[{"data":1,"prerenderedAt":502},["ShallowReactive",2],{"content-\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fchturthsrgbhag7":3,"content-query-PE57KOOzct":151},[4,12,17,21,25,29,33,37,41,46,50,54,58,62,66,70,74,78,82,86,90,94,99,103,107,111,115,119,123,128,132,136,140,144,148],{"_path":5,"title":6,"description":7,"part":8,"image":9,"prev_path":10,"next_path":11},"\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fkthavstukthavstu","॥ कथावस्तु कथावस्तु॥","प्रथम सर्ग  \u002F  भाग  1 >>रश्मिरथी का अर्थ होता है वह व्यक्ति, जिसका रथ रश्मि अर्थात सूर्य की किरणों का हो। इस काव्य में रश्मिरथी नाम कर्ण का है क्योंकि उसका चरित्र सूर्य के समान प्रकाशमान है","कथावस्तु","\u002Fimages\u002Fraamdharisingh\u002Frashmirathi.jpeg",null,"\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fprthmsrgbhag1",{"_path":11,"title":13,"description":14,"part":15,"image":9,"prev_path":5,"next_path":16},"॥ प्रथम सर्ग    भाग  1॥","जय हो जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को,जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को।किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर, नमस्य है फूल,सुधी खोजते नहीं, गुणों का आदि, शक्ति का मूल।ऊँच-नीच का","प्रथम सर्ग","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fprthmsrgbhag2",{"_path":16,"title":18,"description":19,"part":15,"image":9,"prev_path":11,"next_path":20},"॥ प्रथम सर्ग    भाग  2॥","अलग नगर के कोलाहल से, अलग पुरी-पुरजन से,कठिन साधना में उद्योगी लगा हुआ तन-मन से।निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर,वन्यकुसुम-सा खिला कर्ण, जग की आँखों से दूर।नहीं फूलते कुसुम मात्र","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fprthmsrgbhag3",{"_path":20,"title":22,"description":23,"part":15,"image":9,"prev_path":16,"next_path":24},"॥ प्रथम सर्ग    भाग  3॥","फिरा कर्ण, त्यों साधु-साधु कह उठे सकल नर-नारी,राजवंश के नेताओं पर पड़ी विपद् अति भारी।द्रोण, भीष्म, अर्जुन, सब फीके, सब हो रहे उदास,एक सुयोधन बढ़ा, बोलते हुए, वीर! शाबाश !द्वन्द्व-युद्ध","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fprthmsrgbhag4",{"_path":24,"title":26,"description":27,"part":15,"image":9,"prev_path":20,"next_path":28},"॥ प्रथम सर्ग    भाग  4॥","पूछो मेरी जाति , शक्ति हो तो, मेरे भुजबल सेरवि-समान दीपित ललाट से और कवच-कुण्डल से,पढ़ो उसे जो झलक रहा है मुझमें तेज-प़काश,मेरे रोम-रोम में अंकित है मेरा इतिहास।अर्जुन बङ़ा वीर क्षत्रिय ह","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fprthmsrgbhag5",{"_path":28,"title":30,"description":31,"part":15,"image":9,"prev_path":24,"next_path":32},"॥ प्रथम सर्ग    भाग  5॥","करना क्या अपमान ठीक है इस अनमोल रतन का,मानवता की इस विभूति का, धरती के इस धन का।बिना राज्य यदि नहीं वीरता का इसको अधिकार,तो मेरी यह खुली घोषणा सुने सकल संसार।अंगदेश का मुकुट कर्ण के मस्तक","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fprthmsrgbhag6",{"_path":32,"title":34,"description":35,"part":15,"image":9,"prev_path":28,"next_path":36},"॥ प्रथम सर्ग    भाग  6॥","लगे लोग पूजने कर्ण को कुंकुम और कमल से,रंग-भूमि भर गयी चतुर्दिक् पुलकाकुल कलकल से।विनयपूर्ण प्रतिवन्दन में ज्यों झुका कर्ण सविशेष,जनता विकल पुकार उठी, जय महाराज अंगेश।महाराज अंगेश! तीर-सा","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fprthmsrgbhag7",{"_path":36,"title":38,"description":39,"part":15,"image":9,"prev_path":32,"next_path":40},"॥ प्रथम सर्ग    भाग  7॥","जनमे नहीं जगत् में अर्जुन! कोई प्रतिबल तेरा,टँगा रहा है एक इसी पर ध्यान आज तक मेरा।एकलव्य से लिया अँगूठा, कढ़ी न मुख से आह,रखा चाहता हूँ निष्कंटक बेटा! तेरी राह।मगर, आज जो कुछ देखा, उससे ध","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag1",{"_path":40,"title":42,"description":43,"part":44,"image":9,"prev_path":36,"next_path":45},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  1॥","शीतल, विरल एक कानन शोभित अधित्यका के ऊपर,कहीं उत्स-प्रस्त्रवण चमकते, झरते कहीं शुभ निर्झर।जहाँ भूमि समतल, सुन्दर है, नहीं दीखते है पाहन,हरियाली के बीच खड़ा है, विस्तृत एक उटज पावन।आस-पास कुछ","द्वितीय सर्ग","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag2",{"_path":45,"title":47,"description":48,"part":44,"image":9,"prev_path":40,"next_path":49},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  2॥","श्रद्धा बढ़ती अजिन-दर्भ पर, परशु देख मन डरता है,युद्ध-शिविर या तपोभूमि यह, समझ नहीं कुछ पड़ता है।हवन-कुण्ड जिसका यह उसके ही क्या हैं ये धनुष-कुठार?जिस मुनि की यह स्रुवा, उसी की कैसे हो सकती तल","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag3",{"_path":49,"title":51,"description":52,"part":44,"image":9,"prev_path":45,"next_path":53},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  3॥","कर्ण मुग्ध हो भक्ति-भाव में मग्न हुआ-सा जाता है,कभी जटा पर हाथ फेरता, पीठ कभी सहलाता है,चढें नहीं चीटियाँ बदन पर, पड़े नहीं तृण-पात कहीं,कर्ण सजग है, उचट जाय गुरुवर की कच्ची नींद नहीं।वृद्ध","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag4",{"_path":53,"title":55,"description":56,"part":44,"image":9,"prev_path":49,"next_path":57},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  4॥","खड्ग बड़ा उद्धत होता है, उद्धत होते हैं राजे,इसीलिए तो सदा बनाते रहते वे रण के बाजे।और करे ज्ञानी ब्राह्मण क्या? असि-विहीन मन डरता है,राजा देता मान, भूप का वह भी आदर करता है।सुनता कौन यहाँ","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag5",{"_path":57,"title":59,"description":60,"part":44,"image":9,"prev_path":53,"next_path":61},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  5॥","सिर था जो सारे समाज का, वही अनादर पाता है।जो भी खिलता फूल, भुजा के ऊपर चढ़ता जाता है।चारों ओर लोभ की ज्वाला, चारों ओर भोग की जय;पाप-भार से दबी-धँसी जा रही धरा पल-पल निश्चय।जब तक भोगी भूप प","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag6",{"_path":61,"title":63,"description":64,"part":44,"image":9,"prev_path":57,"next_path":65},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  6॥","वीर वही है जो कि शत्रु पर जब भी खड्ग उठाता है,मानवता के महागुणों की सत्ता भूल न जाता है।सीमित जो रख सके खड्ग को, पास उसी को आने दो,विप्रजाति के सिवा किसी को मत तलवार उठाने दो।जब-जब मैं शर-","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag7",{"_path":65,"title":67,"description":68,"part":44,"image":9,"prev_path":61,"next_path":69},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  7॥","हाय, कर्ण, तू क्यों जन्मा था? जन्मा तो क्यों वीर हुआ?कवच और कुण्डल-भूषित भी तेरा अधम शरीर हुआ?धँस जाये वह देश अतल में, गुण की जहाँ नहीं पहचान?जाति-गोत्र के बल से ही आदर पाते हैं जहाँ सुजान?","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag8",{"_path":69,"title":71,"description":72,"part":44,"image":9,"prev_path":65,"next_path":73},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  8॥","किन्तु, पाँव के हिलते ही गुरुवर की नींद उचट जाती,सहम गयी यह सोच कर्ण की भक्तिपूर्ण विह्वल छाती।सोचा, उसने, अतः, कीट यह पिये रक्त, पीने दूँगा,गुरु की कच्ची नींद तोड़ने का, पर पाप नहीं लूँगा।ब","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag9",{"_path":73,"title":75,"description":76,"part":44,"image":9,"prev_path":69,"next_path":77},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  9॥","सहनशीलता को अपनाकर ब्राह्मण कभी न जीता है,किसी लक्ष्य के लिए नहीं अपमान-हलाहल पीता है।सह सकता जो कठिन वेदना, पी सकता अपमान वही,बुद्धि चलाती जिसे, तेज का कर सकता बलिदान वही।तेज-पुञ्ज ब्राह्","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag10",{"_path":77,"title":79,"description":80,"part":44,"image":9,"prev_path":73,"next_path":81},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  10॥","छल से पाना मान जगत् में किल्विष है, मल ही तो है,ऊँचा बना आपके आगे, सचमुच यह छल ही तो है।पाता था सम्मान आज तक दानी, व्रती, बली होकर,अब जाऊँगा कहाँ स्वयं गुरु के सामने छली होकर?करें भस्म ही","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag11",{"_path":81,"title":83,"description":84,"part":44,"image":9,"prev_path":77,"next_path":85},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  11॥","तू ने जीत लिया था मुझको निज पवित्रता के बल से,क्या था पता, लूटने आया है कोई मुझको छल से?किसी और पर नहीं किया, वैसा सनेह मैं करता था,सोने पर भी धनुर्वेद का, ज्ञान कान में भरता था।नहीं किया","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag12",{"_path":85,"title":87,"description":88,"part":44,"image":9,"prev_path":81,"next_path":89},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  12॥","कर्ण विकल हो खड़ा हुआ कह, हाय! किया यह क्या गुरुवर?दिया शाप अत्यन्त निदारुण, लिया नहीं जीवन क्यों हर?वर्षों की साधना, साथ ही प्राण नहीं क्यों लेते हैं?अब किस सुख के लिए मुझे धरती पर जीने देते","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fdvitiysrgbhag13",{"_path":89,"title":91,"description":92,"part":44,"image":9,"prev_path":85,"next_path":93},"॥ द्वितीय सर्ग    भाग  13॥","आह, बुद्धि कहती कि ठीक था, जो कुछ किया, परन्तु हृदय,मुझसे कर विद्रोह तुम्हारी मना रहा, जाने क्यों, जय?अनायास गुण-शील तुम्हारे, मन में उगते आते हैं,भीतर किसी अश्रु-गंगा में मुझे बोर नहलाते हैं","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Ftritiysrgbhag1",{"_path":93,"title":95,"description":96,"part":97,"image":9,"prev_path":89,"next_path":98},"॥ तृतीय सर्ग    भाग  1॥","हो गया पूर्ण अज्ञात वास,पाडंव लौटे वन से सहास,पावक में कनक-सदृश तप कर,वीरत्व लिए कुछ और प्रखर,नस-नस में तेज-प्रवाह लिये,कुछ और नया उत्साह लिये।सच है, विपत्ति जब आती है,कायर को ही दहलात","तृतीय सर्ग","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Ftritiysrgbhag2",{"_path":98,"title":100,"description":101,"part":97,"image":9,"prev_path":93,"next_path":102},"॥ तृतीय सर्ग    भाग  2॥","वसुधा का नेता कौन हुआ?भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?जिसने न कभी आराम किया,विघ्नों में रहकर नाम किया।जब विघ्न सामने आते हैं,सोते से हमें जगाते ह","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Ftritiysrgbhag3",{"_path":102,"title":104,"description":105,"part":97,"image":9,"prev_path":98,"next_path":106},"॥ तृतीय सर्ग    भाग  3॥","मैत्री की राह बताने को,सबको सुमार्ग पर लाने को,दुर्योधन को समझाने को,भीषण विध्वंस बचाने को,भगवान् हस्तिनापुर आये,पांडव का संदेशा लाये।दो न्याय अगर तो आधा दो,पर, इसमें भी यदि बाधा हो,","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Ftritiysrgbhag4",{"_path":106,"title":108,"description":109,"part":97,"image":9,"prev_path":102,"next_path":110},"॥ तृतीय सर्ग    भाग  4॥","शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,शत कोटि दण्डधर लोकपाल।जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।भूलोक, अतल, पाताल देख,","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Ftritiysrgbhag5",{"_path":110,"title":112,"description":113,"part":97,"image":9,"prev_path":106,"next_path":114},"॥ तृतीय सर्ग    भाग  5॥","भगवान सभा को छोड़ चले,करके रण गर्जन घोर चलेसामने कर्ण सकुचाया सा,आ मिला चकित भरमाया साहरि बड़े प्रेम से कर धर कर,ले चढ़े उसे अपने रथ पररथ चला परस्पर बात चली,शम-दम की टेढी घात चली,शीत","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Ftritiysrgbhag6",{"_path":114,"title":116,"description":117,"part":97,"image":9,"prev_path":110,"next_path":118},"॥ तृतीय सर्ग    भाग  6॥","विक्रमी पुरुष लेकिन सिर पर,चलता ना छत्र पुरखों का धर.अपना बल-तेज जगाता है,सम्मान जगत से पाता है.सब देख उसे ललचाते हैं,कर विविध यत्न अपनाते हैंकुल-गोत्र नही साधन मेरा,पुरुषार्थ एक बस","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Ftritiysrgbhag7",{"_path":118,"title":120,"description":121,"part":97,"image":9,"prev_path":114,"next_path":122},"॥ तृतीय सर्ग    भाग  7॥","तुच्छ है राज्य क्या है केशव?पाता क्या नर कर प्राप्त विभव?चिंता प्रभूत, अत्यल्प हास,कुछ चाकचिक्य, कुछ पल विलास,पर वह भी यहीं गवाना है,कुछ साथ नही ले जाना है.मुझसे मनुष्य जो होते हैं,क","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fchturthsrgbhag1",{"_path":122,"title":124,"description":125,"part":126,"image":9,"prev_path":118,"next_path":127},"॥ चतुर्थ सर्ग    भाग  1॥","प्रेमयज्ञ अति कठिन, कुण्ड में कौन वीर बलि देगा?तन, मन, धन, सर्वस्व होम कर अतुलनीय यश लेगा?हरि के सम्मुख भी न हार जिसकी निष्ठा ने मानी,धन्य धन्य राधेय! बंधुता के अद्भुत अभिमानी।पर, जाने क्यों","चतुर्थ सर्ग","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fchturthsrgbhag2",{"_path":127,"title":129,"description":130,"part":126,"image":9,"prev_path":122,"next_path":131},"॥ चतुर्थ सर्ग    भाग  2॥","वीर कर्ण, विक्रमी, दान का अति अमोघ व्रतधारी,पाल रहा था बहुत काल से एक पुण्य-प्रण भारी.रवि-पूजन के समय सामने जो याचक आता था,मुँह-माँगा वह दान कर्ण से अनायास पाता थापहर रही थी मुक्त चतुर्दिक य","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fchturthsrgbhag3",{"_path":131,"title":133,"description":134,"part":126,"image":9,"prev_path":127,"next_path":135},"॥ चतुर्थ सर्ग    भाग  3॥","गिरा गहन सुन चकित और मन-ही-मन-कुछ भरमाया,लता-ओट से एक विप्र सामने कर्ण के आया,कहा कि जय हो, हमने भी है सुनी सुकीर्ति कहानी,नहीं आज कोई त्रिलोक में कहीं आप-सा दानी.नहीं फिराते एक बार जो कुछ","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fchturthsrgbhag4",{"_path":135,"title":137,"description":138,"part":126,"image":9,"prev_path":131,"next_path":139},"॥ चतुर्थ सर्ग    भाग  4॥","सहम गया सुन शपथ कर्ण की, हृदय विप्र का डोला,नयन झुकाए हुए भिक्षु साहस समेट कर बोला,धन की लेकर भीख नहीं मैं घर भरने आया हूँ,और नहीं नृप को अपना सेवक करने आया हूँ.यह कुछ मुझको नहीं चाहिए, दे","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fchturthsrgbhag5",{"_path":139,"title":141,"description":142,"part":126,"image":9,"prev_path":135,"next_path":143},"॥ चतुर्थ सर्ग    भाग  5॥","जनमा जाने कहाँ, पला, पद-दलित सूत के कुल में,परिभव सहता रहा विफल प्रोत्साहन हित व्याकुल मैं,द्रोणदेव से हो निराश वन में भृगुपति तक धायाबड़ी भक्ति कि पर, बदले में शाप भयानक पाया.और दान जिसके","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fchturthsrgbhag6",{"_path":143,"title":145,"description":146,"part":126,"image":9,"prev_path":139,"next_path":147},"॥ चतुर्थ सर्ग    भाग  6॥","भुज को छोड़ न मुझे सहारा किसी और सम्बल का,बड़ा भरोसा था, लेकिन, इस कवच और कुण्डल का,पर, उनसे भी आज दूर सम्बन्ध किये लेता हूँ,देवराज! लीजिए खुशी से महादान देता हूँ.यह लीजिए कर्ण का जीवन और","\u002Fsahitya\u002Fraamdharisingh\u002Fchturthsrgbhag7",{"_path":147,"title":149,"description":150,"part":126,"image":9,"prev_path":143,"next_path":10},"॥ चतुर्थ सर्ग    भाग  7॥","हाँ, पड़ पुत्र-प्रेम में आया था छल ही करने को,जान-बूझ कर कवच और कुण्डल तुझसे हरने को,वह छल हुआ प्रसिद्ध किसे, क्या मुख अब दिखलाऊंगा,आया था बन विप्र, चोर बनकर वापस जाऊँगा.वंदनीय तू कर्ण, दे",{"_path":147,"_dir":152,"_draft":153,"_partial":153,"_locale":154,"title":149,"description":150,"navigation":155,"part":126,"author":156,"image":9,"tag":157,"body":162,"_type":496,"_id":497,"_source":498,"_file":499,"_stem":500,"_extension":501},"raamdharisingh",false,"",true,"रामधारी सिँह दिनकर",[158,159,160,161],"literature","book","saaye me dhoop","raamdhari singh 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चतुर्थ सर्ग भाग  7॥",[],{"type":166,"tag":198,"props":210,"children":211},{},[],{"type":166,"tag":182,"props":213,"children":214},{},[215],{"type":216,"value":217},"text","'हाँ, पड़ पुत्र-प्रेम में आया था छल ही करने को,",{"type":166,"tag":182,"props":219,"children":220},{},[221],{"type":216,"value":222},"जान-बूझ कर कवच और कुण्डल तुझसे हरने को,",{"type":166,"tag":182,"props":224,"children":225},{},[226],{"type":216,"value":227},"वह छल हुआ प्रसिद्ध किसे, क्या मुख अब दिखलाऊंगा,",{"type":166,"tag":182,"props":229,"children":230},{},[231],{"type":216,"value":232},"आया था बन विप्र, चोर बनकर वापस जाऊँगा.",{"type":166,"tag":182,"props":234,"children":235},{},[236],{"type":216,"value":237},"'वंदनीय तू कर्ण, देखकर तेज तिग्म अति तेरा,",{"type":166,"tag":182,"props":239,"children":240},{},[241],{"type":216,"value":242},"काँप उठा था आते ही देवत्वपूर्ण मन मेरा.",{"type":166,"tag":182,"props":244,"children":245},{},[246],{"type":216,"value":247},"किन्तु, अभी तो तुझे देख मन और डरा जाता 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धर्म, अगणित व्रत-साधन, योग, यज्ञ, तप तेरे,",{"type":166,"tag":182,"props":289,"children":290},{},[291],{"type":216,"value":292},"सब प्रकाश बन खड़े हुए हैं तुझे चतुर्दिक घेरे.",{"type":166,"tag":182,"props":294,"children":295},{},[296],{"type":216,"value":297},"'मही मग्न हो तुझे अंक में लेकर इठलाती है,",{"type":166,"tag":182,"props":299,"children":300},{},[301],{"type":216,"value":302},"मस्तक सूंघ स्वत्व अपना यह कहकर जतलाती है.",{"type":166,"tag":182,"props":304,"children":305},{},[306],{"type":216,"value":307},"'इसने मेरे अमित मलिन पुत्रों का दुख मेटा है,",{"type":166,"tag":182,"props":309,"children":310},{},[311],{"type":216,"value":312},"सूर्यपुत्र यह नहीं, कर्ण मुझ दुखिया का बेटा है.'",{"type":166,"tag":182,"props":314,"children":315},{},[316],{"type":216,"value":317},"'तू दानी, मैं कुटिल प्रवंचक, तू पवित्र, मैं पापी,",{"type":166,"tag":182,"props":319,"children":320},{},[321],{"type":216,"value":322},"तू देकर भी सुखी और मैं लेकर भी परितापी.",{"type":166,"tag":182,"props":324,"children":325},{},[326],{"type":216,"value":327},"तू पहुँचा है जहाँ कर्ण, देवत्व न जा सकता है,",{"type":166,"tag":182,"props":329,"children":330},{},[331],{"type":216,"value":332},"इस महान पद को कोई मानव ही पा सकता है.",{"type":166,"tag":182,"props":334,"children":335},{},[336],{"type":216,"value":337},"'देख न सकता अधिक और मैं कर्ण, रूप यह तेरा,",{"type":166,"tag":182,"props":339,"children":340},{},[341],{"type":216,"value":342},"काट रहा है मुझे जागकर पाप भयानक मेरा.",{"type":166,"tag":182,"props":344,"children":345},{},[346],{"type":216,"value":347},"तेरे इस पावन स्वरूप में जितना ही पगता हूँ,",{"type":166,"tag":182,"props":349,"children":350},{},[351],{"type":216,"value":352},"उतना ही मैं और अधिक बर्बर-समान लगता हूँ.",{"type":166,"tag":182,"props":354,"children":355},{},[356],{"type":216,"value":357},"'अतः कर्ण! कर कृपा यहाँ से मुझे तुरत जाने दो,",{"type":166,"tag":182,"props":359,"children":360},{},[361],{"type":216,"value":362},"अपने इस दूर्द्धर्ष तेज से त्राण मुझे पाने दो.",{"type":166,"tag":182,"props":364,"children":365},{},[366],{"type":216,"value":367},"मगर विदा देने के पहले एक कृपा यह कर दो,",{"type":166,"tag":182,"props":369,"children":370},{},[371],{"type":216,"value":372},"मुझ निष्ठुर से भी कोई ले माँग सोच कर वर लो.",{"type":166,"tag":182,"props":374,"children":375},{},[376],{"type":216,"value":377},"कहा कर्ण ने, 'धन्य हुआ मैं आज सभी कुछ देकर,",{"type":166,"tag":182,"props":379,"children":380},{},[381],{"type":216,"value":382},"देवराज! अब क्या होगा वरदान नया कुछ लेकर?",{"type":166,"tag":182,"props":384,"children":385},{},[386],{"type":216,"value":387},"बस, आशिष दीजिए, धर्म मे मेरा भाव अचल हो,",{"type":166,"tag":182,"props":389,"children":390},{},[391],{"type":216,"value":392},"वही छत्र हो, वही मुकुट हो, वही कवच-कुण्डल हो.",{"type":166,"tag":182,"props":394,"children":395},{},[396],{"type":216,"value":397},"देवराज बोले कि, 'कर्ण! यदि धर्म तुझे छोड़ेगा,",{"type":166,"tag":182,"props":399,"children":400},{},[401],{"type":216,"value":402},"निज रक्षा के लिए नया सम्बन्ध कहाँ जोड़ेगा?",{"type":166,"tag":182,"props":404,"children":405},{},[406],{"type":216,"value":407},"और धर्म को तू छोड़ेगा भला पुत्र! किस भय से?",{"type":166,"tag":182,"props":409,"children":410},{},[411],{"type":216,"value":412},"अभी-अभी रक्खा जब इतना ऊपर उसे विजय से.",{"type":166,"tag":182,"props":414,"children":415},{},[416],{"type":216,"value":417},"धर्म नहीं, मैने तुझसे से जो वस्तु हरण कर ली है,",{"type":166,"tag":182,"props":419,"children":420},{},[421],{"type":216,"value":422},"छल से कर आघात तुझे जो निस्सहायता दी है.",{"type":166,"tag":182,"props":424,"children":425},{},[426],{"type":216,"value":427},"उसे दूर या कम करने की है मुझको अभिलाषा,",{"type":166,"tag":182,"props":429,"children":430},{},[431],{"type":216,"value":432},"पर, स्वेच्छा से नहीं पूजने देगा तू यह आशा.",{"type":166,"tag":182,"props":434,"children":435},{},[436],{"type":216,"value":437},"'तू माँगें कुछ नहीं, किन्तु मुझको अवश्य देना है,",{"type":166,"tag":182,"props":439,"children":440},{},[441],{"type":216,"value":442},"मन का कठिन बोझ थोड़ा-सा हल्का कर लेना है.",{"type":166,"tag":182,"props":444,"children":445},{},[446],{"type":216,"value":447},"ले अमोघ यह अस्त्र, काल को भी यह खा सकता है,",{"type":166,"tag":182,"props":449,"children":450},{},[451],{"type":216,"value":452},"इसका कोई वार किसी पर विफल न जा सकता है.",{"type":166,"tag":182,"props":454,"children":455},{},[456],{"type":216,"value":457},"'एक बार ही मगर, काम तू इससे ले पायेगा,",{"type":166,"tag":182,"props":459,"children":460},{},[461],{"type":216,"value":462},"फिर यह तुरत लौट कर मेरे पास चला जायेगा.",{"type":166,"tag":182,"props":464,"children":465},{},[466],{"type":216,"value":467},"अतः वत्स! मत इसे चलाना कभी वृथा चंचल हो,",{"type":166,"tag":182,"props":469,"children":470},{},[471],{"type":216,"value":472},"लेना काम तभी जब तुझको और न कोई बल हो.",{"type":166,"tag":182,"props":474,"children":475},{},[476],{"type":216,"value":477},"'दानवीर! जय हो, महिमा का गान सभी जन गाये,",{"type":166,"tag":182,"props":479,"children":480},{},[481],{"type":216,"value":482},"देव और नर, दोनों ही, तेरा चरित्र अपनाये.'",{"type":166,"tag":182,"props":484,"children":485},{},[486],{"type":216,"value":487},"दे अमोघ शर-दान सिधारे देवराज अम्बर को,",{"type":166,"tag":182,"props":489,"children":490},{},[491],{"type":216,"value":492},"व्रत का अंतिम मूल्य चुका कर गया कर्ण निज घर को",{"title":154,"searchDepth":494,"depth":494,"links":495},2,[],"markdown","content:sahitya:raamdharisingh:35.chturthsrgbhag7.md","content","sahitya\u002Fraamdharisingh\u002F35.chturthsrgbhag7.md","sahitya\u002Fraamdharisingh\u002F35.chturthsrgbhag7","md",1776501289567]