेलियों के साथ एक परम सुंदरी राजकुमारी का आगमन हुआ।\nकौतूहलवश राजकुमारी ने उस बाँबी में चमकते हुए दो बिंदुओं को देखा और उन्हें कोई रत्न समझकर\nएक तिनके से कुरेद दिया। वह ऋषि की आँखें थीं। ऋषि की समाधि भंग हुई और वे क्रोध के स्थान\nपर राजकुमारी के लावण्य को देखकर विचलित हो गए। युगों की तपस्या के पश्चात भी मन में सुप्त\nवासना जाग उठी और उन्होंने राजकुमारी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। राजकुमारी विदुषी और\nविवेकशील थी। उसने ऋषि के पतन को भांप लिया और विनम्रतापूर्वक कहा,\n\"हे ऋषिवर! मैं आपकी अर्धांगिनी अवश्य बनूँगी, किंतु आप एक माह पश्चात राजमहल पधारें।\"",{"type":58,"tag":86,"props":835,"children":836},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":838,"children":839},{},[840],{"type":102,"value":841},"एक मास की अवधि बीतने पर ऋषि काम-मोहित होकर राजमहल पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अत्यंत वृद्ध, अशक्त और कुरूप स्त्री को देखा।\nऋषि ने चकित होकर उससे राजकुमारी का पता पूछा। वह स्त्री बोली, \"मैं ही वह राजकुमारी हूँ।\nयदि आप अभी भी मुझसे विवाह करना चाहते हैं, तो पहले इस कक्ष में मेरे साथ चलें।\"",{"type":58,"tag":86,"props":843,"children":844},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":846,"children":847},{},[848],{"type":102,"value":849},"वह उन्हें एक एकांत कक्ष में ले गई जहाँ से तीव्र दुर्गंध आ रही थी। वहाँ अनेक पात्रों में राजकुमारी के\nशरीर का मल, मूत्र, थूक, रक्त, पित्त और अन्य विजातीय तत्व रखे हुए थे। राजकुमारी ने गंभीर स्वर में कहा:\n\"हे महात्मन! जिस सौंदर्य पर आप मोहित होकर अपनी युगों की तपस्या को विस्मृत कर बैठे, वह इन्हीं\nअपवित्र वस्तुओं का एक सम्मिश्रण मात्र था। मैंने एक माह तक औषधि लेकर इन तत्वों को अपने शरीर से\nबाहर निकाला है। अब आप स्वयं ही विचार करें कि इस अस्थि-माँस के पुतले में ऐसा क्या था जो आपको\nअपनी साधना से श्रेष्ठ प्रतीत हुआ?\"",{"type":58,"tag":86,"props":851,"children":852},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":854,"children":855},{},[856],{"type":102,"value":857},"ऋषि को तत्काल बोध हो गया। उनके ज्ञान-चक्षु खुल गए और मोह का आवरण छिन्न-भिन्न हो गया। उन्होंने\nउस विदुषी कन्या को नमन किया, जो अब साक्षात ज्ञान स्वरूपा देवी सरस्वती के रूप में उनके समक्ष प्रकाशित हो रही थीं।\nराजकुमारी का उद्देश्य शरीर से घृणा करना नहीं, बल्कि शरीर की नश्वरता को समझाकर ऋषि को उस 'सत' की ओर\nले जाना था जो इस देह का आधार है।",{"type":58,"tag":86,"props":859,"children":860},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":862,"children":863},{},[864],{"type":102,"value":865},"यह कथा काम के परे जाने का मार्ग बताती है। काम के ऊपर भी एक सत है, किसी के लिए वह ब्रह्म है\nकिसी के लिए प्रकृति, किसी के लिए जीव, किसी के लिए आत्मा, किसी के लिए सत्य और किसी\nके लिए ईश्वर, किसी के लिए कुछ और। आपके लिए ये श्री, शक्ति या सरस्वती कुछ भी हो सकती है।\nआपको अपने काम को उचित दिशा देकर सत में लगाना होगा। काम ऊर्जा वास्तव में एक तटस्थ शक्ति है,\nजैसे अग्नि—जो भोजन भी पका सकती है और घर भी जला सकती है। जब हमारी यह ऊर्जा 'असत' (नश्वर वस्तुओं या देह)\nपर केंद्रित होती है, तो वह 'आसक्ति' बन जाती है, जो अंततः केवल रिक्तता और दुःख देती है क्योंकि वह\nआधार स्वयं अस्थिर है। परंतु, जब इसी ऊर्जा का प्रवाह 'सत' (शाश्वत सत्य, सृजन या लोक-कल्याण) की\nओर मोड़ दिया जाता है, तो वही कामना 'साधना' का रूप ले लेती है। सरल शब्दों में, जब तक इच्छा\n'पाने' (To possess) के लिए है, वह असत है; जब वही इच्छा 'होने' (To be) या 'सृजन करने'\nके लिए जागृत होती है, तो वह सत की ओर पहला कदम है।",{"type":58,"tag":86,"props":867,"children":868},{},[],{"type":58,"tag":870,"props":871,"children":872},"ol",{},[873,883],{"type":58,"tag":618,"props":874,"children":875},{},[876,881],{"type":58,"tag":78,"props":877,"children":878},{},[879],{"type":102,"value":880},"सत:",{"type":102,"value":882}," वह जो सदा से था है और रहेगा। वह जो आदि और अनंत है।",{"type":58,"tag":618,"props":884,"children":885},{},[886,891],{"type":58,"tag":78,"props":887,"children":888},{},[889],{"type":102,"value":890},"असत:",{"type":102,"value":892}," वह जो क्षणिक है, वह जो क्षणभंगुर है, आज है परंतु कल नहीं रहेगा।",{"type":58,"tag":86,"props":894,"children":895},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":897,"children":898},{},[899],{"type":102,"value":900},"जब भी किसी वस्तु की और तीव्र कामना उत्पन्न हो तो पहले ये प्रश्न देखें की क्या वह क्षणिक है या\nशाश्वत। क्या वह सत है अथवा असत। फिर हमेशा सत को ही चुनें। उदाहरण के लिए आजकल के\nयुग में हर वस्तु निरंतर बदलती रहती है। आपको अपना ध्रुव ढूँढना होगा।\nजैसे नाविक अस्थिर लहरों (असत) के बीच स्थिर ध्रुव तारे (सत) को देखकर दिशा तय करता है, वैसे\nही आप अपने जीवन की हर स्थिति में यह पूछें कि आपके सारे विकल्पों में से अधिक शाश्वत कौन सा है,\nऔर यदि एक ही विकल्प हो तो उसमें वह क्या है जो 'शाश्वत' है?",{"type":58,"tag":86,"props":902,"children":903},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":905,"children":906},{},[907],{"type":102,"value":908},"उदाहरण के लिए, आज के युग में तकनीक निरंतर बदलती रहती है। इस निरंतरता में व्यक्ति सदा दुविधा में रहता है कि क्या करना चाहिए।\nहर 5 वर्ष में तो करियर ही मार्केट से गायब हो जाता है। मैं कभी एम॰आई॰एस॰ का काम किया करता था। आज सिर्फ ऍनालिस्ट हैं।\nएम॰आई॰एस॰ नाम का करियर ही खत्म हो गया। ऐसे हर 5 साल बाद यदि इसी प्रकार सब बदलता रहा तो अपना ध्रुव ढूँढना और\nभी अधिक आवश्यक है। जैसे-",{"type":58,"tag":870,"props":910,"children":911},{},[912,917,922,927],{"type":58,"tag":618,"props":913,"children":914},{},[915],{"type":102,"value":916},"पायथन, जावा या सी जैसी भाषाएँ सीखना 'असत' ज्ञान के समान है—वे आज हैं, कल बदल जाएँगी। परंतु 'लॉजिक' (तर्क), 'एल्गोरिदम' के\nआधारभूत सिद्धांत और 'सांख्यिकी' (Statistics) का ज्ञान 'सत' है। भाषाएँ बदलेंगी, पर तर्क के सिद्धांत शाश्वत रहेंगे।",{"type":58,"tag":618,"props":918,"children":919},{},[920],{"type":102,"value":921},"शारीरिक सुडौलता, त्वचा की चमक, यौवन और मांसपेशियाँ। ये काल के साथ ढलने के लिए ही बनी हैं।\nशरीर के भीतर का 'प्राण', इंद्रियों पर संयम और वे 'संस्कार' जो वृद्धावस्था में भी आपके व्यक्तित्व को\nओजस्वी बनाए रखते हैं, सत हैं। माँस-पेशियाँ असत हैं, परंतु 'अनुशासन' सत है।",{"type":58,"tag":618,"props":923,"children":924},{},[925],{"type":102,"value":926},"बैंक बैलेंस, मुद्रा के नोट, स्वर्ण आभूषण या अचल संपत्ति। ये बाह्य तत्व हैं जो किसी भी प्राकृतिक या\nआर्थिक संकट में आपसे छिन सकते हैं। आपकी 'वित्तीय सूझ-बूझ' (Financial Wisdom), उदारता का भाव\nऔर वह 'कौशल' जिसके बल पर आप शून्य से पुनः साम्राज्य खड़ा कर सकें, सत है। धन की राशि असत है,\nपरंतु उसे अर्जित करने का 'कौशल' सत है, आपकी 'पात्रता' सत है।",{"type":58,"tag":618,"props":928,"children":929},{},[930],{"type":102,"value":931},"पदवी (Designation), पुरस्कार, सोशल मीडिया पर अनुयायियों की संख्या या लोगों द्वारा की गई प्रशंसा।\nयह सब समय की धूल के साथ धुंधला पड़ जाता है। आपके कार्य की 'निपुणता' (Mastery), आपके बंधु-बांधव,\nआपकी शिक्षा और आपकी 'नैतिकता', सत है । तालियाँ असत हैं, परंतु आपने जो मित्र बनाए, बंधु-बांधव बनाए, वह सत है।",{"type":58,"tag":86,"props":933,"children":934},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":936,"children":937},{},[938],{"type":102,"value":939},"ऐसी ही कुछ गीत अमर हो जाते हैं, कुछ काव्य अमर हो जाते हैं, कुछ नृत्य, कुछ परिधान,\nकुछ वेष-भूषाएँ, कुछ पकवान, कुछ कलाकृतियाँ अमर हो जाती हैं। हर मार्ग पर एक\nकुमार्ग (शॉर्टकट - अल्पकालिक प्रलोभन) होता है और एक कठिनाई वाला पूर्ण मार्ग।\nहमेशा पूर्ण मार्ग को चुने जीवन में रसानंद लेने का भी एक उचित मार्ग है।",{"type":58,"tag":86,"props":941,"children":942},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":944,"children":945},{},[946],{"type":102,"value":947},"इस लिए सदा ये प्रश्न पूछते रहें कि क्या ये सत है या असत। ये हर सांसारिक वस्तु पे काम करेगा। और\nये सूत्र आपको मोह में पड़ने से भी बचाएगा और आपकी काम ऊर्जा को उचित दिशा देकर\nआपको सफलता के सोपान पर भी चढ़ा देगा। इसलिए, जब भी मन विचलित हो,\nस्वयं से पूछें कि क्या मैं किसी ऐसी चीज़ के पीछे भाग रहा हूँ जो कल नहीं रहेगी?\nसत को चुनना ही बुद्धिमानी है, क्योंकि जो टिकता नहीं, वह सुख भी स्थायी नहीं दे सकता।\nआज आपके पास जो कुछ भी है—आपका पद, आपका ज्ञान या आपकी संपत्ति—उसमें से वह\nक्या है जो आपके चले जाने के बाद भी 'सत' रूप में जीवित रहेगा?\"",{"type":58,"tag":86,"props":949,"children":950},{},[],{"type":58,"tag":155,"props":952,"children":954},{"id":953},"उपसंहार",[955],{"type":102,"value":953},{"type":58,"tag":86,"props":957,"children":958},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":960,"children":961},{},[962],{"type":102,"value":963},"आध्यात्मिक रूप से 'काम' कोई बाधा नहीं, बल्कि वह प्राथमिक ऊर्जा (Primary Energy) है जो जीवन को गति देती है।\nअध्यात्म का लक्ष्य इस ऊर्जा का दमन करना नहीं, बल्कि इसका उदात्तीकरण (Sublimation) करना है।\nजब यह ऊर्जा केवल देह और इंद्रियों तक सीमित रहती है, तो 'वासना' कहलाती है, लेकिन जब यही\nऊर्जा सृजन, सेवा और आत्म-खोज की ओर मुड़ती है, तो 'योग' बन जाती है। विवाह, संतानोत्पत्ति और\nऋण-मुक्ति (पितृ ऋण) के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि समाज की निरंतरता के लिए 'काम' का धर्मसम्मत\nपालन अनिवार्य है। ६४ कलाओं और पुरुषार्थों का समावेश यह दिखाता है कि एक स्वस्थ समाज वही है जहाँ\nसौंदर्य और आनंद का तिरस्कार नहीं, बल्कि उन्हें 'धर्म' के अनुशासन में रखकर जीवन को उत्सव बनाया जाता है।",{"type":58,"tag":86,"props":965,"children":966},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":968,"children":969},{},[970,975,977,982,984,989],{"type":58,"tag":78,"props":971,"children":972},{},[973],{"type":102,"value":974},"सत और असत",{"type":102,"value":976}," का मूल सूत्र समझना अतिआवश्यक है। काम ऊर्जा को दिशा देना ही उचित मार्ग है।\nयह हम ",{"type":58,"tag":78,"props":978,"children":979},{},[980],{"type":102,"value":981},"'विवेक' (Discernment)",{"type":102,"value":983}," से कर सकते हैं। संसार 'असत' (परिवर्तनशील) है, और\nइसमें दुःख का मूल कारण असत को 'सत' मान लेना है। यह सूत्र हमें सिखाता है कि लहरों\n(बदलती तकनीक, पद, संपत्ति) के बीच ध्रुव तारे (सिद्धांत, नैतिकता, आत्मा) को कैसे पहचानें।\n",{"type":58,"tag":78,"props":985,"children":986},{},[987],{"type":102,"value":988},"'सत' और 'असत'",{"type":102,"value":990}," का बोध ही वह मापदंड है, जो मनुष्य को मोह के अंधकूप से निकालकर\nसत्य के प्रकाश में खड़ा करता है।",{"type":58,"tag":86,"props":992,"children":993},{},[],{"type":58,"tag":995,"props":996,"children":998},"swar-lipi",{":is-notation":997},"false",[999],{"type":58,"tag":1000,"props":1001,"children":1002},"table",{},[1003,1033],{"type":58,"tag":1004,"props":1005,"children":1006},"thead",{},[1007],{"type":58,"tag":1008,"props":1009,"children":1010},"tr",{},[1011,1018,1023,1028],{"type":58,"tag":1012,"props":1013,"children":1015},"th",{"align":1014},"left",[1016],{"type":102,"value":1017},"श्रेणी",{"type":58,"tag":1012,"props":1019,"children":1020},{"align":1014},[1021],{"type":102,"value":1022},"प्रकार",{"type":58,"tag":1012,"props":1024,"children":1025},{"align":1014},[1026],{"type":102,"value":1027},"परिभाषा",{"type":58,"tag":1012,"props":1029,"children":1030},{"align":1014},[1031],{"type":102,"value":1032},"प्रकृति \u002F परिणाम",{"type":58,"tag":1034,"props":1035,"children":1036},"tbody",{},[1037,1053,1082,1106,1130,1159],{"type":58,"tag":1008,"props":1038,"children":1039},{},[1040,1044,1047,1050],{"type":58,"tag":1041,"props":1042,"children":1043},"td",{"align":1014},[],{"type":58,"tag":1041,"props":1045,"children":1046},{"align":1014},[],{"type":58,"tag":1041,"props":1048,"children":1049},{"align":1014},[],{"type":58,"tag":1041,"props":1051,"children":1052},{"align":1014},[],{"type":58,"tag":1008,"props":1054,"children":1055},{},[1056,1064,1072,1077],{"type":58,"tag":1041,"props":1057,"children":1058},{"align":1014},[1059],{"type":58,"tag":78,"props":1060,"children":1061},{},[1062],{"type":102,"value":1063},"कर्म (Actions)",{"type":58,"tag":1041,"props":1065,"children":1066},{"align":1014},[1067],{"type":58,"tag":78,"props":1068,"children":1069},{},[1070],{"type":102,"value":1071},"सकर्म",{"type":58,"tag":1041,"props":1073,"children":1074},{"align":1014},[1075],{"type":102,"value":1076},"फल की इच्छा और आसक्ति के साथ किया गया शुभ कार्य।",{"type":58,"tag":1041,"props":1078,"children":1079},{"align":1014},[1080],{"type":102,"value":1081},"बंधनकारी (संसार चक्र में बांधता है)।",{"type":58,"tag":1008,"props":1083,"children":1084},{},[1085,1088,1096,1101],{"type":58,"tag":1041,"props":1086,"children":1087},{"align":1014},[],{"type":58,"tag":1041,"props":1089,"children":1090},{"align":1014},[1091],{"type":58,"tag":78,"props":1092,"children":1093},{},[1094],{"type":102,"value":1095},"अकर्म",{"type":58,"tag":1041,"props":1097,"children":1098},{"align":1014},[1099],{"type":102,"value":1100},"कर्तव्य भाव से, फल की इच्छा के बिना किया गया कर्म।",{"type":58,"tag":1041,"props":1102,"children":1103},{"align":1014},[1104],{"type":102,"value":1105},"मुक्तिदाता (कर्मयोग, चित्त शुद्धि)।",{"type":58,"tag":1008,"props":1107,"children":1108},{},[1109,1112,1120,1125],{"type":58,"tag":1041,"props":1110,"children":1111},{"align":1014},[],{"type":58,"tag":1041,"props":1113,"children":1114},{"align":1014},[1115],{"type":58,"tag":78,"props":1116,"children":1117},{},[1118],{"type":102,"value":1119},"विकर्म",{"type":58,"tag":1041,"props":1121,"children":1122},{"align":1014},[1123],{"type":102,"value":1124},"शास्त्र-विरुद्ध या अनैतिक मार्ग पर ले जाने वाले कार्य।",{"type":58,"tag":1041,"props":1126,"children":1127},{"align":1014},[1128],{"type":102,"value":1129},"पतनकारी (दुःख और अशांति का कारण)।",{"type":58,"tag":1008,"props":1131,"children":1132},{},[1133,1141,1149,1154],{"type":58,"tag":1041,"props":1134,"children":1135},{"align":1014},[1136],{"type":58,"tag":78,"props":1137,"children":1138},{},[1139],{"type":102,"value":1140},"अस्तित्व 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जाएँगे॥",{"title":47,"searchDepth":1192,"depth":1192,"links":1193},2,[1194,1195,1196,1197,1198,1199],{"id":157,"depth":1192,"text":160},{"id":343,"depth":1192,"text":343},{"id":439,"depth":1192,"text":439},{"id":561,"depth":1192,"text":564},{"id":734,"depth":1192,"text":737},{"id":953,"depth":1192,"text":953},"markdown","content:shiksha:vedicJeevan:7.atmajnaan_06_purushartha_kaam.md","content","shiksha\u002FvedicJeevan\u002F7.atmajnaan_06_purushartha_kaam.md","shiksha\u002FvedicJeevan\u002F7.atmajnaan_06_purushartha_kaam","md",1776411259754]