[{"data":1,"prerenderedAt":1112},["ShallowReactive",2],{"content-\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_05_ashram":3,"content-query-g3aDT0EZMF":51},[4,12,17,21,25,29,33,37,41,45,49],{"_path":5,"title":6,"description":7,"part":8,"image":9,"prev_path":10,"next_path":11},"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fintro_01_intro","॥ परिचय ॥","यहाँ हम वैदिक दृष्टि से जीवन को समझने का प्रयास करेंगे। हम यहाँ कई सूत्रों को जोड़कर जीवन में सफल होने के उपाय ढूँढेंगे॥\n","॥ प्रस्तावना ॥","\u002Fimages\u002Fshiksha\u002Fjeevan_darshan.jpeg",null,"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_01_tripakshiyavivek",{"_path":11,"title":13,"description":14,"part":15,"image":9,"prev_path":5,"next_path":16},"॥ तृतीय मार्ग ॥","ज्ञान की परिक्षा का तीसरा मार्ग। बिना जिसके ज्ञान को प्रमाणित करना कठिन है॥\n","॥ आत्मज्ञान ॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_02_jnaan",{"_path":16,"title":18,"description":19,"part":15,"image":9,"prev_path":11,"next_path":20},"॥ ज्ञान ॥","ज्ञान से विद्या तक। व्यावहारिक अधिगम के प्राचीन चरण। यह स्पष्ट करता है कि कैसे सतही ज्ञान को जीवन का अंग बनाया जाता है॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_03_chittvijnaan",{"_path":20,"title":22,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":16,"next_path":24},"॥ चित्तविज्ञान ॥","पुरुषार्थ का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_04_varnn",{"_path":24,"title":26,"description":27,"part":15,"image":9,"prev_path":20,"next_path":28},"॥ चतुर्वण ॥","चतुर्वर्ण की तार्किक समीक्षा: अष्टलक्ष्मी, अष्टसरस्वती और एकादश शक्ति के माध्यम से समझिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का वास्तविक स्वरूप। प्राचीन दर्शन का आधुनिक विश्लेषण॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_05_ashram",{"_path":28,"title":30,"description":31,"part":15,"image":9,"prev_path":24,"next_path":32},"॥ आश्रम ॥","वर्णाश्रम की तार्किक समीक्षा और महत्व॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_06_purushartha_dharm",{"_path":32,"title":34,"description":35,"part":15,"image":9,"prev_path":28,"next_path":36},"॥ पुरुषार्थ (धर्म)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से धर्म की व्याख्या और धर्म परायण होने के लिए एक सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_07_purushartha_arth",{"_path":36,"title":38,"description":39,"part":15,"image":9,"prev_path":32,"next_path":40},"॥ पुरुषार्थ (अर्थ) ॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से अर्थ की व्याख्या और अर्थार्जन के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_08_purushartha_kaam",{"_path":40,"title":42,"description":43,"part":15,"image":9,"prev_path":36,"next_path":44},"॥ पुरुषार्थ (काम)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से काम का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_09_purushartha_moksha",{"_path":44,"title":46,"description":47,"part":15,"image":9,"prev_path":40,"next_path":48},"॥ पुरुषार्थ (मोक्ष)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से मोक्ष का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र।\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_10_purushartha_nishkarsha",{"_path":48,"title":50,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":44,"next_path":10},"॥ पुरुषार्थ (निष्कर्ष) ॥",{"_path":28,"_dir":52,"_draft":53,"_partial":53,"_locale":54,"title":30,"description":31,"navigation":55,"part":15,"author":56,"image":9,"tag":57,"body":61,"_type":1106,"_id":1107,"_source":1108,"_file":1109,"_stem":1110,"_extension":1111},"vedicjeevan",false,"",true,"Vikram Singh Rawat",[58,59,60],"literature","book","jeevandarshan",{"type":62,"children":63,"toc":1100},"root",[64,74,92,96,126,129,133,136,143,146,151,154,160,163,189,192,197,202,205,231,234,239,242,247,250,265,268,282,285,299,302,326,329,343,346,486,489,494,497,502,505,510,513,518,521,534,537,550,553,566,569,582,585,598,601,606,609,614,617,622,625,630,633,638,641,646,649,763,766,772,775,780,783,938,941,946,949,952,955,997,1000,1041,1044,1073,1076,1079,1082,1095],{"type":65,"tag":66,"props":67,"children":68},"element","h1",{"id":54},[69],{"type":65,"tag":70,"props":71,"children":73},"binding",{"value":72},"$doc.title",[],{"type":65,"tag":75,"props":76,"children":79},"div",{"className":77},[78],"sub_heading",[80],{"type":65,"tag":81,"props":82,"children":83},"p",{},[84],{"type":65,"tag":85,"props":86,"children":87},"strong",{},[88],{"type":65,"tag":70,"props":89,"children":91},{"value":90},"$doc.description",[],{"type":65,"tag":93,"props":94,"children":95},"br",{},[],{"type":65,"tag":75,"props":97,"children":100},{"className":98},[99],"shloka",[101],{"type":65,"tag":102,"props":103,"children":104},"blockquote",{},[105],{"type":65,"tag":81,"props":106,"children":107},{},[108,111,117,119,124],{"type":109,"value":110},"text","ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा।\n",{"type":65,"tag":112,"props":113,"children":114},"em",{},[115],{"type":109,"value":116},"ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और वैसे ही यति (संन्यासी)।",{"type":109,"value":118},"\nएते गृहस्थप्रभवाश्चत्वारः पृथगाश्रमाः॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":120,"children":121},{},[122],{"type":109,"value":123},"ये चारों पृथक आश्रम गृहस्थ से ही उत्पन्न (पोषित) होने वाले हैं॥",{"type":109,"value":125},"\n— (मनुस्मृति 6.87)",{"type":65,"tag":93,"props":127,"children":128},{},[],{"type":65,"tag":130,"props":131,"children":132},"hr",{},[],{"type":65,"tag":93,"props":134,"children":135},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":137,"children":138},{},[139],{"type":65,"tag":140,"props":141,"children":142},"img",{"alt":30,"src":9},[],{"type":65,"tag":93,"props":144,"children":145},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":147,"children":148},{},[149],{"type":109,"value":150},"जीवन के हर पड़ाव पर आपको लगता है की कुछ छूट गया है। जब विद्यार्थी को लगता है मैंने बहुत पढ़ लिया चलो अब\nकुछ करा जाए, जब एक जवान को लगता है मैंनें बहुत कर लिया अब थोड़ा विश्राम किया जाए। अथवा जब एक व्यक्ति को\nलगता है की लोक सुधर गया अब परलोक सुधारना चाहिए। जीवन के हर पड़ाव में ऐसा क्यूँ लगता है की इच्छाएँ समाप्त नहीं हुई कुछ रह गया।\nइसे कैसे हल करें ये जानने के लिए आगे पढ़ें॥",{"type":65,"tag":93,"props":152,"children":153},{},[],{"type":65,"tag":155,"props":156,"children":158},"h2",{"id":157},"पंचकोष",[159],{"type":109,"value":157},{"type":65,"tag":93,"props":161,"children":162},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":164,"children":166},{"className":165},[99],[167],{"type":65,"tag":102,"props":168,"children":169},{},[170],{"type":65,"tag":81,"props":171,"children":172},{},[173,175,180,182,187],{"type":109,"value":174},"अन्नप्राणमनोबुद्ध्यानन्दाश्चेति पञ्चकाः।\n",{"type":65,"tag":112,"props":176,"children":177},{},[178],{"type":109,"value":179},"अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय—ये पाँच।",{"type":109,"value":181},"\nकोशास्तैरावृतः स्वात्मा कोष्ठैरिव महानसि॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":183,"children":184},{},[185],{"type":109,"value":186},"कोश हैं, जिनसे ढकी हुई आत्मा वैसी ही प्रतीत होती है जैसे कोष्ठों (परतों) के भीतर बड़ी तलवार॥",{"type":109,"value":188},"\n— (विवेकचूडामणि, १५१)",{"type":65,"tag":93,"props":190,"children":191},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":193,"children":194},{},[195],{"type":109,"value":196},"पंचकोष की अवधारणा हमारे कुछ बहुत ही सुंदर अवधारणाओं में से एक है। और जीव की यात्रा को बहुत ही सरलता से समझाता है।\nभारतीय वाङ्मय के अनमोल रत्न 'तैत्तिरीय उपनिषद' की 'भृगुवल्ली' में एक अत्यंत गूढ़ कथा आती है। यह कथा केवल पिता-पुत्र का संवाद नहीं,\nअपितु एक साधक की बाह्य जगत से अंतर्जगत की ओर यात्रा है॥",{"type":65,"tag":81,"props":198,"children":199},{},[200],{"type":109,"value":201},"महर्षि भृगु के मन में एक शाश्वत प्रश्न उत्पन्न हुआ— \"ब्रह्म क्या है?\" वे अपने पिता, वरुण देव के पास पहुँचे और दीक्षा की प्रार्थना की।\nवरुण देव ने उन्हें कोई बना-बनाया उत्तर देने के स्थान पर एक सूत्र दिया:",{"type":65,"tag":93,"props":203,"children":204},{},[],{"type":65,"tag":75,"props":206,"children":208},{"className":207},[99],[209],{"type":65,"tag":102,"props":210,"children":211},{},[212],{"type":65,"tag":81,"props":213,"children":214},{},[215,217,222,224,229],{"type":109,"value":216},"यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति।\n",{"type":65,"tag":112,"props":218,"children":219},{},[220],{"type":109,"value":221},"जिससे निश्चय ही ये समस्त प्राणी जन्म लेते हैं। जन्म लेकर जिसके द्वारा जीवित रहते हैं।",{"type":109,"value":223},"\nयत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति॥\n",{"type":65,"tag":112,"props":225,"children":226},{},[227],{"type":109,"value":228},"और अंत में प्रयाण करते हुए (मृत्यु के पश्चात) जिसमें विलीन हो जाते हैं। उसे विशेष रूप से जानने की इच्छा करो। वही ब्रह्म है॥",{"type":109,"value":230},"\n— तैत्तिरीय उपनिषद",{"type":65,"tag":93,"props":232,"children":233},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":235,"children":236},{},[237],{"type":109,"value":238},"अर्थात्: जिससे समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिसमें जीवित रहते हैं और अंततः जिसमें विलीन हो जाते हैं, उसे ही ब्रह्म जानो।\nवरुण देव ने भृगु को 'तप' (चिंतन और शोध) करने का निर्देश दिया। भृगु ने पाँच चरणों में सत्य की खोज की, जिन्हें हम 'पंचकोश' कहते हैं:",{"type":65,"tag":93,"props":240,"children":241},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":243,"children":244},{},[245],{"type":109,"value":246},"पंचकोशों की क्रमिक यात्रा",{"type":65,"tag":93,"props":248,"children":249},{},[],{"type":65,"tag":251,"props":252,"children":253},"ol",{},[254],{"type":65,"tag":255,"props":256,"children":257},"li",{},[258,263],{"type":65,"tag":85,"props":259,"children":260},{},[261],{"type":109,"value":262},"अन्नमय कोश (पदार्थ का बोध) -",{"type":109,"value":264}," भृगु ने प्रथम तप के पश्चात निष्कर्ष निकाला कि 'अन्न' (पदार्थ) ही ब्रह्म है। क्योंकि भौतिक शरीर अन्न से निर्मित है,\nअन्न से ही पुष्ट होता है और अंत में मिट्टी (अन्न का स्रोत) में ही मिल जाता है। किंतु उन्हें बोध हुआ कि जड़ पदार्थ स्वयं में पूर्ण सत्य नहीं हो सकता॥",{"type":65,"tag":93,"props":266,"children":267},{},[],{"type":65,"tag":251,"props":269,"children":271},{"start":270},2,[272],{"type":65,"tag":255,"props":273,"children":274},{},[275,280],{"type":65,"tag":85,"props":276,"children":277},{},[278],{"type":109,"value":279},"प्राणमय कोश (ऊर्जा का बोध) -",{"type":109,"value":281}," पुनः चिंतन करने पर उन्होंने पाया कि शरीर तो केवल एक यंत्र है, इसे चलाने वाली शक्ति 'प्राण' (श्वसन और ऊर्जा) है। प्राण के बिना\nशरीर का कोई अस्तित्व नहीं, अतः 'प्राण ही ब्रह्म है'। परंतु प्राण भी अनियंत्रित और केवल जैविक क्रिया है, इसके पार भी कुछ होना चाहिए॥",{"type":65,"tag":93,"props":283,"children":284},{},[],{"type":65,"tag":251,"props":286,"children":288},{"start":287},3,[289],{"type":65,"tag":255,"props":290,"children":291},{},[292,297],{"type":65,"tag":85,"props":293,"children":294},{},[295],{"type":109,"value":296},"मनोमय कोश (संकल्प का बोध) -",{"type":109,"value":298}," तीसरी बार तप करने पर भृगु को ज्ञात हुआ कि प्राणों का संचालन 'मन' (इंद्रियां और विचार) करता है। हमारी इच्छाएँ और\nभावनाएँ ही हमारे अस्तित्व का केंद्र हैं। अतः उन्होंने 'मन को ही ब्रह्म' माना। किंतु मन चंचल है और द्वंद्वों से भरा है, यह शाश्वत सत्य नहीं हो सकता॥",{"type":65,"tag":93,"props":300,"children":301},{},[],{"type":65,"tag":251,"props":303,"children":305},{"start":304},4,[306],{"type":65,"tag":255,"props":307,"children":308},{},[309,314,316,324],{"type":65,"tag":85,"props":310,"children":311},{},[312],{"type":109,"value":313},"विज्ञानमय कोश (विवेक का बोध) -",{"type":109,"value":315}," गहन ध्यान के उपरांत भृगु को समझ आया कि मन के पार एक 'विवेक' (बुद्धि या अंतर्ज्ञान) है, जो सही-गलत का निर्णय करता है।\nयह विज्ञानमय कोश ही मनुष्य को पशुओं से भिन्न करता है। अतः उन्होंने 'विज्ञान को ब्रह्म' जाना। परंतु ज्ञान भी कर्तापन के अहंकार से बंधा है। यहाँ रिने डिस्कार्टेस की पंक्ति बहुत\nसटीक बैठती है कि ",{"type":65,"tag":112,"props":317,"children":318},{},[319],{"type":65,"tag":85,"props":320,"children":321},{},[322],{"type":109,"value":323},"॥ I think, therefore I am ॥",{"type":109,"value":325},"। वह केवल यहीं तक पहुंच पाया। परंतु हमारे उपनिष्द इससे भी एक स्तर ऊपर गए। 'अहं ब्रह्मास्मि' या 'सोऽहम्'\nजैसे वाक्य तक पहुँचने के लिए एक स्तर और ऊपर जाना होगा॥",{"type":65,"tag":93,"props":327,"children":328},{},[],{"type":65,"tag":251,"props":330,"children":332},{"start":331},5,[333],{"type":65,"tag":255,"props":334,"children":335},{},[336,341],{"type":65,"tag":85,"props":337,"children":338},{},[339],{"type":109,"value":340},"आनंदमय कोश (परम सत्य का बोध) -",{"type":109,"value":342}," अंततः, समस्त आवरणों को भेदकर भृगु उस अवस्था में पहुँचे जहाँ न द्वंद्व था, न विचार, न अहंकार—वहाँ केवल 'आनंद' था।\nउन्होंने अनुभव किया कि आनंद ही वह आदि और अंत है जिससे सृष्टि निःसृत होती है और जिसमें विश्राम पाती है। यही 'आनंदमय कोश' साक्षात् ब्रह्म है। ये वह\nआनंदावस्था है जिसे हम 'अहं ब्रह्मास्मि', 'सोऽहम्', 'शिवोऽहम्', 'तत् त्वमसि' इत्यादि के रूप में जानते हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":344,"children":345},{},[],{"type":65,"tag":347,"props":348,"children":350},"swar-lipi",{":is-notation":349},"false",[351],{"type":65,"tag":352,"props":353,"children":354},"table",{},[355,379],{"type":65,"tag":356,"props":357,"children":358},"thead",{},[359],{"type":65,"tag":360,"props":361,"children":362},"tr",{},[363,369,374],{"type":65,"tag":364,"props":365,"children":366},"th",{},[367],{"type":109,"value":368},"कोश",{"type":65,"tag":364,"props":370,"children":371},{},[372],{"type":109,"value":373},"वर्तमान स्थिति की जाँच (Checklist)",{"type":65,"tag":364,"props":375,"children":376},{},[377],{"type":109,"value":378},"क्या सुधारें?",{"type":65,"tag":380,"props":381,"children":382},"tbody",{},[383,396,414,432,450,468],{"type":65,"tag":360,"props":384,"children":385},{},[386,390,393],{"type":65,"tag":387,"props":388,"children":389},"td",{},[],{"type":65,"tag":387,"props":391,"children":392},{},[],{"type":65,"tag":387,"props":394,"children":395},{},[],{"type":65,"tag":360,"props":397,"children":398},{},[399,404,409],{"type":65,"tag":387,"props":400,"children":401},{},[402],{"type":109,"value":403},"अन्नमय",{"type":65,"tag":387,"props":405,"children":406},{},[407],{"type":109,"value":408},"क्या मेरा शरीर मेरे लक्ष्यों में बाधा है या सहायक?",{"type":65,"tag":387,"props":410,"children":411},{},[412],{"type":109,"value":413},"सात्विक आहार और आसन।",{"type":65,"tag":360,"props":415,"children":416},{},[417,422,427],{"type":65,"tag":387,"props":418,"children":419},{},[420],{"type":109,"value":421},"प्राणमय",{"type":65,"tag":387,"props":423,"children":424},{},[425],{"type":109,"value":426},"क्या मैं दिन भर थका हुआ महसूस करता हूँ (Energy Drain)?",{"type":65,"tag":387,"props":428,"children":429},{},[430],{"type":109,"value":431},"प्राणायाम और अनुशासन।",{"type":65,"tag":360,"props":433,"children":434},{},[435,440,445],{"type":65,"tag":387,"props":436,"children":437},{},[438],{"type":109,"value":439},"मनोमय",{"type":65,"tag":387,"props":441,"children":442},{},[443],{"type":109,"value":444},"क्या मेरे निर्णय भावनाओं (Reactions) के अधीन हैं?",{"type":65,"tag":387,"props":446,"children":447},{},[448],{"type":109,"value":449},"ध्यान और तटस्थता।",{"type":65,"tag":360,"props":451,"children":452},{},[453,458,463],{"type":65,"tag":387,"props":454,"children":455},{},[456],{"type":109,"value":457},"विज्ञानमय",{"type":65,"tag":387,"props":459,"children":460},{},[461],{"type":109,"value":462},"क्या मैं अपनी गलतियों से सीख रहा हूँ या उन्हें दोहरा रहा हूँ?",{"type":65,"tag":387,"props":464,"children":465},{},[466],{"type":109,"value":467},"स्वाध्याय और चिंतन।",{"type":65,"tag":360,"props":469,"children":470},{},[471,476,481],{"type":65,"tag":387,"props":472,"children":473},{},[474],{"type":109,"value":475},"आनंदमय",{"type":65,"tag":387,"props":477,"children":478},{},[479],{"type":109,"value":480},"क्या मैं बिना किसी बाहरी कारण के भी शांत रह सकता हूँ?",{"type":65,"tag":387,"props":482,"children":483},{},[484],{"type":109,"value":485},"आत्म-साक्षात्कार और सेवा।",{"type":65,"tag":93,"props":487,"children":488},{},[],{"type":65,"tag":155,"props":490,"children":492},{"id":491},"जीवनयात्रा",[493],{"type":109,"value":491},{"type":65,"tag":93,"props":495,"children":496},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":498,"children":499},{},[500],{"type":109,"value":501},"जिस प्रकार पेड़ों की एक ऋतु होती है और फल केवल उसी ऋतु में फलित होते हैं। मनुष्य की भी एक ऋतु होती है और जीवन के एक पड़ाव में\nव्यक्ति के कोई विशेष गुण निखरकर आते हैं। मनुष्य को चाहिए की इन अवस्थाओं को पहचाने और इनके अनुसार आचरण करे॥ हर एक आश्रम में एक कोष की प्रधानता होती है।\nवैसे जीवन पर्यंत अलग-अलग कोष की अलग-अलग समय प्रधानता होती रहती है। परंतु स्थाई रूप से एक आश्रम में एक या दो कोष ही अधिक सक्रिय होते है।\nएक यौवनावस्था वाला व्यक्ति केवल एक नर-नारी की बाहरी सुंदरता से आकर्षित होता है परंतु एक प्रोड़ावस्था वाला व्यक्ति उनका आचरण और स्वभाव से आकर्षित होता है।\nसमय के साथ साथ व्यक्ति में एक गूह्य सोच विकसित होती है और जीवन में एक ठहराव आता जाता है। अतः व्यक्ति को ये जानकर कार्य करना चाहिए की\nजो आज उसकी सोच है या विचार हैं वो कल वैसे नहीं होंगे और जो मुझसे बड़ा या छोटा व्यक्ति कह रहा है वो किस आश्रमाधीन होकर ये बात कह रहा है॥",{"type":65,"tag":93,"props":503,"children":504},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":506,"children":507},{},[508],{"type":109,"value":509},"पंचकोष और आश्रम व्यवस्था का अध्ययन करते समय एक स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि उपनिषदों में कोष पाँच बताए गए हैं, तो हमारी\nव्यवस्था में आश्रम केवल चार ही क्यों हैं? इसका तार्किक उत्तर हमारे जीवन के सबसे आरंभिक चरण— 'शैशवावस्था' या 'प्राक्-आश्रम' (Pre-Ashram Phase)\nमें निहित है। जन्म से लेकर विद्यारंभ (गुरुकुल प्रवेश) तक का कालखंड किसी भी औपचारिक आश्रम की परिधि में नहीं आता।\nयह वह समय है जब शिशु का जीवन पूर्णतः 'अन्नमय कोष' (भौतिक शरीर, क्षुधा और निद्रा) के अधीन होता है। इस अवस्था में कोई कर्तव्य (धर्म) या\nलक्ष्य (मोक्ष) नहीं होता, अपितु प्रकृति स्वयं जीव का भरण-पोषण करती है। वस्तुतः, शैशवावस्था कोई आश्रम नहीं, अपितु सम्पूर्ण आश्रम व्यवस्था का\nअनिवार्य आधार है।",{"type":65,"tag":93,"props":511,"children":512},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":514,"children":515},{},[516],{"type":109,"value":517},"भारतीय संस्कृति में जीवन को केवल वर्षों की संख्या में नहीं, अपितु चेतना के विकास में मापा गया है।\nआश्रम व्यवस्था और पंचकोशों का अंतर्संबंध यह दर्शाता है कि कैसे मनुष्य स्थूल जगत से सूक्ष्म सत्य की ओर बढ़ता है:",{"type":65,"tag":93,"props":519,"children":520},{},[],{"type":65,"tag":251,"props":522,"children":523},{},[524],{"type":65,"tag":255,"props":525,"children":526},{},[527,532],{"type":65,"tag":85,"props":528,"children":529},{},[530],{"type":109,"value":531},"बाल्य काल (बाल्यावस्था - अन्नमय कोश की प्रधानता) -",{"type":109,"value":533}," गुरुकुल प्रवेश और यज्ञोपवीत संस्कार से पूर्व का जीवन किसी भी आश्रम की\nपरिधि में नहीं आता। इस अवस्था में बालक का 'जनेऊ संस्कार' नहीं हुआ होता, अतः उसका आध्यात्मिक अस्तित्व सुप्त रहता है।\nइस समय बालक केवल क्षुधा (भूख), निद्रा और शारीरिक वृद्धि के अधीन होता है। उसका संपूर्ण विश्व केवल आहार और भौतिक सुरक्षा तक सीमित है।\nवह पूर्णतः जड़ प्रकृति (अन्न) के आश्रय में रहता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":535,"children":536},{},[],{"type":65,"tag":251,"props":538,"children":539},{"start":270},[540],{"type":65,"tag":255,"props":541,"children":542},{},[543,548],{"type":65,"tag":85,"props":544,"children":545},{},[546],{"type":109,"value":547},"ब्रह्मचर्य आश्रम (किशोरावस्था - प्राणमय कोश का विकास) -",{"type":109,"value":549}," गुरुकुल में प्रवेश के साथ ही ब्रह्मचर्य आश्रम का आरंभ होता है।\nयहाँ गुरु उसे अनुशासन, संयम और विद्या के साथ-साथ 'प्राण' को वश में करना सिखाते हैं। किशोर ऊर्जा से परिपूर्ण होता है। गुरुकुल की कठोर दिनचर्या और\nप्राणायाम के माध्यम से वह अपनी अनियंत्रित ऊर्जा को 'ओज' और 'मेधा' में परिवर्तित करता है। ज्ञानार्जन के लिए सर्वोच्च परिस्थितियाँ इसी कोश के शोधन से निर्मित होती हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":551,"children":552},{},[],{"type":65,"tag":251,"props":554,"children":555},{"start":287},[556],{"type":65,"tag":255,"props":557,"children":558},{},[559,564],{"type":65,"tag":85,"props":560,"children":561},{},[562],{"type":109,"value":563},"गृहस्थ आश्रम (युवावस्था - मनोमय कोश) -",{"type":109,"value":565}," जब मनुष्य समाज और परिवार के उत्तरदायित्व स्वीकार करता है, तब उसका संघर्ष और सामंजस्य बाह्य जगत से होता है।\nगृहस्थ जीवन में भावनाएं, राग-द्वेष, कर्तव्य और संकल्प प्रधान होते हैं। यहाँ व्यक्ति का 'मन' ही उसका सबसे बड़ा सारथी या शत्रु बनता है।\nयद्यपि अन्य कोश सक्रिय रहते हैं, किंतु जीवन का संचालन मन की इच्छाओं और वृत्तियों द्वारा ही होता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":567,"children":568},{},[],{"type":65,"tag":251,"props":570,"children":571},{"start":304},[572],{"type":65,"tag":255,"props":573,"children":574},{},[575,580],{"type":65,"tag":85,"props":576,"children":577},{},[578],{"type":109,"value":579},"वानप्रस्थ आश्रम (प्रौढ़ावस्था - विज्ञानमय कोश) -",{"type":109,"value":581}," संसार के अनुभवों और उत्तरदायित्वों से निवृत्त होकर जब व्यक्ति पहली बार 'परलोक' की सुधि लेता है,\nतब वह वानप्रस्थ की ओर बढ़ता है। यहाँ वह पुनः गुरु की शरण में जाकर दीक्षा लेता है। इस पड़ाव पर मनुष्य केवल 'सूचना' नहीं, अपितु\n'विवेक' (Wisdom) का अन्वेषण करता है। वह सत्य और असत्य के भेद को समझने लगता है। उसकी बुद्धि सूक्ष्म विषयों को ग्रहण करने योग्य हो जाती है,\nजिससे वह अंतर्मुखी होने लगता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":583,"children":584},{},[],{"type":65,"tag":251,"props":586,"children":587},{"start":331},[588],{"type":65,"tag":255,"props":589,"children":590},{},[591,596],{"type":65,"tag":85,"props":592,"children":593},{},[594],{"type":109,"value":595},"संन्यास आश्रम (मुमुक्षत्व - आनंदमय कोश) -",{"type":109,"value":597}," अंत में, जब समस्त मोह और कामनाओं का क्षय हो जाता है, तब व्यक्ति संन्यास मार्ग को चुनता है।\nयह संसार के त्याग का नहीं, अपितु स्वयं के भीतर 'ब्रह्म' को खोजने का मार्ग है। यहाँ समस्त द्वंद्व शांत हो जाते हैं। व्यक्ति शरीर, प्राण, मन और\nबुद्धि के आवरणों को भेदकर अपने मूल स्वरूप 'आनंद' में स्थित हो जाता है। यही मोक्ष की पूर्वावस्था है, जहाँ वह केवल चैतन्य और आनंद का अनुभव करता है॥",{"type":65,"tag":93,"props":599,"children":600},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":602,"children":603},{},[604],{"type":109,"value":605},"ये पाँचो कोश शरीर में हर समय रहते हैं परंतु इनकी प्रधानता भिन्न भिन्न समय पर होती है।\nएक १० साल का बच्चा भी 'मन' रखता है, लेकिन उसकी ऊर्जा का मुख्य केंद्र 'अन्नमय' (शारीरिक वृद्धि) होता है।\nइसी तरह, ५० साल के व्यक्ति के पास 'शरीर' है, लेकिन उसकी सार्थकता 'विज्ञानमय' (विवेक) में है।\nकई व्यक्तियों का मानना है कि इसे लेकर गुरूकुलों में शिक्षा प्रणाली भी चलती थी। जहाँ बच्चे को पहले रटवाते थे क्यूँकि\nआरम्भिक वर्षों में वह बहुत ही ऊर्जामय होते हैं और सरलता से रटंत कर सकते हैं। इस के उपरांत उन्हे इसका मर्म\nसमझाया जाता था और तदोपरांत अभ्यास करवाते थे और अंत में उन्हे इसे आत्मसात करने को कहा जाता था। इसका सूत्र भी है, श्रवण, मनन, चिंतन, निदिध्यासन।\nपरंतु इस व्यवस्था को हम सविस्तार किसी अन्य अध्याय में बताएँगे॥ इस प्रकार पंचकोषों के प्राधनता के समय को उपयोग करने के कई और भी उदाहरण हैं।\nमेरा मानना है कि आश्रम व्यवस्था भी इससे मेल खाती है और यहाँ इनका योग स्वाभाविक है॥",{"type":65,"tag":93,"props":607,"children":608},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":610,"children":611},{},[612],{"type":109,"value":613},"मनुष्य अलग अलग जीवन के पड़ाव में समाज का अपने परिवार का आचरण अपने प्रति बदलता हुआ देखते हैं तो अधिकतर उन्हे कारण समझ नहीं आता कि\nअब मुझसे क्या अपेक्षा करी जा रही है। और अचानक से मेरी रूचियाँ-अभिरूचियाँ क्यूँ बदलने लग गई। इसके लिए आश्रम व्यवस्था का ज्ञान होना अनिवार्य है।\nआश्रम व्यवस्था मात्र सामाजिक नियम नहीं, अपितु अन्नमय (जड़) से आनंदमय (चेतन) तक की वैज्ञानिक यात्रा है। जनेऊ संस्कार से पूर्व हम केवल पशु मात्र हैं, और\nसंन्यास के अंत में हम केवल आनंद हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":615,"children":616},{},[],{"type":65,"tag":155,"props":618,"children":620},{"id":619},"उपयोगिता",[621],{"type":109,"value":619},{"type":65,"tag":93,"props":623,"children":624},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":626,"children":627},{},[628],{"type":109,"value":629},"आयु के अनुसार व्यक्ति को अलग-अलग कार्य करने पड़ते हैं और अलग-अलग योग्यता भी जुटानी पड़ती है। अगर आप अपनी आयु अनुसार आचरण नहीं कर रहे हो\nतो आप कुछ तो अनुचित कर रहे हैं। गृहस्थ में 'तनाव' (Stress) इसलिए है क्योंकि वह\n'मनोमय कोश' का क्षेत्र है। ब्रह्मचर्य में आप ध्यान नहीं लगा पा रहे हैं क्यूँकि वह प्राणमय कोश की प्रधानता वाला समय है।\nऔर यदि आप ५० की उम्र में भी केवल 'अन्नमय कोश' (सिर्फ जिम जाना, केवल संपत्ति जुटाना) में अटके हैं, तो आप\nअपने 'मनोमय' और 'विज्ञानमय' कोश के साथ अन्याय कर रहे हैं। यह तुलना आपको बताती है कि अब आपको कहाँ ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यदि आप\n२६-३० वर्ष में भी विवाह नहीं कर रहे या धनार्जित नहीं कर रहे तो आप कुछ अनुचित कर रहे हैं। चुंकि ये समान्य से भिन्न व्यवहार है और आपकी प्राकृतिक लय के\nविरुद्ध है तो आपको आस पास के आपके साथियों और बधुओं का व्यवहार भी बदलता दिखेगा। इस तरह की कई परिस्थितियों का समाधान करता है ये अध्याय।\nयह जानकर व्यक्ति इसे स्वीकार कर ले कि यह इस अवस्था का स्वभाव है तो जीवन सरल और सुखी हो जाएगा ॥",{"type":65,"tag":93,"props":631,"children":632},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":634,"children":635},{},[636],{"type":109,"value":637},"प्रकृति के इस नियम की अवहेलना का परिणाम मैंने स्वयं अनुभव किया है। यौवन अवस्था में विवाह के विषय में मेरे विचार भी कुछ ऐसे थे कि अभी क्या शीघ्रता है।\nयौवनाव्स्था में मैनें कभी सोचा ही नहीं था मैं भी वृद्ध होऊंगा या मेरी भी मृत्यू होगी। आधुनिक जीवन की दौड़ में, जब मेरी पुत्री का जन्म मेरे ३८वें वर्ष में हुआ,\nतब मुझे इस काल-चक्र (Biological and Social Clock) के असंतुलन का भान हुआ। मुझे ये आभास हुआ कि जब तक ये अपनी शिक्षा पूरी कर विवाह\nयोग्य होगी तब तक मैं शायद जीवित ही ना रहूँ तो मुझे विवाह २५ तक करके ३० तक संतान कर लेनी चाहिए थी। यौवनाव्स्था के समय यदि कोई मुझे वर्णाश्रम\nउचित रूप से समझाता तो कदाचिद मैं ये भूल नहीं करता॥",{"type":65,"tag":93,"props":639,"children":640},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":642,"children":643},{},[644],{"type":109,"value":645},"यह व्यवस्था केवल आध्यात्मिक नहीं है, अपितु जीवन के Resource Management का एक ब्लूप्रिंट है। आपके कार्यस्थल पर उपयोग करने के लिए\nएक साधारण टेबल॥",{"type":65,"tag":93,"props":647,"children":648},{},[],{"type":65,"tag":347,"props":650,"children":651},{":is-notation":349},[652],{"type":65,"tag":352,"props":653,"children":654},{},[655,676],{"type":65,"tag":356,"props":656,"children":657},{},[658],{"type":65,"tag":360,"props":659,"children":660},{},[661,666,671],{"type":65,"tag":364,"props":662,"children":663},{},[664],{"type":109,"value":665},"आश्रम",{"type":65,"tag":364,"props":667,"children":668},{},[669],{"type":109,"value":670},"वर्तमान स्थिति की जाँच (Self-Audit)",{"type":65,"tag":364,"props":672,"children":673},{},[674],{"type":109,"value":675},"मुख्य सुधार\u002Fकार्य (Action Point)",{"type":65,"tag":380,"props":677,"children":678},{},[679,691,709,727,745],{"type":65,"tag":360,"props":680,"children":681},{},[682,685,688],{"type":65,"tag":387,"props":683,"children":684},{},[],{"type":65,"tag":387,"props":686,"children":687},{},[],{"type":65,"tag":387,"props":689,"children":690},{},[],{"type":65,"tag":360,"props":692,"children":693},{},[694,699,704],{"type":65,"tag":387,"props":695,"children":696},{},[697],{"type":109,"value":698},"ब्रह्मचर्य",{"type":65,"tag":387,"props":700,"children":701},{},[702],{"type":109,"value":703},"सीखने की उत्सुकता",{"type":65,"tag":387,"props":705,"children":706},{},[707],{"type":109,"value":708},"जिज्ञासा बनाए रखें और अनुशासन (Self-discipline) को अपनी नींव बनाएँ।",{"type":65,"tag":360,"props":710,"children":711},{},[712,717,722],{"type":65,"tag":387,"props":713,"children":714},{},[715],{"type":109,"value":716},"गृहस्थ",{"type":65,"tag":387,"props":718,"children":719},{},[720],{"type":109,"value":721},"परिश्रम एवं कार्य करना",{"type":65,"tag":387,"props":723,"children":724},{},[725],{"type":109,"value":726},"कर्तव्य (Dharma) और इच्छा (Kama) के बीच संतुलन बनाएँ। लक्ष्य पर ध्यान दें।",{"type":65,"tag":360,"props":728,"children":729},{},[730,735,740],{"type":65,"tag":387,"props":731,"children":732},{},[733],{"type":109,"value":734},"वानप्रस्थ",{"type":65,"tag":387,"props":736,"children":737},{},[738],{"type":109,"value":739},"प्रशिक्षण देना",{"type":65,"tag":387,"props":741,"children":742},{},[743],{"type":109,"value":744},"'अनासक्ति' (Detachment) का अभ्यास करें। सूचना को 'अनुभव और विवेक' में बदलकर दूसरों का मार्गदर्शन करें।",{"type":65,"tag":360,"props":746,"children":747},{},[748,753,758],{"type":65,"tag":387,"props":749,"children":750},{},[751],{"type":109,"value":752},"संन्यास",{"type":65,"tag":387,"props":754,"children":755},{},[756],{"type":109,"value":757},"कार्यभार सौंपना और पदभार से ऊपर उठना",{"type":65,"tag":387,"props":759,"children":760},{},[761],{"type":109,"value":762},"अपनी पहचान (Identity) को पद, प्रतिष्ठा और शरीर से ऊपर उठाकर 'स्व' में स्थित होने का प्रयास करें।",{"type":65,"tag":93,"props":764,"children":765},{},[],{"type":65,"tag":155,"props":767,"children":769},{"id":768},"उपसंहार-वर्णाश्रम-एवं-पंचकोष",[770],{"type":109,"value":771},"॥ उपसंहार: वर्णाश्रम एवं पंचकोष ॥",{"type":65,"tag":93,"props":773,"children":774},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":776,"children":777},{},[778],{"type":109,"value":779},"यदि आपके यहाँ जीवन प्रत्याशा ( औसत जीवनकाल ) यदि 100 वर्ष है जापान जैसा तो आप उसे लगभग 25 वर्ष के 4 आश्रमों में बाँट सकते हैं और अपने जीवन को सुनियोजित कर सकते हैं।\nयदि जीवन प्रत्याशा 80 है तो 20-20 के 4 भाग परंतु यदि उससे कम है 60 है तो 15-15 के 4 अवस्था तो बाँटिए परंतु साथ में 5-6 वर्ष न्यूनतम शैशव अवस्था के लिए निकाल दिजिए।\nताकि व्यक्ति को ब्रह्मचर्य अवस्था में अधिक समय मिल जाए। इससे उसका अध्ययन का समय बढ़ेगा और विवाह के लिए अधिक विचारने योग्य समय मिलेगा। शास्त्रों के अनुसार इसे 25-25 वर्षों के 4\nभागों में विभाजित करना चाहिए जिसमें पहले 25 वर्ष का ब्रह्मचर्य तत्पश्चात 25 से 50 तक गृहस्थ 50 से 75 वानप्रस्थ होना चाहिए॥",{"type":65,"tag":93,"props":781,"children":782},{},[],{"type":65,"tag":347,"props":784,"children":785},{":is-notation":349},[786],{"type":65,"tag":352,"props":787,"children":788},{},[789,814],{"type":65,"tag":356,"props":790,"children":791},{},[792],{"type":65,"tag":360,"props":793,"children":794},{},[795,799,804,809],{"type":65,"tag":364,"props":796,"children":797},{},[798],{"type":109,"value":665},{"type":65,"tag":364,"props":800,"children":801},{},[802],{"type":109,"value":803},"जीवन का पड़ाव",{"type":65,"tag":364,"props":805,"children":806},{},[807],{"type":109,"value":808},"प्रधान कोश",{"type":65,"tag":364,"props":810,"children":811},{},[812],{"type":109,"value":813},"मुख्य उद्देश्य",{"type":65,"tag":380,"props":815,"children":816},{},[817,832,854,875,896,917],{"type":65,"tag":360,"props":818,"children":819},{},[820,823,826,829],{"type":65,"tag":387,"props":821,"children":822},{},[],{"type":65,"tag":387,"props":824,"children":825},{},[],{"type":65,"tag":387,"props":827,"children":828},{},[],{"type":65,"tag":387,"props":830,"children":831},{},[],{"type":65,"tag":360,"props":833,"children":834},{},[835,840,845,849],{"type":65,"tag":387,"props":836,"children":837},{},[838],{"type":109,"value":839},"शैशव",{"type":65,"tag":387,"props":841,"children":842},{},[843],{"type":109,"value":844},"जन्म से ५-७ वर्ष",{"type":65,"tag":387,"props":846,"children":847},{},[848],{"type":109,"value":403},{"type":65,"tag":387,"props":850,"children":851},{},[852],{"type":109,"value":853},"अबोध मन एवं निर्मल 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खोज",{"type":65,"tag":93,"props":939,"children":940},{},[],{"type":65,"tag":81,"props":942,"children":943},{},[944],{"type":109,"value":945},"इसका एक भाग ये भी था की राजा या पिता यदि अपने गृहस्थ आश्रम के पश्चात यदि वानप्रस्थ ग्रहण कर ले तो नई पीढ़ी को अपने गृहस्थ आश्रम के लिए समय और शासन मिल जाता था।\nइससे कलह की संभावना भी कम हो जाती है राज्य और गृहस्थी में। और राजा या पिता को कुछ समय शांति में नई पीढ़ी को भार सौपने का अवसर मिल जाता था। 50 वर्ष के पश्चात वैसे\nभी किसी से अधिक कार्य नहीं करवाना चाहिए। तो एक सुव्यवस्थित ढंग से समाज में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सत्ता या गृहस्थी का हस्तांतरण हो जाता है और समाज सुचारू रूप से कार्य\nकरता रहता है। यहाँ कहने को बहुत कुछ है इसके और भी कई आयाम और लाभ हो सकते हैं परंतु आज के लिए इस विषय को यहीं विराम देते हैं॥",{"type":65,"tag":93,"props":947,"children":948},{},[],{"type":65,"tag":130,"props":950,"children":951},{},[],{"type":65,"tag":93,"props":953,"children":954},{},[],{"type":65,"tag":956,"props":957,"children":958},"ul",{},[959],{"type":65,"tag":255,"props":960,"children":961},{},[962,967,969],{"type":65,"tag":85,"props":963,"children":964},{},[965],{"type":109,"value":966},"अस्तित्व के ५ स्तर (पंचकोष) -",{"type":109,"value":968}," मनुष्य इन ५ कोशों से बना है:\n",{"type":65,"tag":251,"props":970,"children":971},{},[972,977,982,987,992],{"type":65,"tag":255,"props":973,"children":974},{},[975],{"type":109,"value":976},"अन्नमय कोश (शरीर\u002Fपदार्थ)",{"type":65,"tag":255,"props":978,"children":979},{},[980],{"type":109,"value":981},"प्राणमय कोश (ऊर्जा\u002Fश्वसन)",{"type":65,"tag":255,"props":983,"children":984},{},[985],{"type":109,"value":986},"मनोमय कोश (भावना\u002Fसंकल्प)",{"type":65,"tag":255,"props":988,"children":989},{},[990],{"type":109,"value":991},"विज्ञानमय कोश (विवेक\u002Fबुद्धि)",{"type":65,"tag":255,"props":993,"children":994},{},[995],{"type":109,"value":996},"आनंदमय कोश (परम आनंद\u002Fब्रह्म)",{"type":65,"tag":93,"props":998,"children":999},{},[],{"type":65,"tag":956,"props":1001,"children":1002},{},[1003],{"type":65,"tag":255,"props":1004,"children":1005},{},[1006,1011,1013],{"type":65,"tag":85,"props":1007,"children":1008},{},[1009],{"type":109,"value":1010},"जीवन के ५ पड़ाव (आश्रम) -",{"type":109,"value":1012}," उम्र के अनुसार एक विशेष कोश की प्रधानता होती है:\n",{"type":65,"tag":251,"props":1014,"children":1015},{},[1016,1021,1026,1031,1036],{"type":65,"tag":255,"props":1017,"children":1018},{},[1019],{"type":109,"value":1020},"शैशव (जन्म से 5-7 वर्ष): अन्नमय कोश की प्रधानता।",{"type":65,"tag":255,"props":1022,"children":1023},{},[1024],{"type":109,"value":1025},"ब्रह्मचर्य (25 वर्ष तक): प्राणमय कोश का विकास और अनुशासन।",{"type":65,"tag":255,"props":1027,"children":1028},{},[1029],{"type":109,"value":1030},"गृहस्थ (25 से 50 वर्ष): मनोमय कोश और पारिवारिक कर्तव्य।",{"type":65,"tag":255,"props":1032,"children":1033},{},[1034],{"type":109,"value":1035},"वानप्रस्थ (50 से 75 वर्ष): विज्ञानमय कोश और अनुभवों से मार्गदर्शन।",{"type":65,"tag":255,"props":1037,"children":1038},{},[1039],{"type":109,"value":1040},"संन्यास (75 वर्ष के बाद): आनंदमय कोश और मोक्ष की खोज।",{"type":65,"tag":93,"props":1042,"children":1043},{},[],{"type":65,"tag":956,"props":1045,"children":1046},{},[1047],{"type":65,"tag":255,"props":1048,"children":1049},{},[1050,1055],{"type":65,"tag":85,"props":1051,"children":1052},{},[1053],{"type":109,"value":1054},"महत्व -",{"type":65,"tag":956,"props":1056,"children":1057},{},[1058,1063,1068],{"type":65,"tag":255,"props":1059,"children":1060},{},[1061],{"type":109,"value":1062},"यह व्यवस्था जीवन के संसाधनों (Time & Energy) के सही प्रबंधन का तरीका है।",{"type":65,"tag":255,"props":1064,"children":1065},{},[1066],{"type":109,"value":1067},"यदि हम उम्र के अनुसार निर्धारित आश्रम का पालन नहीं करते, तो तनाव और असंतुलन पैदा होता है।",{"type":65,"tag":255,"props":1069,"children":1070},{},[1071],{"type":109,"value":1072},"समय पर जिम्मेदारी अगली पीढ़ी को सौंपने (वानप्रस्थ) से समाज और परिवार में शांति बनी रहती है।",{"type":65,"tag":93,"props":1074,"children":1075},{},[],{"type":65,"tag":130,"props":1077,"children":1078},{},[],{"type":65,"tag":93,"props":1080,"children":1081},{},[],{"type":65,"tag":956,"props":1083,"children":1084},{},[1085],{"type":65,"tag":255,"props":1086,"children":1087},{},[1088,1093],{"type":65,"tag":85,"props":1089,"children":1090},{},[1091],{"type":109,"value":1092},"निष्कर्ष -",{"type":109,"value":1094}," जनेऊ संस्कार से आरम्भ हुई यात्रा 'जड़' (अन्न) से 'चेतन' (आनंद) तक पहुँचने का एक वैज्ञानिक मार्ग है।",{"type":65,"tag":81,"props":1096,"children":1097},{},[1098],{"type":109,"value":1099},"इसका मूल आज भी वही है की जीवन के भिन्न-भिन्न पड़ाव में व्यक्ति के भीतर भिन्न-भिन्न गुण विकसित हो चुके होते हैं,\nजिसका उसे उपयोग करना चाहिए और उसे आगे आने वाले समय के लिए भी सज्ज रहना चाहिए। तो अब आशा करता\nहूँ आप अपना जीवन आश्रम के अनुसार जिएँ॥",{"title":54,"searchDepth":270,"depth":270,"links":1101},[1102,1103,1104,1105],{"id":157,"depth":270,"text":157},{"id":491,"depth":270,"text":491},{"id":619,"depth":270,"text":619},{"id":768,"depth":270,"text":771},"markdown","content:shiksha:vedicJeevan:6.atmajnaan_05_ashram.md","content","shiksha\u002FvedicJeevan\u002F6.atmajnaan_05_ashram.md","shiksha\u002FvedicJeevan\u002F6.atmajnaan_05_ashram","md",1783865536350]