[{"data":1,"prerenderedAt":760},["ShallowReactive",2],{"content-\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_04_purushartha_dharm":3,"content-query-Fo1xpqJF6H":44},[4,12,17,21,25,29,33,37,41],{"_path":5,"title":6,"description":7,"part":8,"image":9,"prev_path":10,"next_path":11},"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fintro_01_intro","॥ परिचय ॥","यहाँ हम वैदिक दृष्टि से जीवन को समझने का प्रयास करेंगे। हम यहाँ कई सूत्रों को जोड़कर जीवन में सफल होने के उपाय ढूँढेंगे॥\n","॥ प्रस्तावना ॥","\u002Fimages\u002Fshiksha\u002Fjeevan_darshan.jpeg",null,"\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_01_tripakshiyavivek",{"_path":11,"title":13,"description":14,"part":15,"image":9,"prev_path":5,"next_path":16},"॥ तृतीय मार्ग ॥","ज्ञान की परिक्षा का तीसरा मार्ग। बिना जिसके ज्ञान को प्रमाणित करना कठिन है॥\n","॥ आत्मज्ञान ॥","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_02_varnn",{"_path":16,"title":18,"description":19,"part":15,"image":9,"prev_path":11,"next_path":20},"॥ चतुर्वण ॥","चतुर्वर्ण की तार्किक समीक्षा: अष्टलक्ष्मी, अष्टसरस्वती और एकादश शक्ति के माध्यम से समझिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का वास्तविक स्वरूप। प्राचीन दर्शन का आधुनिक विश्लेषण॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_03_ashram",{"_path":20,"title":22,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":16,"next_path":24},"॥ आश्रम ॥","वर्णाश्रम की तार्किक समीक्षा और महत्व॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_04_purushartha_dharm",{"_path":24,"title":26,"description":27,"part":15,"image":9,"prev_path":20,"next_path":28},"॥ पुरुषार्थ (धर्म)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से धर्म की व्याख्या और धर्म परायण होने के लिए एक सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_05_purushartha_arth",{"_path":28,"title":30,"description":31,"part":15,"image":9,"prev_path":24,"next_path":32},"॥ पुरुषार्थ (अर्थ) ॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से अर्थ की व्याख्या और अर्थार्जन के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_06_purushartha_kaam",{"_path":32,"title":34,"description":35,"part":15,"image":9,"prev_path":28,"next_path":36},"॥ पुरुषार्थ (काम)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से काम का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_07_purushartha_moksha",{"_path":36,"title":38,"description":39,"part":15,"image":9,"prev_path":32,"next_path":40},"॥ पुरुषार्थ (मोक्ष)॥","पुरुषार्थ की दृष्टि से मोक्ष का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र।\n","\u002Fshiksha\u002Fvedicjeevan\u002Fatmajnaan_08_purushartha_nishkarsha",{"_path":40,"title":42,"description":43,"part":15,"image":9,"prev_path":36,"next_path":10},"॥ पुरुषार्थ (निष्कर्ष) ॥","पुरुषार्थ का आधुनिक औचित्य और उसकी उपलब्धि के सूत्र॥\n",{"_path":24,"_dir":45,"_draft":46,"_partial":46,"_locale":47,"title":26,"description":27,"navigation":48,"part":15,"author":49,"image":9,"tag":50,"body":54,"_type":754,"_id":755,"_source":756,"_file":757,"_stem":758,"_extension":759},"vedicjeevan",false,"",true,"Vikram Singh Rawat",[51,52,53],"literature","book","jeevandarshan",{"type":55,"children":56,"toc":748},"root",[57,67,85,89,119,122,126,129,137,140,145,148,160,163,168,171,178,181,186,189,215,218,223,226,231,234,239,242,248,251,277,280,285,288,307,310,315,318,347,350,414,417,477,480,486,489,504,507,533,536,541,574,579,582,588,591,596,599],{"type":58,"tag":59,"props":60,"children":61},"element","h1",{"id":47},[62],{"type":58,"tag":63,"props":64,"children":66},"binding",{"value":65},"$doc.title",[],{"type":58,"tag":68,"props":69,"children":72},"div",{"className":70},[71],"sub_heading",[73],{"type":58,"tag":74,"props":75,"children":76},"p",{},[77],{"type":58,"tag":78,"props":79,"children":80},"strong",{},[81],{"type":58,"tag":63,"props":82,"children":84},{"value":83},"$doc.description",[],{"type":58,"tag":86,"props":87,"children":88},"br",{},[],{"type":58,"tag":68,"props":90,"children":93},{"className":91},[92],"shloka",[94],{"type":58,"tag":95,"props":96,"children":97},"blockquote",{},[98],{"type":58,"tag":74,"props":99,"children":100},{},[101,104,110,112,117],{"type":102,"value":103},"text","न धर्मोऽर्थमुत्सृजेत्तु न चार्थो धर्ममुत्सृजेत्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":106,"children":107},"em",{},[108],{"type":102,"value":109},"धर्म को अर्थ (धन) का त्याग नहीं करना चाहिए, और न ही अर्थ को धर्म का त्याग करना चाहिए।",{"type":102,"value":111},"\nन च कामोऽर्थधर्मौ च त्रयमेतन्निषेवितम्॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":113,"children":114},{},[115],{"type":102,"value":116},"काम (इच्छाओं) को भी अर्थ और धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए; इन तीनों का समान रूप से सेवन करना चाहिए॥",{"type":102,"value":118},"\n— महाभारत (शांतिपर्व, अध्याय १६७, श्लोक ८)",{"type":58,"tag":86,"props":120,"children":121},{},[],{"type":58,"tag":123,"props":124,"children":125},"hr",{},[],{"type":58,"tag":86,"props":127,"children":128},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":130,"children":131},{},[132],{"type":58,"tag":133,"props":134,"children":136},"img",{"alt":135,"src":9},"॥ पुरुषार्थ (धर्म) ॥",[],{"type":58,"tag":86,"props":138,"children":139},{},[],{"type":58,"tag":59,"props":141,"children":143},{"id":142},"पुरुषार्थ",[144],{"type":102,"value":142},{"type":58,"tag":86,"props":146,"children":147},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":149,"children":150},{},[151,153,158],{"type":102,"value":152},"आधुनिक युग में व्यक्ति का जीवन को सरल बनाने के कुछ नियमों का जोड़ है वर्ण, आश्रम और पुरुषार्थ।\nआधुनिक युग में जहाँ हमारे पास सुख-सुविधाओं के असीमित साधन हैं, वहीं जीवन के मूल उद्देश्य को लेकर एक गहरा भटकाव भी है।\nहम धन कमाते हैं, सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हैं, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता है। ऐसा क्यों है? इसका उत्तर हमारी वैदिक जीवनशैली के एक\nअत्यंत मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक ढांचे में छिपा है, जिसे ",{"type":58,"tag":78,"props":154,"children":155},{},[156],{"type":102,"value":157},"'पुरुषार्थ'",{"type":102,"value":159}," कहा जाता है॥",{"type":58,"tag":86,"props":161,"children":162},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":164,"children":165},{},[166],{"type":102,"value":167},"पुरुषार्थ 4 रूपों में विभाजित होता है, जिसे कहते हैं, धर्म, अर्थ, कर्म और मोक्ष। हम इन्हे एक बार सरल रूप में\nसमझेंगे तत्पश्चात हम वापस पुरुषार्थ पर आएंगे समझने के लिए कि इसका मूल उपयोग कैसे करें। हम यहाँ से\nपुरुषार्थ समझाने के प्रयास का आरम्भ करते हैं। इस अध्याय में हम समझने का प्रयास करते हैं कि पुरुषार्थ कि\nदृष्टि से धर्म का अर्थ क्या है॥",{"type":58,"tag":86,"props":169,"children":170},{},[],{"type":58,"tag":172,"props":173,"children":175},"h2",{"id":174},"परिभाषा-और-दार्शनिक-अर्थ",[176],{"type":102,"value":177},"परिभाषा और दार्शनिक अर्थ",{"type":58,"tag":86,"props":179,"children":180},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":182,"children":183},{},[184],{"type":102,"value":185},"धर्म का शाब्दिक अर्थ है \"जो धारण किया जाए\" — \"धारयति इति धर्मः\"। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान या पूजा-पाठ नहीं,\nअपितु सत्य, न्याय, दया, कर्तव्य, मर्यादा, और सामाजिक उत्तरदायित्व का समुच्चय है। वैशेषिक सूत्र (1.1.2) के अनुसार,\n\"यतो अभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः\" — जिससे लौकिक और पारलौकिक दोनों कल्याण हों, वही धर्म है। उपरोक्त्त श्लोक में एक\nपंक्ति है — \"न धर्मोऽर्थमुत्सृजेत्\", अर्थात धर्म के विरुद्ध जाकर अर्थ का अर्जन नहीं करना चाहिए। धर्म का मूल अर्थ इन संदर्भों में प्रयुक्त\nहोता है - नैतिकता, ऋत, अनुशासन, न्याय इत्यादि। धर्म की सबसे अधिक प्रचलित\nऔर सर्वमान्य व्याख्या इस श्लोक में मिलती है॥",{"type":58,"tag":86,"props":187,"children":188},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":190,"children":192},{"className":191},[92],[193],{"type":58,"tag":95,"props":194,"children":195},{},[196],{"type":58,"tag":74,"props":197,"children":198},{},[199,201,206,208,213],{"type":102,"value":200},"धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।\n",{"type":58,"tag":105,"props":202,"children":203},{},[204],{"type":102,"value":205},"धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण, चोरी न करना (अस्तेय), शुद्धि (स्वच्छता) और इंद्रियों को वश में रखना।",{"type":102,"value":207},"\nधीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":209,"children":210},{},[211],{"type":102,"value":212},"बुद्धि, आध्यात्मिक ज्ञान, सत्य और क्रोध न करना— ये धर्म के दस लक्षण हैं॥",{"type":102,"value":214},"\n— मनुस्मृति",{"type":58,"tag":86,"props":216,"children":217},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":219,"children":220},{},[221],{"type":102,"value":222},"धर्म व्यक्ति को नैतिकता, ईमानदारी, सहानुभूति, और सामाजिक जिम्मेदारी के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।\nयह जीवन के सभी क्षेत्रों — व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, व्यावसायिक — में संतुलन और मर्यादा स्थापित करता है।\nधर्म के बिना अर्थ और काम अनुचित, असंतुलित और विध्वंसक हो सकते हैं॥",{"type":58,"tag":86,"props":224,"children":225},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":227,"children":228},{},[229],{"type":102,"value":230},"धर्म का अर्थ बहुआयामी है, ये न्याय भी है, ये कर्तव्य भी है, ये अनुशासन भी है, ये नियम भी है और ये संतुलन भी है। ये बहुआयामी होने के कारण इसका मात्र\nकेवल कोई एक सूत्र ढूँढना जो ये बताए की क्या करने से धर्म की प्राप्ति हो लगभग असंभव है। चुंकि इस पुस्तक में हम व्यक्तिगत रूप से जीवन कैसे जीना चाहिए\nइस पर विचार कर रहे हैं तो हम धर्म को व्यक्तिगत मान कर चलते हैं॥",{"type":58,"tag":86,"props":232,"children":233},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":235,"children":236},{},[237],{"type":102,"value":238},"एक कथा धर्म के इस रूप को सरल रूप में समझा सकती है। एक बार एक ऋषि नदी किनारे बैठे थे। उन्होंने देखा कि एक बिच्छू पानी में डूब रहा है।\nऋषि ने उसे बचाने के लिए अपने हाथ से उठाया, लेकिन बिच्छू ने उन्हें डंक मार दिया। दर्द के कारण ऋषि का हाथ हिला और बिच्छू फिर पानी में गिर गया।\nऋषि ने उसे दोबारा उठाया, बिच्छू ने फिर डंक मारा। ऐसा कई बार हुआ। पास खड़े एक व्यक्ति ने पूछा, \"महाराज, जब यह आपको बार-बार काट रहा है,\nतो आप इसे बचा क्यों रहे हैं?\"\nऋषि ने शांत भाव से कहा:\n\"डंक मारना बिच्छू का धर्म (स्वभाव) है और बचाना मेरा धर्म। जब वह अपना बुरा धर्म नहीं छोड़ रहा, तो मैं अपना अच्छा धर्म क्यों छोड़ूँ?\"\nसबसे सरल सूत्र जो आत्मसात करने योग्य है, वह इस प्रकार है॥",{"type":58,"tag":86,"props":240,"children":241},{},[],{"type":58,"tag":172,"props":243,"children":245},{"id":244},"धर्माजन-का-सूत्र",[246],{"type":102,"value":247},"धर्माजन का सूत्र",{"type":58,"tag":86,"props":249,"children":250},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":252,"children":254},{"className":253},[92],[255],{"type":58,"tag":95,"props":256,"children":257},{},[258],{"type":58,"tag":74,"props":259,"children":260},{},[261,263,268,270,275],{"type":102,"value":262},"ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्य॑जायत।\n",{"type":58,"tag":105,"props":264,"children":265},{},[266],{"type":102,"value":267},"परमेश्वर के प्रदीप्त संकल्प (तप) से ऋत (सृष्टि के नियम) और सत्य (अस्तित्व) प्रकट हुए।",{"type":102,"value":269},"\nततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ समु॒द्रो अ॑र्ण॒वः॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":271,"children":272},{},[273],{"type":102,"value":274},"उसके बाद अंधकारमयी रात्रि उत्पन्न हुई और फिर जलमय अथाह समुद्र उत्पन्न हुआ॥",{"type":102,"value":276},"\n— ऋग्वेद (१0.१९०.१)",{"type":58,"tag":86,"props":278,"children":279},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":281,"children":282},{},[283],{"type":102,"value":284},"शास्त्रो में कथा आती है कि कर्म कब उत्पन्न होता है। एक बार एक राजा भेष बदल कर जनता के बीच घूम रहे थे। तो राजा ने अपने मंत्री से कहा की मुझे नहीं पता क्यूँ परंतु ये लकड़ी वाले को देख कर\nमुझे इसे मारने का मन कर रहा है। तो मंत्री ने कहा की मैं उससे बात करके आता हूँ। मंत्री ने उस लकड़ी वाले से पूछा तो पता चला की वह कहीं दूर देश से चंदन की लकड़ी बेचने के\nलिए यहाँ आया था और उसे कोई ग्राहक नहीं मिल रहा था। तो बातों बातों में उसने मंत्री को कहा की राजा बहुत बूढ़ा हो चला है यदि उसकी मृत्यु हो जाए तो मैं अपना चंदन राजभवन को बेच दूँगा।\nउससे ना केवल मुझे लाभ होगा अपितु मेरा प्रचार भी हो जाएगा। मंत्री को यह बात समझ आ गई की क्यूँ राजा को उस लकड़ी वाले को मारने का मन कर रहा था।",{"type":58,"tag":86,"props":286,"children":287},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":289,"children":290},{},[291,293,298,300,305],{"type":102,"value":292},"प्रश्न फिर वही है की कर्म कब उत्पन्न होता है। तो शास्त्र कहते हैं ",{"type":58,"tag":78,"props":294,"children":295},{},[296],{"type":102,"value":297},"मनसा, वाचा, कर्मणा",{"type":102,"value":299}," - अर्थात ",{"type":58,"tag":78,"props":301,"children":302},{},[303],{"type":102,"value":304},"मन से उत्पन्न होकर कर्म वाणी में निवास पाता है, फिर वाणी से कर्म में परिणत होता है",{"type":102,"value":306},"।\nयदि उस लकड़ी वाले नें मंत्री को यह बात कही तो उसे कहने से पहले वह उस बात पर सहस्त्रों बार विचार कर चुका होगा। और यही कर्म पर भी लागू होता है। की कोई कार्य करने से पहले व्यक्ति उसे\nस्हस्त्रों बार सोच-विचार कर, सहस्त्रों बार वाणी में कह चुका होता है। कर्म कभी भी अचानक उत्पन्न नहीं होता॥",{"type":58,"tag":86,"props":308,"children":309},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":311,"children":312},{},[313],{"type":102,"value":314},"तो अब फिर से प्रश्र उठता है की धर्म के मार्ग फिर कैसे पाया जाए। तो शास्त्र कहते हैं की मन को संतुलित करो। जब आपके मन में ऋत होगा और वाणी में सत तो कर्म में भी धर्म स्वयं ही आ\nजाएगा। धर्म क्या है? जो मन में है, वही वाणी में आए, और वही कर्म में उतरे।",{"type":58,"tag":86,"props":316,"children":317},{},[],{"type":58,"tag":319,"props":320,"children":321},"ol",{},[322],{"type":58,"tag":323,"props":324,"children":325},"li",{},[326,331,333,338,340,345],{"type":58,"tag":78,"props":327,"children":328},{},[329],{"type":102,"value":330},"ऋत (ब्रह्मांडीय व्यवस्था और मानसिक संतुलन) :",{"type":102,"value":332}," ऋत वह 'प्राकृतिक नियम' या 'कॉस्मिक ऑर्डर' है जिससे पूरा ब्रह्मांड संचालित होता है।\nकर्म की प्रक्रिया में ऋत का अर्थ है ",{"type":58,"tag":78,"props":334,"children":335},{},[336],{"type":102,"value":337},"विचारों की शुद्धता और संतुलन",{"type":102,"value":339},"। ऋत केवल बाहरी व्यवस्था नहीं, अपितु अंतर्मन का वह अनुशासन है जहाँ कोई\nविकार (जैसे क्रोध, लोभ या ईर्ष्या) नहीं होता। जैसे व्यापारी के मन में लोभ आया, तो उसका व्यक्तिगत 'ऋत' भंग हो गया।\nइसे प्राप्त करने का मार्ग ",{"type":58,"tag":78,"props":341,"children":342},{},[343],{"type":102,"value":344},"आत्म-अवलोकन (Self-observation)",{"type":102,"value":346}," है। जब हम अपने विचारों के प्रति सजग हो जाते हैं और नकारात्मकता को बीज रूप\nमें ही पहचान लेते हैं, तब मन संतुलित रहता है। नियमित स्वाध्याय और ध्यान से मन की चंचलता को ऋत के साथ जोड़ा जा सकता है।",{"type":58,"tag":86,"props":348,"children":349},{},[],{"type":58,"tag":319,"props":351,"children":353},{"start":352},2,[354],{"type":58,"tag":323,"props":355,"children":356},{},[357,362,364,369,371,373,376,402,405,407,412],{"type":58,"tag":78,"props":358,"children":359},{},[360],{"type":102,"value":361},"सत (वाणी की सत्यता):",{"type":102,"value":363}," जब मन का संतुलन (ऋत) वाणी में उतरता है, तो वह 'सत' या सत्य बन जाता है।\nयहाँ सत्य का अर्थ केवल सच बोलना नहीं, अपितु ",{"type":58,"tag":78,"props":365,"children":366},{},[367],{"type":102,"value":368},"विचार और वाणी में एकरूपता",{"type":102,"value":370}," होना है।",{"type":102,"value":372},"\n  ",{"type":58,"tag":86,"props":374,"children":375},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":377,"children":379},{"className":378},[92],[380],{"type":58,"tag":95,"props":381,"children":382},{},[383],{"type":58,"tag":74,"props":384,"children":385},{},[386,388,393,395,400],{"type":102,"value":387},"सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् ।\n",{"type":58,"tag":105,"props":389,"children":390},{},[391],{"type":102,"value":392},"सत्य बोलो, प्रिय बोलो, परंतु अप्रिय सत्य न बोलो।",{"type":102,"value":394},"\nप्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":396,"children":397},{},[398],{"type":102,"value":399},"प्रिय झूठ भी मत कहो, यही सनातन धर्म है॥",{"type":102,"value":401},"\n— मनुस्मृति (4.138)",{"type":58,"tag":86,"props":403,"children":404},{},[],{"type":102,"value":406},"जो मन में ऋत के रूप में स्थित है, वही जब वाणी के माध्यम से बाहर आता है, तो वह सत है। यदि मन में कल्याण का भाव है, तो वाणी कभी अहितकारी नहीं होगी।\nइसे ",{"type":58,"tag":78,"props":408,"children":409},{},[410],{"type":102,"value":411},"मौन और विवेकपूर्ण संभाषण",{"type":102,"value":413}," से प्राप्त किया जा सकता है। बोलने से पहले यह विचार करना कि \"क्या यह आवश्यक है, क्या यह सत्य है और क्या इससे किसी का कल्याण होगा?\"\nवाणी को सत की ओर ले जाता है। व्यापारी ने जब अपनी इच्छा को वाणी दी, तो उसने अपने नकारात्मक विचार को कर्म की दिशा में पहला ठोस कदम दे दिया।",{"type":58,"tag":86,"props":415,"children":416},{},[],{"type":58,"tag":319,"props":418,"children":420},{"start":419},3,[421],{"type":58,"tag":323,"props":422,"children":423},{},[424,429,431,439,441,443,446,472,475],{"type":58,"tag":78,"props":425,"children":426},{},[427],{"type":102,"value":428},"धर्म (ऋत और सत का स्वाभाविक परिणाम):",{"type":102,"value":430}," धर्म कोई क्रिया नहीं, अपितु जीवन जीने की वह अवस्था है जहाँ आपके कर्म ब्रह्मांडीय नियमों के अनुकूल होते हैं।\nशास्त्र कहते हैं कि यदि आधार (ऋत) और माध्यम (सत) शुद्ध हैं, तो परिणाम (धर्म) स्वतः ही प्रकट होगा। परंतु इसके ऊपर भी कर्म में एक संयम बर्तना आवश्यक है,\nआप ये ध्यान देना चाहिए की आपका कर्म ",{"type":58,"tag":105,"props":432,"children":433},{},[434],{"type":58,"tag":78,"props":435,"children":436},{},[437],{"type":102,"value":438},"स्वहित, परहित, लोकहित",{"type":102,"value":440}," में हो। यथा संभव आपको इसे इन तीनों के लिए लाभकारी बनाना चाहिए। यदि केवल\nएक के लिए भी लाभकारी हो और बाकी के लिए हानिकारक न हो, तो भी वह धर्म के अनुरूप होगा। परंतु यदि इसमें कभी आपको चुनना पड़े तो उसके लिए\nएक सिद्धांत मैं आपको स्मरण कराना चाहूँगा॥",{"type":102,"value":442},"\n   ",{"type":58,"tag":86,"props":444,"children":445},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":447,"children":449},{"className":448},[92],[450],{"type":58,"tag":95,"props":451,"children":452},{},[453],{"type":58,"tag":74,"props":454,"children":455},{},[456,458,463,465,470],{"type":102,"value":457},"त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":459,"children":460},{},[461],{"type":102,"value":462},"कुल (परिवार) के हित के लिए एक व्यक्ति का त्याग किया जा सकता है।",{"type":102,"value":464},"\nग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":466,"children":467},{},[468],{"type":102,"value":469},"ग्राम के हित के लिए कुल का, जनपद के हित के लिए ग्राम का और आत्म-कल्याण (सत्य) के लिए पूरी पृथ्वी का त्याग किया जा सकता है॥",{"type":102,"value":471},"\n— विदुर नीति (महाभारत, उद्योग पर्व 37.17)",{"type":58,"tag":86,"props":473,"children":474},{},[],{"type":102,"value":476},"इस श्लोक में एक दर्शन है की आत्म कल्याण अथवा सत्य के लिए पूरी पृथ्वी को भी त्यागा जा सकता है यही धर्म है॥",{"type":58,"tag":86,"props":478,"children":479},{},[],{"type":58,"tag":172,"props":481,"children":483},{"id":482},"धर्म-की-रक्षा-के-सूत्र",[484],{"type":102,"value":485},"धर्म की रक्षा के सूत्र",{"type":58,"tag":86,"props":487,"children":488},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":490,"children":491},{},[492,494,502],{"type":102,"value":493},"धर्म सारे संसार को धारण करने वाला आधार है और धर्म एक चक्र की भाँति घूमता रहता है। यदि आज आप धर्म की रक्षा करते हैं, तो वह कल आपकी रक्षा करेगा।\nयदि आज आप धर्म को त्याग देते हैं, तो कल धर्म आपको त्याग देगा। इसलिए धर्म केवल स्वयं तक सीमित रहने वाली वस्तु नहीं है, अपितु यह वह आधार है जिस\nपर संपूर्ण समाज टिका होता है। ",{"type":58,"tag":78,"props":495,"children":496},{},[497],{"type":58,"tag":105,"props":498,"children":499},{},[500],{"type":102,"value":501},"\"धर्मो रक्षति रक्षितः\"",{"type":102,"value":503}," अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। जब समाज में धर्म (न्याय और मर्यादा) सुरक्षित\nहोता है, तभी समाज सुखी और भयमुक्त होता है।",{"type":58,"tag":86,"props":505,"children":506},{},[],{"type":58,"tag":68,"props":508,"children":510},{"className":509},[92],[511],{"type":58,"tag":95,"props":512,"children":513},{},[514],{"type":58,"tag":74,"props":515,"children":516},{},[517,519,524,526,531],{"type":102,"value":518},"वित्तं देहं तथा बुद्धिं धर्मरक्षार्थमुत्सृजेत्।\n",{"type":58,"tag":105,"props":520,"children":521},{},[522],{"type":102,"value":523},"धर्म की रक्षा के लिए व्यक्ति को अपना धन, शरीर (बल) और बुद्धि समर्पित कर देनी चाहिए।",{"type":102,"value":525},"\nधर्मेण रक्षितो लोकः सुखमेव प्रपद्यते ॥\n",{"type":58,"tag":105,"props":527,"children":528},{},[529],{"type":102,"value":530},"क्योंकि धर्म द्वारा रक्षित यह संसार ही वास्तविक सुख और शांति को प्राप्त करता है॥",{"type":102,"value":532},"\n— नीतिशतक, हितोपदेश",{"type":58,"tag":86,"props":534,"children":535},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":537,"children":538},{},[539],{"type":102,"value":540},"धर्म की रक्षा के लिए हमें इन तीन स्तरों पर शस्त्र और शास्त्र का उपयोग करना होता है:",{"type":58,"tag":319,"props":542,"children":543},{},[544,554,564],{"type":58,"tag":323,"props":545,"children":546},{},[547,552],{"type":58,"tag":78,"props":548,"children":549},{},[550],{"type":102,"value":551},"बुद्धि (शास्त्र):",{"type":102,"value":553}," यह वैचारिक रक्षा है। जब अधर्म तर्क और कुतर्कों के माध्यम से समाज को भ्रमित करता है, तब बुद्धि और शास्त्र के माध्यम से सत्य की स्थापना करना धर्म-रक्षा है।",{"type":58,"tag":323,"props":555,"children":556},{},[557,562],{"type":58,"tag":78,"props":558,"children":559},{},[560],{"type":102,"value":561},"बल (शस्त्र):",{"type":102,"value":563}," यह भौतिक रक्षा है। जहाँ शांतिपूर्ण संवाद विफल हो जाए और असुरक्षा का वातावरण हो, वहाँ शारीरिक सामर्थ्य और शस्त्र के माध्यम से न्याय की रक्षा करना अनिवार्य हो जाता है।",{"type":58,"tag":323,"props":565,"children":566},{},[567,572],{"type":58,"tag":78,"props":568,"children":569},{},[570],{"type":102,"value":571},"धन (संसाधन):",{"type":102,"value":573}," यह संरचनात्मक रक्षा है। धर्म के कार्यों, शिक्षा, और न्यायपूर्ण व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए धन का सदुपयोग करना भी धर्म-रक्षा का ही एक रूप है।",{"type":58,"tag":74,"props":575,"children":576},{},[577],{"type":102,"value":578},"समाज की सुख-शांति किसी राजा या सरकार पर नहीं, अपितु इस बात पर निर्भर करती है कि उस समाज के व्यक्ति अपने संसाधनों (धन, बल, बुद्धि) का कितना अंश धर्म की रक्षा में लगाते हैं।\n\"धर्मो रक्षति रक्षितः\" का यही व्यावहारिक स्वरूप है।",{"type":58,"tag":86,"props":580,"children":581},{},[],{"type":58,"tag":172,"props":583,"children":585},{"id":584},"निष्कर्ष-धर्म",[586],{"type":102,"value":587},"निष्कर्ष (धर्म)",{"type":58,"tag":86,"props":589,"children":590},{},[],{"type":58,"tag":74,"props":592,"children":593},{},[594],{"type":102,"value":595},"इस विमर्श से यह स्पष्ट होता है कि धर्म कोई थोपा गया नियम नहीं, अपितु स्वयं के विचारों और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के बीच का सामंजस्य है। जब हमारे मन में ऋत (संतुलन) होता है,\nतो हमारी वाणी में सत (सत्य) उतरता है, और यही सत्य जब आचरण में ढलता है, तो वह धर्म बन जाता है। धर्म की रक्षा का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, अपितु अपनी बुद्धि, बल\nऔर संसाधनों का न्याय और मर्यादा के पक्ष में नियोजन करना है। यदि हम व्यक्तिगत स्तर पर 'स्वहित' से ऊपर उठकर 'लोकहित' को प्राथमिकता देते हैं, तो वही धर्म एक कवच\nबनकर हमारी रक्षा करता है। संक्षेप में, धर्म वह धुरी है जो मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर 'पुरुषार्थ' की ओर ले जाती है॥",{"type":58,"tag":86,"props":597,"children":598},{},[],{"type":58,"tag":600,"props":601,"children":603},"swar-lipi",{":is-notation":602},"false",[604],{"type":58,"tag":605,"props":606,"children":607},"table",{},[608,637],{"type":58,"tag":609,"props":610,"children":611},"thead",{},[612],{"type":58,"tag":613,"props":614,"children":615},"tr",{},[616,622,627,632],{"type":58,"tag":617,"props":618,"children":619},"th",{},[620],{"type":102,"value":621},"स्तर (मनुष्य का साधन)",{"type":58,"tag":617,"props":623,"children":624},{},[625],{"type":102,"value":626},"मार्गदर्शक सिद्धांत",{"type":58,"tag":617,"props":628,"children":629},{},[630],{"type":102,"value":631},"क्रियात्मक स्वरूप (क्या करें?)",{"type":58,"tag":617,"props":633,"children":634},{},[635],{"type":102,"value":636},"अंतिम लक्ष्य (साध्य)",{"type":58,"tag":638,"props":639,"children":640},"tbody",{},[641,657,680,703,726],{"type":58,"tag":613,"props":642,"children":643},{},[644,648,651,654],{"type":58,"tag":645,"props":646,"children":647},"td",{},[],{"type":58,"tag":645,"props":649,"children":650},{},[],{"type":58,"tag":645,"props":652,"children":653},{},[],{"type":58,"tag":645,"props":655,"children":656},{},[],{"type":58,"tag":613,"props":658,"children":659},{},[660,665,670,675],{"type":58,"tag":645,"props":661,"children":662},{},[663],{"type":102,"value":664},"मनसा (मन)",{"type":58,"tag":645,"props":666,"children":667},{},[668],{"type":102,"value":669},"ऋत (कॉस्मिक ऑर्डर)",{"type":58,"tag":645,"props":671,"children":672},{},[673],{"type":102,"value":674},"आत्म-अवलोकन और विचारों में संतुलन रखना।",{"type":58,"tag":645,"props":676,"children":677},{},[678],{"type":102,"value":679},"मानसिक शुद्धता",{"type":58,"tag":613,"props":681,"children":682},{},[683,688,693,698],{"type":58,"tag":645,"props":684,"children":685},{},[686],{"type":102,"value":687},"वाचा (वाणी)",{"type":58,"tag":645,"props":689,"children":690},{},[691],{"type":102,"value":692},"सत (सत्यता)",{"type":58,"tag":645,"props":694,"children":695},{},[696],{"type":102,"value":697},"विचार और शब्दों में एकरूपता (प्रिय और हितकारी सत्य)।",{"type":58,"tag":645,"props":699,"children":700},{},[701],{"type":102,"value":702},"विश्वसनीयता",{"type":58,"tag":613,"props":704,"children":705},{},[706,711,716,721],{"type":58,"tag":645,"props":707,"children":708},{},[709],{"type":102,"value":710},"कर्मणा (कर्म)",{"type":58,"tag":645,"props":712,"children":713},{},[714],{"type":102,"value":715},"धर्म (मर्यादा)",{"type":58,"tag":645,"props":717,"children":718},{},[719],{"type":102,"value":720},"कर्म को स्वहित, परहित और लोकहित में संयोजित करना।",{"type":58,"tag":645,"props":722,"children":723},{},[724],{"type":102,"value":725},"सामाजिक कल्याण",{"type":58,"tag":613,"props":727,"children":728},{},[729,734,738,743],{"type":58,"tag":645,"props":730,"children":731},{},[732],{"type":102,"value":733},"धर्म-रक्षा (संकल्प)",{"type":58,"tag":645,"props":735,"children":736},{},[737],{"type":102,"value":501},{"type":58,"tag":645,"props":739,"children":740},{},[741],{"type":102,"value":742},"बुद्धि, बल और धन का उपयोग न्याय और सत्य की रक्षा में करना",{"type":58,"tag":645,"props":744,"children":745},{},[746],{"type":102,"value":747},"सर्वांगीण सुख (शांति)",{"title":47,"searchDepth":352,"depth":352,"links":749},[750,751,752,753],{"id":174,"depth":352,"text":177},{"id":244,"depth":352,"text":247},{"id":482,"depth":352,"text":485},{"id":584,"depth":352,"text":587},"markdown","content:shiksha:vedicJeevan:5.atmajnaan_04_purushartha_dharm.md","content","shiksha\u002FvedicJeevan\u002F5.atmajnaan_04_purushartha_dharm.md","shiksha\u002FvedicJeevan\u002F5.atmajnaan_04_purushartha_dharm","md",1776411259627]