[{"data":1,"prerenderedAt":1093},["ShallowReactive",2],{"content-\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_05_purushartha_arth":3,"content-query-dz7vMPa6w6":44},[4,12,17,21,25,29,33,37,41],{"_path":5,"title":6,"description":7,"part":8,"image":9,"prev_path":10,"next_path":11},"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fintro_01_intro","॥ परिचय ॥","यहाँ हम वैदिक दृष्टि से जीवन को समझने का प्रयास करेंगे। हम यहाँ कई सूत्रों को जोड़कर जीवन में सफल होने के उपाय ढूँढेंगे॥\n","॥ प्रस्तावना ॥","\u002Fimages\u002Fshiksha\u002Fjeevan_darshan.jpeg",null,"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_01_tripakshiyavivek",{"_path":11,"title":13,"description":14,"part":15,"image":9,"prev_path":5,"next_path":16},"॥ तृतीय मार्ग ॥","ज्ञान की परिक्षा का तीसरा मार्ग। बिना जिसके ज्ञान को प्रमाणित करना कठिन है॥\n","॥ आत्मज्ञान ॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_02_varnn",{"_path":16,"title":18,"description":19,"part":15,"image":9,"prev_path":11,"next_path":20},"॥ चतुर्वण ॥","चतुर्वर्ण की तार्किक समीक्षा: अष्टलक्ष्मी, अष्टसरस्वती और एकादश शक्ति के माध्यम से समझिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का वास्तविक स्वरूप। प्राचीन दर्शन का आधुनिक विश्लेषण॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_03_ashram",{"_path":20,"title":22,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":16,"next_path":24},"॥ आश्रम ॥","वर्णाश्रम की तार्किक समीक्षा और महत्व॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_04_purushartha_dharm",{"_path":24,"title":26,"description":27,"part":15,"image":9,"prev_path":20,"next_path":28},"॥ पुरुषार्थ (धर्म)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से धर्म की व्याख्या और धर्म परायण होने के लिए एक सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_05_purushartha_arth",{"_path":28,"title":30,"description":31,"part":15,"image":9,"prev_path":24,"next_path":32},"॥ पुरुषार्थ (अर्थ) ॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से अर्थ की व्याख्या और अर्थार्जन के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_06_purushartha_kaam",{"_path":32,"title":34,"description":35,"part":15,"image":9,"prev_path":28,"next_path":36},"॥ पुरुषार्थ (काम)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से काम का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_07_purushartha_moksha",{"_path":36,"title":38,"description":39,"part":15,"image":9,"prev_path":32,"next_path":40},"॥ पुरुषार्थ (मोक्ष)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से मोक्ष का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र।\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_08_purushartha_nishkarsha",{"_path":40,"title":42,"description":43,"part":15,"image":9,"prev_path":36,"next_path":10},"॥ पुरुषार्थ (निष्कर्ष) ॥","पुरुषार्थ का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n",{"_path":28,"_dir":45,"_draft":46,"_partial":46,"_locale":47,"title":30,"description":31,"navigation":48,"part":15,"author":49,"image":9,"tag":50,"body":54,"_type":1087,"_id":1088,"_source":1089,"_file":1090,"_stem":1091,"_extension":1092},"vedicjeevan",false,"",true,"Vikram Singh Rawat",[51,52,53],"literature","book","jeevandarshan",{"type":55,"children":56,"toc":1081},"root",[57,67,85,89,165,168,172,175,182,185,192,195,214,217,227,230,235,238,243,246,272,275,280,285,288,294,297,302,305,331,334,339,342,447,450,556,559,602,605,610,615,630,633,645,648,653,656,662,665,705,708,723,726,731,734,774,777,782,785,790,793,798,801,806,809,1005,1008,1041,1044,1047,1073,1076],{"type":58,"tag":59,"props":60,"children":61},"element","h1",{"id":47},[62],{"type":58,"tag":63,"props":64,"children":66},"binding",{"value":65},"$doc.title",[],{"type":58,"tag":68,"props":69,"children":72},"div",{"className":70},[71],"sub_heading",[73],{"type":58,"tag":74,"props":75,"children":76},"p",{},[77],{"type":58,"tag":78,"props":79,"children":80},"strong",{},[81],{"type":58,"tag":63,"props":82,"children":84},{"value":83},"$doc.description",[],{"type":58,"tag":86,"props":87,"children":88},"br",{},[],{"type":58,"tag":68,"props":90,"children":93},{"className":91},[92],"shloka",[94],{"type":58,"tag":95,"props":96,"children":97},"blockquote",{},[98],{"type":58,"tag":74,"props":99,"children":100},{},[101,104,110,112,117,119,124,126,131,133,138,139,144,146,151,153,158,159,163],{"type":102,"value":103},"text","नानाश्रान्ताय श्रीरस्ति इति रोहित शुश्रुम।\n",{"type":58,"tag":105,"props":106,"children":107},"em",{},[108],{"type":102,"value":109},"हे रोहित! हमने सुना है कि जो बिना थके श्रम करता है, श्री (लक्ष्मी) उसी को प्राप्त होती है।",{"type":102,"value":111},"\nपापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":113,"children":114},{},[115],{"type":102,"value":116},"आलस्य में बैठा व्यक्ति पाप के समान है; इंद्र भी उसी का मित्र बनता है जो निरंतर गतिशील रहता है॥",{"type":102,"value":118},"\nचरैवेति, चरैवेति॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":120,"children":121},{},[122],{"type":102,"value":123},"चलते रहो, चलते रहो॥",{"type":102,"value":125},"\nआस्ते भग आसीनस्य ऊर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः।\n",{"type":58,"tag":105,"props":127,"children":128},{},[129],{"type":102,"value":130},"जो बैठा रहता है, उसका भाग्य भी बैठ जाता है; जो खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा (जाग्रत) हो जाता है।",{"type":102,"value":132},"\nशेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगः॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":134,"children":135},{},[136],{"type":102,"value":137},"जो सो जाता है, उसका भाग्य भी सो जाता है; किन्तु जो निरंतर चलता (प्रयत्न करता) रहता है, उसका भाग्य भी चलने लगता है॥",{"type":102,"value":118},{"type":58,"tag":105,"props":140,"children":141},{},[142],{"type":102,"value":143},"इसलिए, चलते रहो, चलते रहो (निरंतर आगे बढ़ते रहो)॥",{"type":102,"value":145},"\nचरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":147,"children":148},{},[149],{"type":102,"value":150},"चलने वाला ही (श्रम रूपी) शहद प्राप्त करता है और चलने वाला ही श्रेष्ठ स्वादिष्ट फल पाता है।",{"type":102,"value":152},"\nसूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरन्॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":154,"children":155},{},[156],{"type":102,"value":157},"सूर्य की तपस्या और श्रेष्ठता को देखो, जो कभी प्रमाद (आलस्य) नहीं करता और निरंतर चलता रहता है॥",{"type":102,"value":118},{"type":58,"tag":105,"props":160,"children":161},{},[162],{"type":102,"value":123},{"type":102,"value":164},"\n— ऐतरेय ब्राह्मण (33.3)",{"type":58,"tag":86,"props":166,"children":167},{},[],{"type":58,"tag":169,"props":170,"children":171},"hr",{},[],{"type":58,"tag":86,"props":173,"children":174},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":176,"children":177},{},[178],{"type":58,"tag":179,"props":180,"children":181},"img",{"alt":30,"src":9},[],{"type":58,"tag":86,"props":183,"children":184},{},[],{"type":58,"tag":186,"props":187,"children":189},"h2",{"id":188},"अर्थ-संसाधन-धन-जीविका",[190],{"type":102,"value":191},"अर्थ (संसाधन, धन, जीविका)",{"type":58,"tag":86,"props":193,"children":194},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":196,"children":198},{"className":197},[92],[199],{"type":58,"tag":95,"props":200,"children":201},{},[202],{"type":58,"tag":74,"props":203,"children":204},{},[205,207,212],{"type":102,"value":206},"अर्थः नाम धान्य‑धन‑पशु‑भूमि‑मित्रादीनाम् उपार्जन‑रक्षण‑वृद्धिः॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":208,"children":209},{},[210],{"type":102,"value":211},"धान्य (अनाज), धन, पशु, भूमि और मित्रों का अर्जन करना, उनका रक्षण करना और उनमें वृद्धि करना ही 'अर्थ' है।",{"type":102,"value":213},"\n— कामसूत्र (१.२.९)",{"type":58,"tag":86,"props":215,"children":216},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":218,"children":219},{},[220,222],{"type":102,"value":221},"अर्थ का सामान्य अर्थ धन या संपत्ति है, किंतु शास्त्रीय दृष्टि में यह जीवन की सभी भौतिक आवश्यकताओं — अन्न, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास,\nव्यापार, राज्य व्यवस्था — की पूर्ति से संबंधित है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अर्थ को \"मनुष्यों की जीविका\" कहा गया है। भौतिक आवश्यकताओं\nकी पूर्ति के बिना कोई भी समाज या व्यक्ति स्थायित्व, सुरक्षा और विकास नहीं पा सकता।\n",{"type":58,"tag":78,"props":223,"children":224},{},[225],{"type":102,"value":226},"विद्या, भूमि, स्वर्ण, पशु, धान्य, पात्र, उपकरण और मित्रों का अर्जन करना तथा जो अर्जित है उसे बढ़ाना ही 'अर्थ' है॥",{"type":58,"tag":86,"props":228,"children":229},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":231,"children":232},{},[233],{"type":102,"value":234},"ये ऐत्रेय ब्राह्मण के श्लोक हैं, जो अर्थार्जन के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है। इसका अर्थ है \"चलते रहो, चलते रहो\"। यह हमें निरंतर प्रयास करने और हार न मानने की प्रेरणा देता है।\nअर्थार्जन में विघ्न और बाधाएँ आएंगी, लेकिन हमें निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। यह सूत्र हमें यह भी सिखाता है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता, अपितु यह एक सतत प्रक्रिया है।\nअर्थसिद्धि के लिए भाग्य और पुरुषार्थ का संतुलन अनिवार्य है। आइए देखते हैं कि हमारे नीति-शास्त्र इस विषय में क्या मार्गदर्शन करते हैं॥",{"type":58,"tag":86,"props":236,"children":237},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":239,"children":240},{},[241],{"type":102,"value":242},"कछुए और खरगोश की दौड़ नामक कथा भी हमें यही सिखाती है कि निरंतरता और धैर्य से ही सफलता मिलती हैं। चाणक्य नीति में भी इसे इस श्लोक के माध्यम से समझाया गया है॥",{"type":58,"tag":86,"props":244,"children":245},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":247,"children":249},{"className":248},[92],[250],{"type":58,"tag":95,"props":251,"children":252},{},[253],{"type":58,"tag":74,"props":254,"children":255},{},[256,258,263,265,270],{"type":102,"value":257},"जलविन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।\n",{"type":58,"tag":105,"props":259,"children":260},{},[261],{"type":102,"value":262},"जैसे पानी की एक-एक बूंद गिरने से धीरे-धीरे घड़ा भर जाता है।",{"type":102,"value":264},"\nस हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":266,"children":267},{},[268],{"type":102,"value":269},"यही नियम सभी विद्याओं, धर्म और धन के संचय पर भी लागू होता है (अर्थात निरंतर प्रयास से ही ये तीनों सिद्ध होते हैं)॥",{"type":102,"value":271},"\n— चाणक्य नीति (तथा हितोपदेश)",{"type":58,"tag":86,"props":273,"children":274},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":276,"children":277},{},[278],{"type":102,"value":279},"मेरी माँ मुझे बचपन में सिखाती थी कि काम करते समय हमेशा बड़े व्यक्ति (धनी, सफल) को देखो की वो कैसे काम करता है, क्यूँ उसे उसी समय में अधिक धन अर्जित करने को मिलता है।\nऔर व्यय करते समय ये देखो की छोटे व्यक्ति (गरीब, असफल) को कैसे खर्च करने को मिलता है। ये दोनो यदि तुम निरंतर करोगे तो तुम्हे पैसा बचाने में सफलता मिलेगी। वो बचा हुआ\nपैसा ही असली धन है। इससे तुम्हे अर्थार्जन के लिए प्रेरणा मिलेगी की मुझसे भी ऊपर और भी कई लोग हैं जो अधिक सफल हैं या अधिक धन, बल, बुद्धि, बंधु अथवा मन के स्वामी हैं।\nऔर व्यय करते समय एक संतोष मिलेगा की मैं किसी से तो अच्छा ही खा लगा रहा हूँ। इस प्रकार तुम जी तोड़ कर्म भी करोगे और फल पर भी आसक्त नहीं रहोगे। ये बात शास्त्रिय नहीं है,\nइसका कोई श्लोक अथवा प्रमाण नहीं है, परंतु मेरे लिए ये गीता का सार है। क्यूँकि स्वयं मेरी माँ ने बारम्बार मुझे ये बात सिखाई॥",{"type":58,"tag":74,"props":281,"children":282},{},[283],{"type":102,"value":284},"अर्थार्जन में परिश्रम और भाग्य दोनो का मेल तो है परंतु भाग्य का अधिक भाग है। तो जब आपके पास अर्थ हो तो उसे व्यर्थ ना करें, बूँद-बूँद जोड़ते रहें और जीवन में जब\nभी आपका बुरा समय आएगा जो कि आएगा ही आएगा तो उस समय ये जुड़ा हुआ अर्थ आपको बचाएगा। और ये एक सतत प्रक्रिया कि भाँति बार-बार बार-बार करते रहना हैं।\nवो जुड़ा हुई आय ही धन बनेगी और वो जुड़ा हुआ धन ही सम्पत्ति बनेगा॥",{"type":58,"tag":86,"props":286,"children":287},{},[],{"type":58,"tag":186,"props":289,"children":291},{"id":290},"अर्थार्जन-के-सूत्र",[292],{"type":102,"value":293},"अर्थार्जन के सूत्र",{"type":58,"tag":86,"props":295,"children":296},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":298,"children":299},{},[300],{"type":102,"value":301},"अर्थार्जन के लिए एक प्रमुख सूत्र मैं यहां लिख रहा हूँ, जो शास्त्रों में दिया गया है। अच्छा ऐसे कई कई सूत्र हैं, परंतु मैं वो सूत्र दे रहा हूँ जो मुझे सबसे सार्थक लगा। अधिकता\nकेवल भ्रम पैदा करती है। जीवन में किसी एक वाक्य को आत्मसात करने में ही जीवन निकल जाता है। मेरा सूत्र भी सुनने में सरल किंतु प्रयोग में कठिन लगेगा॥",{"type":58,"tag":86,"props":303,"children":304},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":306,"children":308},{"className":307},[92],[309],{"type":58,"tag":95,"props":310,"children":311},{},[312],{"type":58,"tag":74,"props":313,"children":314},{},[315,317,322,324,329],{"type":102,"value":316},"अन्यच्छ्रेयो अन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः।\n",{"type":58,"tag":105,"props":318,"children":319},{},[320],{"type":102,"value":321},"श्रेय (परम कल्याण) और प्रेय (सांसारिक सुख) दोनों अलग-अलग हैं। ये दोनों भिन्न प्रयोजनों वाले होकर मनुष्य को अपनी ओर खींचते हैं।",{"type":102,"value":323},"\nतयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":325,"children":326},{},[327],{"type":102,"value":328},"इन दोनों में से जो श्रेय मार्ग को चुनता है, उसका कल्याण होता है; किन्तु जो केवल प्रिय (प्रेय) को चुनता है, वह जीवन के वास्तविक लक्ष्य से चूक जाता है॥",{"type":102,"value":330},"\n— कठोपनिषद् (1.2.1)",{"type":58,"tag":86,"props":332,"children":333},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":335,"children":336},{},[337],{"type":102,"value":338},"संसार में कोई भी कार्य हो उसके न्यूनतम दो उद्देश्य होते हैं — एक तो वह कार्य जो हमें वास्तविक कल्याण (श्रेय) की ओर ले जाता है, और दूसरा वह जो केवल सांसारिक सुख (प्रेय) प्रदान करता है।\nआपको किसी भी प्रकार की कार्य सिद्धि करनी हो। आईएएस बनना हो, व्यवसाय करना हो, कलाकार, खिलाड़ी या कुछ और भी तो भी आप हर कार्य में एक क्षण बैठ कर ये सोचें की क्या आप\nजो कार्य कर रहे हैं वह श्रेय है या प्रेय। आप उसे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह आपको अपने उद्देश्य की ओर ले जाएगा या आप इंद्रिय सुख के लिए मात्र कर रहे हैं। उदाहरण के लिए यदि\nआप प्रातःकाल उठकर व्यायाम, ध्यान, स्वाध्याय करते हैं तो वह श्रेय है यदि आप फोन चलाने लगते हैं या टीवी देखने लगते हैं तो वह प्रेय है। प्रेय की भी अपनी जगह है, परंतु हम\nअधिक प्रेय वस्तुओं में लिप्त नहीं हो सकते हैं यदि हम कोई उद्देश्यपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं॥",{"type":58,"tag":86,"props":340,"children":341},{},[],{"type":58,"tag":343,"props":344,"children":345},"ol",{},[346],{"type":58,"tag":347,"props":348,"children":349},"li",{},[350,355,357,383],{"type":58,"tag":78,"props":351,"children":352},{},[353],{"type":102,"value":354},"श्रेय (परम कल्याण):",{"type":102,"value":356}," वह कार्य जो हमें वास्तविक कल्याण, स्थायित्व, और आत्म-संतुष्टि की ओर ले जाता है। यह दीर्घकालिक और स्थायी सुख प्रदान करता है।\nउदाहरण के लिए, शिक्षा, स्वास्थ्य, नैतिक व्यवसाय, और समाज सेवा श्रेय के कार्य हैं। श्रेय केवल कार्य नहीं अपितु गुण भी होते हैं। शास्त्रसम्मत 6 गुण जो व्यक्ति को\nअर्थार्जन में सफल बनाते हैं वे इस प्रकार हैं:",{"type":58,"tag":68,"props":358,"children":360},{"className":359},[92],[361],{"type":58,"tag":95,"props":362,"children":363},{},[364],{"type":58,"tag":74,"props":365,"children":366},{},[367,369,374,376,381],{"type":102,"value":368},"उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।\n",{"type":58,"tag":105,"props":370,"children":371},{},[372],{"type":102,"value":373},"उद्यम (परिश्रम), साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम",{"type":102,"value":375},"\nषडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवात् प्रसीदति ॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":377,"children":378},{},[379],{"type":102,"value":380},"ये छह गुण जिस व्यक्ति में होते हैं, वहाँ देवता (या भाग्य) भी सहायता के लिए प्रसन्न रहते हैं॥",{"type":102,"value":382},"\n— हितोपदेश (तथा सुभाषितरत्नभाण्डागारम्)",{"type":58,"tag":384,"props":385,"children":386},"ul",{},[387,397,407,417,427,437],{"type":58,"tag":347,"props":388,"children":389},{},[390,395],{"type":58,"tag":78,"props":391,"children":392},{},[393],{"type":102,"value":394},"उद्यम:",{"type":102,"value":396}," कार्य को करने की इच्छा और प्रयास।",{"type":58,"tag":347,"props":398,"children":399},{},[400,405],{"type":58,"tag":78,"props":401,"children":402},{},[403],{"type":102,"value":404},"साहस:",{"type":102,"value":406}," कठिन परिस्थितियों में भी कदम आगे बढ़ाने की हिम्मत।",{"type":58,"tag":347,"props":408,"children":409},{},[410,415],{"type":58,"tag":78,"props":411,"children":412},{},[413],{"type":102,"value":414},"धैर्य:",{"type":102,"value":416}," परिणाम आने तक या संकट के समय मन को शांत रखने की क्षमता।",{"type":58,"tag":347,"props":418,"children":419},{},[420,425],{"type":58,"tag":78,"props":421,"children":422},{},[423],{"type":102,"value":424},"बुद्धि:",{"type":102,"value":426}," सही और गलत के बीच भेद करने की शक्ति।",{"type":58,"tag":347,"props":428,"children":429},{},[430,435],{"type":58,"tag":78,"props":431,"children":432},{},[433],{"type":102,"value":434},"शक्ति:",{"type":102,"value":436}," शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य।",{"type":58,"tag":347,"props":438,"children":439},{},[440,445],{"type":58,"tag":78,"props":441,"children":442},{},[443],{"type":102,"value":444},"पराक्रम:",{"type":102,"value":446}," अपने कौशल का सही दिशा में प्रदर्शन करना।",{"type":58,"tag":86,"props":448,"children":449},{},[],{"type":58,"tag":343,"props":451,"children":453},{"start":452},2,[454],{"type":58,"tag":347,"props":455,"children":456},{},[457,462,464,467,493],{"type":58,"tag":78,"props":458,"children":459},{},[460],{"type":102,"value":461},"प्रेय (सांसारिक सुख):",{"type":102,"value":463}," वह कार्य जो केवल तात्कालिक और इंद्रिय सुख प्रदान करता है, लेकिन वास्तविक कल्याण की ओर नहीं ले जाता। यह अस्थायी और\nकभी-कभी हानिकारक भी हो सकता है। शास्त्रों के अनुसार इन 6 अवगुणों से अर्थ का नाश होता है:",{"type":58,"tag":86,"props":465,"children":466},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":468,"children":470},{"className":469},[92],[471],{"type":58,"tag":95,"props":472,"children":473},{},[474],{"type":58,"tag":74,"props":475,"children":476},{},[477,479,484,486,491],{"type":102,"value":478},"षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।\n",{"type":58,"tag":105,"props":480,"children":481},{},[482],{"type":102,"value":483},"ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले मनुष्य को इन छह दोषों का त्याग कर देना चाहिए",{"type":102,"value":485},"\nनिद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":487,"children":488},{},[489],{"type":102,"value":490},"अधिक निद्रा (नींद), ऊँघना (तन्द्रा), डर, क्रोध, आलस्य और काम को टालने की आदत (दीर्घसूत्रता)॥",{"type":102,"value":492},"\n— विदुर नीति (महाभारत)",{"type":58,"tag":384,"props":494,"children":495},{},[496,506,516,526,536,546],{"type":58,"tag":347,"props":497,"children":498},{},[499,504],{"type":58,"tag":78,"props":500,"children":501},{},[502],{"type":102,"value":503},"निद्रा:",{"type":102,"value":505}," जरूरत से ज्यादा सोना।",{"type":58,"tag":347,"props":507,"children":508},{},[509,514],{"type":58,"tag":78,"props":510,"children":511},{},[512],{"type":102,"value":513},"तन्द्रा:",{"type":102,"value":515}," ऊंघना या सुस्ती।",{"type":58,"tag":347,"props":517,"children":518},{},[519,524],{"type":58,"tag":78,"props":520,"children":521},{},[522],{"type":102,"value":523},"भय:",{"type":102,"value":525}," रिस्क लेने से डरना।",{"type":58,"tag":347,"props":527,"children":528},{},[529,534],{"type":58,"tag":78,"props":530,"children":531},{},[532],{"type":102,"value":533},"क्रोध:",{"type":102,"value":535}," दिमाग का संतुलन खोना।",{"type":58,"tag":347,"props":537,"children":538},{},[539,544],{"type":58,"tag":78,"props":540,"children":541},{},[542],{"type":102,"value":543},"आलस्य:",{"type":102,"value":545}," काम टालना।",{"type":58,"tag":347,"props":547,"children":548},{},[549,554],{"type":58,"tag":78,"props":550,"children":551},{},[552],{"type":102,"value":553},"दीर्घसूत्रता:",{"type":102,"value":555}," छोटे से काम में बहुत ज्यादा समय लगाना (Procrastination)।",{"type":58,"tag":86,"props":557,"children":558},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":560,"children":562},{"className":561},[92],[563],{"type":58,"tag":95,"props":564,"children":565},{},[566,597],{"type":58,"tag":74,"props":567,"children":568},{},[569,571,576,578,583,585,590,592],{"type":102,"value":570},"प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः,\n",{"type":58,"tag":105,"props":572,"children":573},{},[574],{"type":102,"value":575},"विघ्न-बाधाओं के डर से नीच (अधम) श्रेणी के लोग किसी कार्य को आरम्भ ही नहीं करते।,",{"type":102,"value":577},"\nप्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।\n",{"type":58,"tag":105,"props":579,"children":580},{},[581],{"type":102,"value":582},"मध्यम श्रेणी के लोग कार्य आरम्भ तो कर देते हैं, किन्तु मार्ग में बाधाएँ आने पर उसे बीच में ही छोड़ देते हैं।",{"type":102,"value":584},"\nविघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः,\n",{"type":58,"tag":105,"props":586,"children":587},{},[588],{"type":102,"value":589},"किन्तु उत्तम श्रेणी के व्यक्ति बार-बार विघ्न आने पर भी,",{"type":102,"value":591},"\nप्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति (अर्थं न परित्यजन्ति)॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":593,"children":594},{},[595],{"type":102,"value":596},"आरम्भ किए गए कार्य को पूर्ण किए बिना नहीं छोड़ते॥",{"type":58,"tag":74,"props":598,"children":599},{},[600],{"type":102,"value":601},"— नीतिशतकम्",{"type":58,"tag":86,"props":603,"children":604},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":606,"children":607},{},[608],{"type":102,"value":609},"श्रेय और प्रिय के भेद समझने के पश्चात भी किसी कार्य को कभी अधुरा नहीं छोड़ना चाहिए। एक बार एक व्यक्ति एक समुद्र को तैर के पार करना चाहता था। वो रामसेतु से\nश्रीलंका तक तैर के जाना चाहता था। उसने कई वर्षों तक अभ्यास किया परंतु अंततः वह जब किनारे से तैरने लगा तो 16 कोस बाद थक कर वापस उसी किनारे आ गया\nऔर कभी पूरा तैर नहीं पाया। कई वर्षों बाद उसे पता चला की पूरी दूरी मात्र 30 कोस थी यदि वह हार कर वापस नहीं आता तो वह तैर के पार हो जाता।\nइसलिए किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पहले ही हार मान लेना या बीच में ही छोड़ देना सबसे बड़ा पाप है॥",{"type":58,"tag":74,"props":611,"children":612},{},[613],{"type":102,"value":614},"ऐसी ही एक कथा चीन में भी प्रचलित है। चीन में एक कथा बड़ी प्रचलित है की एक किसान था वो चीनी बाँस (Moso Bamboo) उगाना चाहता था। उसने 5 वर्ष तक बाँस के बीजो को\nदिन में दो बार नदी से पानी ढ़ो कर दिया। परंतु उनमें से कुछ नहीं निकला। पुरा गाँव उसका उपहास करता की यदि बाँस को उगना होता तो वो उग जाते बीज\nमर चुका है या धरती बंजर है इत्यादि, इत्यादि। किंतु किसान को अपने बीज पर विश्वास था। अचानक एक घटना घटी 2 मास में ही बाँस का पेड़ 100 पग उग आया।\nसारा गाँव उसे कहता की तुम्हारा भाग्य बड़ा अच्छा है, 2 मास में कोई बाँस उगता है भला। परंतु किसान उन्हे कहता की ये 2 मास में नहीं 5 वर्ष 2 मास में उगा है।\nउन 5 वर्षों में बाँस ऊपर नहीं बढ़ रहा था, अपितु अपनी जड़ें इतनी गहरी और मजबूत कर रहा था कि जब वह 100 पग बढ़े, तो उस भार को सह सके।\nअर्थार्जन में भी 'कौशल' (Skills) का विकास वही अदृश्य जड़ें हैं॥",{"type":58,"tag":74,"props":616,"children":617},{},[618,620,628],{"type":102,"value":619},"ये कथा हमें बताती है कि हर वस्तु का अपना समय होता है और बिना ऋतु के फल नहीं होते। व्यक्ति को धृति का गुण धारण करना चाहिए। लक्ष्य कभी कभार बिल्कुल\nनिकट होता है पर व्यक्ति पहले ही हार मान लेता है। कष्टों से मुख ना मोड़ना और तितिक्षा को अपना मित्र समझना चाहिए। साथ ही तप का फल अवश्य मिलता है॥\nअर्थात ",{"type":58,"tag":78,"props":621,"children":622},{},[623],{"type":58,"tag":105,"props":624,"children":625},{},[626],{"type":102,"value":627},"धृति, तितिक्षा और तप",{"type":102,"value":629}," सफल मनुष्य के परममित्र हैं॥",{"type":58,"tag":86,"props":631,"children":632},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":634,"children":636},{"className":635},[92],[637],{"type":58,"tag":95,"props":638,"children":639},{},[640],{"type":58,"tag":74,"props":641,"children":642},{},[643],{"type":102,"value":644},"धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।\nमाली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥\n— कबीर दास",{"type":58,"tag":86,"props":646,"children":647},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":649,"children":650},{},[651],{"type":102,"value":652},"व्यक्ति को धैर्य और संयम से अपने कर्म में निरंतरता बनाए रखनी चाहिए। और आस्था रखनी चाहिए की तप का फल अवश्य मिलेगा। धृति, तितिक्षा और तप सफल मनुष्य के परममित्र हैं।\nजो व्यक्ति किसी भी कार्य को अधुरा नहीं छोड़ता उसे सफलता निश्चित ही मिलती है। क्यूँकि एक के बाद एक कार्य करते करते कोई ना कोई तो अवश्य सफल हो ही जाता है।\nयही अर्थार्जन का सार है। श्रेय, प्रेय का ध्यान रखो और किसी भी कार्य को अधूरा नहीं छोड़ो। प्रयासों में निरंतरता रखो और धृति, तितिक्षा और तप को अपने मित्र बनाओ। सफलता अवश्य मिलेगी॥",{"type":58,"tag":86,"props":654,"children":655},{},[],{"type":58,"tag":186,"props":657,"children":659},{"id":658},"अर्थ-की-रक्षा",[660],{"type":102,"value":661},"अर्थ की रक्षा",{"type":58,"tag":86,"props":663,"children":664},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":666,"children":668},{"className":667},[92],[669],{"type":58,"tag":95,"props":670,"children":671},{},[672],{"type":58,"tag":74,"props":673,"children":674},{},[675,677,682,684,689,691,696,698,703],{"type":102,"value":676},"अलब्धमीहेद् धर्मेण,\n",{"type":58,"tag":105,"props":678,"children":679},{},[680],{"type":102,"value":681},"जो प्राप्त नहीं है, उसे धर्मपूर्वक प्राप्त करने की इच्छा (प्रयास) करनी चाहिए,",{"type":102,"value":683},"\nलब्धं यत्नेन पालयेत्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":685,"children":686},{},[687],{"type":102,"value":688},"जो प्राप्त हो गया है, उसकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए।",{"type":102,"value":690},"\nपालितं वर्धयेन्नित्यं,\n",{"type":58,"tag":105,"props":692,"children":693},{},[694],{"type":102,"value":695},"रक्षित किए हुए (धन आदि) को निरन्तर बढ़ाना चाहिए,",{"type":102,"value":697},"\nवृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत्॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":699,"children":700},{},[701],{"type":102,"value":702},"और बढ़े हुए धन को सुपात्रों (योग्य व्यक्तियों या कार्यों) में लगा देना चाहिए (दान करना चाहिए)॥",{"type":102,"value":704},"\n— याज्ञवल्क्य-स्मृति (अध्याय 2, श्लोक 176)",{"type":58,"tag":86,"props":706,"children":707},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":709,"children":710},{},[711,713,721],{"type":102,"value":712},"अर्थ के लिए चाणक्य ने कहा की ",{"type":58,"tag":78,"props":714,"children":715},{},[716],{"type":58,"tag":105,"props":717,"children":718},{},[719],{"type":102,"value":720},"\"अर्थो रक्षति रक्षितः\"",{"type":102,"value":722},"। जिसका अर्थ निर्बल है उसका धर्म भी निर्बल होगा उसका काम\nऔर मोक्ष भी निर्बल होगा। और बिना धर्म के अर्थ या तो व्यर्थ है या पुर्णतः अनर्थ है। जैसा कि हमने पहले बताया बूँद-बूँद करके अर्थार्जन करना चाहिए।\nयहाँ इसका अर्थ केवल धन से नहीं परंतु हर प्रकार के लाभ से है। किसी को भूमि चाहिए किसी को संतान किसी को ज्ञान\nकिसी को धान तो हर प्रकार कि वस्तु जिसे पाने के लिए व्यक्ति श्रम करता है वह उसका उद्देश्य अथवा अर्थ है॥",{"type":58,"tag":86,"props":724,"children":725},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":727,"children":728},{},[729],{"type":102,"value":730},"इसलिए मनुष्य को चाहिए की जो नहीं है उसे पाने का प्रयास करे तब जो मिल जाए उसकी रक्षा भी करनी चाहिए। और इसके\nपश्चात उसकी वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए। और उसका सदुपयोग करना चाहिए। अपनी अर्जित सम्पत्ति ही मनुष्य को कष्टों से बचाती है।\nऔर जब बंधु-बांधव, पिता-पुत्र, भार्या-भगिनी कोई भी काम नहीं आता तब भी अपनी सम्पत्ति व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती। इसलिए\nसम्पत्ति की रक्षा अपनी प्राण देकर भी करनी चाहिए। ये श्लोक व्यक्ति को कभी नहीं भूलना चाहिए॥",{"type":58,"tag":86,"props":732,"children":733},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":735,"children":737},{"className":736},[92],[738],{"type":58,"tag":95,"props":739,"children":740},{},[741],{"type":58,"tag":74,"props":742,"children":743},{},[744,746,751,753,758,760,765,767,772],{"type":102,"value":745},"न हि लक्ष्मीः कुलक्रमाद् आता,\n",{"type":58,"tag":105,"props":747,"children":748},{},[749],{"type":102,"value":750},"लक्ष्मी (संपदा) न तो कुल की परंपरा (विरासत) से प्राप्त होती है,",{"type":102,"value":752},"\nन हि भूषणम्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":754,"children":755},{},[756],{"type":102,"value":757},"और न ही यह कोई दिखावे का आभूषण मात्र है।",{"type":102,"value":759},"\nखड्गेनाक्रम्य भुञ्जीत,\n",{"type":58,"tag":105,"props":761,"children":762},{},[763],{"type":102,"value":764},"अपनी तलवार (शक्ति और उद्यम) के बल पर जिसे जीता जाता है,",{"type":102,"value":766},"\nवीरभोग्या वसुन्धरा॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":768,"children":769},{},[770],{"type":102,"value":771},"वही पृथ्वी अंततः पराक्रमी वीरों द्वारा ही भोगी जाती है॥",{"type":102,"value":773},"\n— चाणक्य-नीति ( सुभाषितरत्नभाण्डागार )",{"type":58,"tag":86,"props":775,"children":776},{},[],{"type":58,"tag":186,"props":778,"children":780},{"id":779},"उपसंहार",[781],{"type":102,"value":779},{"type":58,"tag":86,"props":783,"children":784},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":786,"children":787},{},[788],{"type":102,"value":789},"'अर्थ' केवल तिजोरी में बंद धन नहीं, अपितु वह 'गति' है जो व्यक्ति को प्रमाद (आलस्य) से पुरुषार्थ की ओर ले जाती है।\nऐतरेय ब्राह्मण का 'चरैवेति' संदेश हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य कभी नहीं थकता, उसी प्रकार जीविका का अर्जन भी एक निरंतर साधना है॥",{"type":58,"tag":86,"props":791,"children":792},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":794,"children":795},{},[796],{"type":102,"value":797},"शुद्ध सात्विक अर्थार्जन वह है जहाँ 'श्रेय' (दीर्घकालिक कल्याण) को 'प्रेय' (तत्कालिक सुख) पर वरीयता दी जाए।\nजब हम अपनी क्षमताओं (उद्यम, साहस, बुद्धि) का संवर्धन करते हैं और अपने दोषों (क्रोध, आलस्य, टालमटोल) का त्याग करते हैं, तब 'लक्ष्मी' केवल संयोग नहीं,\nअपितु हमारे श्रम का स्वाभाविक परिणाम बन जाती है। पुरुषार्थ से अर्जित अर्थ केवल संपत्ति नहीं, अपितु ईश्वर का प्रसाद बन जाता है।\nअंततः, अर्थ की सार्थकता उसकी रक्षा, वृद्धि और सुपात्र को दान देने में ही निहित है। जो अर्थ समाज और\nस्वयं के उत्थान में काम न आए, वह केवल बोझ है॥",{"type":58,"tag":86,"props":799,"children":800},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":802,"children":803},{},[804],{"type":102,"value":805},"यह तालिका जीवन में सफलता, चरित्र निर्माण और आर्थिक संतुलन के सिद्धांतों को स्पष्ट करती है॥",{"type":58,"tag":86,"props":807,"children":808},{},[],{"type":58,"tag":810,"props":811,"children":813},"swar-lipi",{":is-notation":812},"false",[814],{"type":58,"tag":815,"props":816,"children":817},"table",{},[818,843],{"type":58,"tag":819,"props":820,"children":821},"thead",{},[822],{"type":58,"tag":823,"props":824,"children":825},"tr",{},[826,833,838],{"type":58,"tag":827,"props":828,"children":830},"th",{"align":829},"left",[831],{"type":102,"value":832},"आयाम (Dimension)",{"type":58,"tag":827,"props":834,"children":835},{"align":829},[836],{"type":102,"value":837},"श्रेय मार्ग (The Path of Good)",{"type":58,"tag":827,"props":839,"children":840},{"align":829},[841],{"type":102,"value":842},"प्रेय मार्ग (The Path of Pleasant)",{"type":58,"tag":844,"props":845,"children":846},"tbody",{},[847,860,881,912,943,974],{"type":58,"tag":823,"props":848,"children":849},{},[850,854,857],{"type":58,"tag":851,"props":852,"children":853},"td",{"align":829},[],{"type":58,"tag":851,"props":855,"children":856},{"align":829},[],{"type":58,"tag":851,"props":858,"children":859},{"align":829},[],{"type":58,"tag":823,"props":861,"children":862},{},[863,871,876],{"type":58,"tag":851,"props":864,"children":865},{"align":829},[866],{"type":58,"tag":78,"props":867,"children":868},{},[869],{"type":102,"value":870},"मूल दर्शन",{"type":58,"tag":851,"props":872,"children":873},{"align":829},[874],{"type":102,"value":875},"दूरगामी कल्याण और स्थिरता।",{"type":58,"tag":851,"props":877,"children":878},{"align":829},[879],{"type":102,"value":880},"तत्कालिक सुख और क्षणिक संतोष।",{"type":58,"tag":823,"props":882,"children":883},{},[884,892,902],{"type":58,"tag":851,"props":885,"children":886},{"align":829},[887],{"type":58,"tag":78,"props":888,"children":889},{},[890],{"type":102,"value":891},"आंतरिक शक्ति (षड् गुण\u002Fदोष)",{"type":58,"tag":851,"props":893,"children":894},{"align":829},[895,897,900],{"type":102,"value":896},"षड् गुण (सफलता के बीज): ",{"type":58,"tag":86,"props":898,"children":899},{},[],{"type":102,"value":901}," ये गुण व्यक्ति को संकट में स्थिर रखते हैं।",{"type":58,"tag":851,"props":903,"children":904},{"align":829},[905,907,910],{"type":102,"value":906},"षड् दोष (पतन के द्वार): ",{"type":58,"tag":86,"props":908,"children":909},{},[],{"type":102,"value":911}," ये दोष सामर्थ्य को जंग की तरह खा जाते हैं।",{"type":58,"tag":823,"props":913,"children":914},{},[915,923,933],{"type":58,"tag":851,"props":916,"children":917},{"align":829},[918],{"type":58,"tag":78,"props":919,"children":920},{},[921],{"type":102,"value":922},"कार्य की निरंतरता (Consistency)",{"type":58,"tag":851,"props":924,"children":925},{"align":829},[926,928,931],{"type":102,"value":927},"चरैवेति (सतत विकास): ",{"type":58,"tag":86,"props":929,"children":930},{},[],{"type":102,"value":932}," लक्ष्य प्राप्ति तक रुकना नहीं।",{"type":58,"tag":851,"props":934,"children":935},{"align":829},[936,938,941],{"type":102,"value":937},"विघ्न-भय (अपूर्णता): ",{"type":58,"tag":86,"props":939,"children":940},{},[],{"type":102,"value":942}," शॉर्टकट की तलाश में भटकना।",{"type":58,"tag":823,"props":944,"children":945},{},[946,954,964],{"type":58,"tag":851,"props":947,"children":948},{"align":829},[949],{"type":58,"tag":78,"props":950,"children":951},{},[952],{"type":102,"value":953},"अर्थ प्रबंधन (Management)",{"type":58,"tag":851,"props":955,"children":956},{"align":829},[957,959,962],{"type":102,"value":958},"विवेकपूर्ण संतुलन: ",{"type":58,"tag":86,"props":960,"children":961},{},[],{"type":102,"value":963}," कार्य में 'श्रेष्ठ' को देखकर प्रेरणा लेना। व्यय में 'कनिष्ठ' को देखकर संतोष करना।",{"type":58,"tag":851,"props":965,"children":966},{"align":829},[967,969,972],{"type":102,"value":968},"असंतुलित दृष्टि: ",{"type":58,"tag":86,"props":970,"children":971},{},[],{"type":102,"value":973}," व्यय में दूसरों की होड़ (दिखावा) करना।",{"type":58,"tag":823,"props":975,"children":976},{},[977,985,995],{"type":58,"tag":851,"props":978,"children":979},{"align":829},[980],{"type":58,"tag":78,"props":981,"children":982},{},[983],{"type":102,"value":984},"रक्षा एवं संवर्धन (Protection)",{"type":58,"tag":851,"props":986,"children":987},{"align":829},[988,990,993],{"type":102,"value":989},"रक्षण और वृद्धि: ",{"type":58,"tag":86,"props":991,"children":992},{},[],{"type":102,"value":994}," अर्थ को 'सम्पत्ति' बनाना और रक्षा करना।",{"type":58,"tag":851,"props":996,"children":997},{"align":829},[998,1000,1003],{"type":102,"value":999},"क्षय और बर्बादी: ",{"type":58,"tag":86,"props":1001,"children":1002},{},[],{"type":102,"value":1004}," अर्थ का भय से त्याग करना।",{"type":58,"tag":86,"props":1006,"children":1007},{},[],{"type":58,"tag":384,"props":1009,"children":1010},{},[1011,1021,1031],{"type":58,"tag":347,"props":1012,"children":1013},{},[1014,1019],{"type":58,"tag":78,"props":1015,"children":1016},{},[1017],{"type":102,"value":1018},"श्रेय मार्ग",{"type":102,"value":1020}," अनुशासन और धैर्य की मांग करता है लेकिन अंततः स्थायी सुख देता है।",{"type":58,"tag":347,"props":1022,"children":1023},{},[1024,1029],{"type":58,"tag":78,"props":1025,"children":1026},{},[1027],{"type":102,"value":1028},"प्रेय मार्ग",{"type":102,"value":1030}," शुरुआत में सरल और लुभावना लगता है, परंतु इसका परिणाम अक्सर पतन होता है।",{"type":58,"tag":347,"props":1032,"children":1033},{},[1034,1039],{"type":58,"tag":78,"props":1035,"children":1036},{},[1037],{"type":102,"value":1038},"सफलता का मंत्र:",{"type":102,"value":1040}," दोषों का त्याग कर गुणों को धारण करना और 'चरैवेति-चरैवेति' (निरंतर चलते रहना) के भाव को अपनाना।",{"type":58,"tag":86,"props":1042,"children":1043},{},[],{"type":58,"tag":86,"props":1045,"children":1046},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":1048,"children":1050},{"className":1049},[92],[1051],{"type":58,"tag":95,"props":1052,"children":1053},{},[1054],{"type":58,"tag":74,"props":1055,"children":1056},{},[1057,1059,1064,1066,1071],{"type":102,"value":1058},"अप्रकटीकृतशक्तिः शक्तोऽपि जनस्तिरस्क्रियां लभते,\n",{"type":58,"tag":105,"props":1060,"children":1061},{},[1062],{"type":102,"value":1063},"अपनी शक्ति को प्रकट न करने वाला व्यक्ति, शक्तिशाली होने पर भी तिरस्कार का पात्र बनता है,",{"type":102,"value":1065},"\nनिवसन्नन्तर्दारुणि लङ्घ्यो वह्निर्न तु ज्वलितः॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":1067,"children":1068},{},[1069],{"type":102,"value":1070},"जैसे लकड़ी के भीतर छिपी हुई आग को कोई भी लांघ सकता है, परंतु प्रज्वलित आग के पास जाने का साहस कोई नहीं करता॥",{"type":102,"value":1072},"\n— पंचतंत्र (मित्रभेद, श्लोक 31)",{"type":58,"tag":86,"props":1074,"children":1075},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":1077,"children":1078},{},[1079],{"type":102,"value":1080},"जब भी दुविधा हो, तो वह चुनें जो अभी कठिन है पर भविष्य में सुखद (श्रेय), न कि वह जो अभी सुखद है पर भविष्य में कष्टकारी (प्रेय)।\nआशा करता हूँ आपको अर्थ की महिमा और उसके प्राप्ति का सूत्र जीवन में प्रगति देगा॥",{"title":47,"searchDepth":452,"depth":452,"links":1082},[1083,1084,1085,1086],{"id":188,"depth":452,"text":191},{"id":290,"depth":452,"text":293},{"id":658,"depth":452,"text":661},{"id":779,"depth":452,"text":779},"markdown","content:shiksha:vedicJeevan:6.atmajnaan_05_purushartha_arth.md","content","shiksha\u002FvedicJeevan\u002F6.atmajnaan_05_purushartha_arth.md","shiksha\u002FvedicJeevan\u002F6.atmajnaan_05_purushartha_arth","md",1776411259634]